भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पुत्री निरंजन लागि सिधाऊ । तुमको समरथ सदा सहाऊ ॥
तब कन्या निरंजन लग आई । एक पाँव पर सेवा लाई ॥

देखे पलक उधारिके, कन्या आगे ठाढ़ि ।

उपज्यो मोहऊ प्रेम तब, विप्रित मनमें बाढ़ि ॥

पलक उधारि कैल तब देखा । अपने मनमें कीन्ह विवेका ॥

कहै कैल सुनो तुम बानी । मो कारन तुहि पुरुष उत्पानी ॥

हम तुम कीजै स्लिस्ट पसारा । तीनहि लोक सकल महिभारा ॥

तब अस्टंगी कैलसों कहाई । मोर तोर नहि होय सगाई ॥

मैं तोरि बहिनी तू मोर भाई । सो अनरीति सब दीन चलाई ॥

कहैं कैल सुनु आदि भवानी । हमरे वचन तुम काहै न मानी ॥

जो तुम कहा हमारा मानौ । तौ तुम उत्पति निरन ठानौ ॥

तब अस्टंगी कहै बुझाई । बिन अज्ञा तोहि पुरुष रिसाई ॥

बिन आज्ञा कूरम सिर छीना । ताते पुरुष अंत करि दीन्हा ॥

देखि स्वरूप कन्यहि को, मनमें रोष भराय ।

मनमें रोष भरयो जब, कन्यहिं लीन्हीं खाय ॥

लीलत कन्या कीन्ह पुकारा । पुरुष वचन ले हिये सम्हारा ॥

तब सुरति बनाते कैलहि मारा । कन्या तब उगलै वहि वारा ॥

यहि प्रपंच अच्छर सब कीन्हा । ताते कैल मती हरि लीन्हा ॥

कन्या सुरति तब गई भुलाई । जबते पेट कैलके आई ॥

पिता पिता कैल सो कहेऊ । मदन प्रचंड कैल छन भयेऊ ॥

अष्टांगी कैल एकमत कीन्हा । ताते सृष्टि रचवे मन दीन्हा ॥

कियो संयोग भयो त्रैवारा । जेठो ब्रह्मा लघु विष्णुकुमारा ॥

तीजे संभु विस्तुते छोटा । येक निरंजनही के ढोटा ॥

जैसे रूप निरंजनही, तैसे तीनों भाय ।

यह उत्पत है कैलकी, आगे स्लिस्ट उपाय ॥

करि परपंच सूत्र में गयऊ । मनमें बहुत आनंदित भयऊ ॥

यहि आनन्दमें गए भुलाई । ताते स्वासा सुरति उठाई ॥

तेहि स्वासाते वेद कढ़ि आई । रूप निधान चारों बने भाई ॥

हाथन पोथी सुरसुर बानी । ताते कैल भयो अभिमानी ॥