कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 141, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंपुत्री निरंजन लागि सिधाऊ । तुमको समरथ सदा सहाऊ ॥
तब कन्या निरंजन लग आई । एक पाँव पर सेवा लाई ॥
देखे पलक उधारिके, कन्या आगे ठाढ़ि ।
उपज्यो मोहऊ प्रेम तब, विप्रित मनमें बाढ़ि ॥
पलक उधारि कैल तब देखा । अपने मनमें कीन्ह विवेका ॥
कहै कैल सुनो तुम बानी । मो कारन तुहि पुरुष उत्पानी ॥
हम तुम कीजै स्लिस्ट पसारा । तीनहि लोक सकल महिभारा ॥
तब अस्टंगी कैलसों कहाई । मोर तोर नहि होय सगाई ॥
मैं तोरि बहिनी तू मोर भाई । सो अनरीति सब दीन चलाई ॥
कहैं कैल सुनु आदि भवानी । हमरे वचन तुम काहै न मानी ॥
जो तुम कहा हमारा मानौ । तौ तुम उत्पति निरन ठानौ ॥
तब अस्टंगी कहै बुझाई । बिन अज्ञा तोहि पुरुष रिसाई ॥
बिन आज्ञा कूरम सिर छीना । ताते पुरुष अंत करि दीन्हा ॥
देखि स्वरूप कन्यहि को, मनमें रोष भराय ।
मनमें रोष भरयो जब, कन्यहिं लीन्हीं खाय ॥
लीलत कन्या कीन्ह पुकारा । पुरुष वचन ले हिये सम्हारा ॥
तब सुरति बनाते कैलहि मारा । कन्या तब उगलै वहि वारा ॥
यहि प्रपंच अच्छर सब कीन्हा । ताते कैल मती हरि लीन्हा ॥
कन्या सुरति तब गई भुलाई । जबते पेट कैलके आई ॥
पिता पिता कैल सो कहेऊ । मदन प्रचंड कैल छन भयेऊ ॥
अष्टांगी कैल एकमत कीन्हा । ताते सृष्टि रचवे मन दीन्हा ॥
कियो संयोग भयो त्रैवारा । जेठो ब्रह्मा लघु विष्णुकुमारा ॥
तीजे संभु विस्तुते छोटा । येक निरंजनही के ढोटा ॥
जैसे रूप निरंजनही, तैसे तीनों भाय ।
यह उत्पत है कैलकी, आगे स्लिस्ट उपाय ॥
करि परपंच सूत्र में गयऊ । मनमें बहुत आनंदित भयऊ ॥
यहि आनन्दमें गए भुलाई । ताते स्वासा सुरति उठाई ॥
तेहि स्वासाते वेद कढ़ि आई । रूप निधान चारों बने भाई ॥
हाथन पोथी सुरसुर बानी । ताते कैल भयो अभिमानी ॥