भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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चारि वेद सब मरम बतावा । तब चलि अच्छर शून्यमें आवा ॥
कैल प्रचंड भयो बरियारा । तब अच्छरते बुद्धि विचारा ॥
येतो कैल औ जीव विचारा । समरथ छाप लियो टकसारा ॥
अच्छर चलै अचिन्त लगि गयऊ । महासूत्र छोडि तब दयऊ ॥
तब अचित्य अच्छर समझावा । यह अविगति गति काहु ननपावा ॥
तुम तो सुरति हमारहि भाई । कैल सुरति समरथ निर्मायी ॥
लच्छ जीव नित करै अहारा । सवा लच्छ नितप्रति विस्तारा ॥
अंसवंस मिलि एक मत कीन्हा । चारों ज्ञान विचारि तब लीन्हा ॥
तुम गति हंसरूप है भाई । वह तो कैल जीव दुखदाई ॥
तुम समरथको ध्यान लगावो । अंतर गति समरथ सुख पावो ॥
चारि ज्ञानमें निरनय कीन्हा । सो निरनय चारि अंशको दीन्हा ॥
कहे कबीर धर्मदाससों, एता सकल पसार ॥
तीन सुरतिको खेल भयो, चौथे हंस उबार ॥

धर्मदास उवाच ।

धरमदास बहुतै सुख पावा । उठि सतगुरुसो विनती लावा ॥
सांचे वचन तुम्हारी बानी । आदि अंतकी निरणय ठानी ॥
कौन है अंड कौन है अंसा । कोहै अंस कौन है वंसा ॥
कौन कैल कौन गुण धारी । कौन स्निस्ट कौन संसारी ॥
एती बात मोहि सों भाखो । और गुप्त गोये जनि राखो ॥
विन देखी सबही कहै, सुनि पाई हम कान ।
सोई अदेख तुम दिखावहु, आदि अंत परमान ॥

सतगुरु कबीर उवाच ।

सुनि सतगुरु मनमें बिहँसानै । तुमसों धर्मनि निरनय ठानै ॥
तेज अंड है अच्छर बंसा । अचित्य अंस सोहं है हंसा ॥
निरंजन कैल चारि गुन धारी । तिन स्निस्ट अविगति संचारी ॥
तेज अंड अचित्त है अंसा । ओहं अंड जोहं है हंसा ॥
सत्य अंज जोहं है अंसा । सोरह तिनके उपज्यो वंसा ॥
पालंग पचीस तासु विस्तारा । पातालपांजी तिनको बैठारा ॥
तिसरो अंड छमा बखानी । अकह अंश तिन्हकी रजधानी ॥
अकहनामते सताविसै बंसा । तिन्हके सकल और हैं अंसा ॥