भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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सब सुत करें पुरुषको ध्याना । अभी अहार सदा सुख माना ॥
याही विधि सोलह सुत भयऊ । धरमदास तुम चित धरि लेऊ ॥
छन्द-दीप करीको अनंत सोभा, नाहि बनत सो बने ॥
अमित कला अपार अद्भुत, सुतन सोभाको गने ॥
पुरुषके उजियारसे सुन, सबै दीप अंजोर हो ॥
सत पुरुष रोम प्रकाश एकहि, चन्द सूर करोर हो ॥
सोरठा-सतपुर आनंदधाम, सोग मोह दुख तहैं नहीं ॥
हंसनको विसराम, पुरुष दरस अँचवन सुधा ॥ १२ ॥

निरञ्जनकी तपस्या और मानसरोवर तथा सूनकी प्राप्ति ।

यहि विधि बहुत दिवस गयो बीती । ता पीछे ऐसी भई रीती ॥
जुग सत्तर सेवा तिन कीन्हा । इक पग ठाढपुरुषचित्त दीन्हा ॥
सेवा कठिन भाँति तिन कीन्हा । आदि पुरुष हरषित होय चीन्हा ॥

पुरुष वचन-निरञ्जनप्रति ।

पुरुष अवाज उठी तब बानी । कहा जानि तुम सेवा ठानी ॥
निरञ्जन वचन ।

कहैं धरम तब सीस नमायी । देहु ठौर जहैं बैठों जायी ॥
आज्ञा किये जाहु सुत तहवों । मानसरोवर दीप है जहवों ॥
चले धरम तब मानसरोवर । बहुतहरषचित्त करत कलोहर ॥
मानसरोवर आये जहिया । भय आनन्द धरम पुनि तहिया ॥
बहुरि ध्यान पुरुषको कीन्हा । सत्तर जुग सेवा चित दीन्हा ॥
यक पगु ठाढे सेवा लायी । पुरुष दयाल दया उर आयी ॥

पुरुषवचन-सहजप्रति ।

विकस्यो पुहुप उठयो जब बानी । बोलत वचन उठयो अघरानी ॥
जाहु सहज तुम धरमके पास । अब कस ध्यान कीन्ह परगासा ॥
सेवा बहु कीन्हा धर्मराऊ । दियो ठौर वहि जहाँ रहाऊ ॥
तीन लोक तब पलमें दीन्हा । लिखि सेवकाइ दया आस कीन्हा ॥
तीन लोक कर पायो राजू । भयो आनन्द धरम मन गाजू ॥
जब का चाहे पूछो जाई । जो कछु कहै सो देउ सुनाई ॥

सहजका निरञ्जनके पास जाना ।

चले सहज तब सीस नवाई । धरमराय पहुँ पहुँचे जाई ॥
कहे सहज सुन भ्राता मोरा । सेवा पुरुष मान लइ तोरा ॥