भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 145

सृष्टिकी उत्पत्ति सत्पुरुषकी रचना ।

सत्य पुरुष जब गुप्त रहाये । कारन करन नहीं निरमाये ॥
समपुट कमल रह गुप्त सनेहा । पुहुप माहि रह पुरुष विदेहा ॥
इच्छा कीन्ह अंस उपजाये । हंसन देख हरष बहु पाये ॥
प्रथमहि पुरुष सब्द परकासा । दीप लोक रचि कीन्ह निवासा ॥
चारि करी सिंहासन कीन्हा । तापर पुहुप दीप कर चीन्हा ॥
पुरुष कला धरि बैठे जहिया । प्रगटी अगर वासना तहिया ॥
सहस्र अठासी दीप रचि राखा । पुरुष इच्छातै सब अभिलाखा ॥
सबै द्वीप रह अगर समायी । अगर वासना बहुत सुहायी ॥

सोलह सुतका प्रगट होना ।

दूजे सब्द जु पुरुष परकासा । निकसे कूर्म चरण गहि आसा ॥
तीजे सब्द सु पुरुष उच्चार । ज्ञान नाम सुत उपजे सारा ॥
टेकि चरन सम्मुख ह्वै रहेऊ । आज्ञा पुरुष दीप तिन्ह दयऊ ॥
चौथे सब्द भयो पुनि । जबहीं । विवेकनाम सुत उपजे तबहीं ॥
आप पुरुष किय दीप निवासा । पञ्चम सब्द सो तेज परकासा ॥
पँचऐ सब्द जब पुरुष उच्चार । काल निरंजन भौ अवतारा ॥
तेज अंसते काल होय आवा । ताते जीवन कहैं सन्तावा ॥
जिवरा अंस पुरुषका आहीं । आदि अंत कोई जानत नाहीं ॥
छठऐ सब्द पुरुष मुख भाषा । प्रगटे सहज नाम अभिलाषा ॥
सतऐ सब्द भयो संतोषा । दीन्हो दीप पुरुष परितोषा ॥
अठऐ सब्द पूरुष उच्चार । सुरति सुभाव दीप बैठारा ॥
नवमें सब्द अनन्द अपारा । दशऐ सब्द समा अनुसार ॥
ग्यारहें सब्द नाम निष्कामा । बारहें सब्द जलरंगी नामा ॥
तेरहें सब्द अचित्त सुत जानो । चौदहें सब्द सुत प्रम बखानो ॥
पन्द्रहें सब्द सुत दीनदयाला । सोलहें सब्द मैं धिरज रसाला ॥
सत्रहवें सब्द सुत योगसंतायन । एक नाल षोडश सुत पायन ॥
सब्दहिते भयो सुतन अकारा । सब्दहि ते लोक दीप विस्तारा ॥
अगर अमी दिय अंस अहारा । दीप दीप अंसन बैठारा ॥
अंसन सोभा कला अनंता । होत तहाँ सुख सदा वसन्ता ॥
अंसन सोभा अगम अपारा । कला अनन्तको वरने पारा ॥