भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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कैसे चार खानि विस्तारी । कैसे जीव काल बस डारी ॥
कैसे कूरम सेस उपराजा । कैसे मीनबराह्मिं साजा ॥
त्रय देवा कौने विधि भयऊ । कैसे महि अकास निरमयऊ ॥
चंद सूर कहु कैसे भयऊ । कैसे तारागन सब ठयऊ ॥
किहि विधि भइ शरीरकी रचना । भाषो साहेब उत्पत्ति बचना ॥
जाते संसय होय उछेदा । पाई भेद मन होय अखेदा ॥

छन्द—आदि उत्पत्ति कहो सतगुरु, क्रिपाकरि निज दासको ॥
बचन सुधा सु परकास कीजे, नास हों जम त्रासको ॥
एक एक विलोय बरनहु, दास मोहि निज जानिकै ॥
सत्य वक्ता सद्गुरु तुम लेब निश्चय मैं मानिकै ॥ १० ॥

सोरठा—निश्चय बचन तुम्हार, मोहि अधिक प्रिय ताहिंते ।
लीला अगम अपार, धन्य भाग दरसन दीये ॥ १० ॥

कबीर बचन ।

धरमदास अधिकारी पाया । ताते मैं कहि भेद सुनाया ॥
अब तुम सुनहु आदिकी बानी । भाषों उत्पत्ति प्रलय निसानी ॥

सृष्टिके आदिमें क्या था ?

तबकी बात सुनहु धर्मदासा । जब नहिं महि पताल अकासा ॥
जब नहिं कूर्म बराह औ सेसा । जब नहिं सारद गौरि गनेसा ॥
जब नहिं हते निरंजन राया । जिनजीवन कहैं बांधि झुलाया ॥
तेतिस कोटि देवता नाहीं । और अनेक बताऊँ काहीं ॥
ब्रह्मा विस्नु महेशुर नहिं तहिया । सास्त्र वेद कुरान न कहिया ॥
तब सब रहे पुरुषके माहीं । ज्यों बटबूच्छ मध्य रह छाहीं ॥

छन्द—आदि उत्पत्ति सुनहु धर्मनि, कोइ न जानत ताहि हो ॥
सबहि भो विस्तार पाछे, साख देऊँ मैं काहि हो ॥
वेद चारों नाहिं जानत; सत्य पुरुष कहानियां ॥
वेदको तब मूल नाहीं, अकथकथा बखानियां ॥ ११ ॥

सोरठा—निराकारते वेद, आदि भेद जाने नहीं ॥
पंडित करत उछेद, मते वेदके जग चले ॥ ११ ॥