कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 828, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंभी एक बंदर जो उनका सरदार मालूम होता था, आगे बढ़कर धमकाता हुआ खुर खुर करने लगा। वह बहुत रुष्ट जान पड़ता था। उसको बन्दूकका तनिक भी भय नहीं जान पड़ता था। अन्तको खेमाके द्वारपर पहुँचा। तब उसके आकारसे कायरता, नम्रता आदिके चिह्न प्रगट होते थे ऐसा जान पड़ता था कि, वह उस शवके लिये निवेदन करता है वह शव उसको दे दिया गया। वह उस लाशको अपना गोदमें ले बड़े प्रेमके साथ अपने साथियोंमें गया। पीछे सारे बन्दर न जाने कहाँ चले गये।
रोटी बनानी—दक्षिण पश्चिम एफ्रिका तथा कितने ही देशोंमें बन्दरोंकी अनेक जातियाँ हैं उनकी बहुत कहानियाँ हैं। उन देशोंके मनुष्य इस प्रकार विश्वास करते हैं कि, बन्दर मनुष्योंके समान वार्तालाप कर सकते हैं। परन्तु इस भयसे वे नहीं बोलते कि, मनुष्य उनको पकड़कर काम करावेंगे। जब वे चाहते हैं तब बोल लेते हैं पर भय उनको इतना ही है। बन्दरोंकी अनेक जातियाँ हैं, मनुष्य तथा बन्दरमें कुछ विभिन्नता नहीं है। मैंने सुना था कि दक्षिण एफ्रिकामें लोग बन्दरोंसे रोटी पकबाते हैं। वहाँके बन्दरोंके कार्य बड़े विचित्र तथा आश्चर्य-वर्द्धक हैं।
मनुष्यकी सन्तान—पूर्वोक्त पुस्तकमें लिखा है कि, एक बाबरची बड़ा ही दृढ़ तथा हृष्ट पुष्ट था उसने एक स्त्रीसे अपना विवाह किया, वह पतिसे अपनेको श्रेष्ठ समझती थी, इस प्रतिज्ञा पर उसने विवाह किया था कि, बाबरची उसको बाबरची खानामें कभी न रखेगा उसके रहनेके निमित्त पृथक् मकान बनावेगा उसमें उसको रखेगा इसी प्रतिज्ञापर दोनोंका विवाह हुआ था पर बाबरचीके पास बाबरची खानेके सिवा दूसरा मकानही नहीं था। इस कारण वह अपनी स्त्रीको उसीमें लाया। प्रथम तो वह स्त्री न बोली कि, कहीं उसका प्रति रुष्ट न हो जावे। अन्तमें ऐसी विवश हुई कि, अपने पतिको द्वेष्टी ठहराने लगी। पहले तो कोमलतासे बात करती थी आगे झिड़कियाँ देने लगी। जब वह बारम्बार उलटी सीधी सुनाने लगी तो उस मर्दने स्त्रीको चुप करनेका बहाना किया कि, मैं वनमें जाकर लकड़ियाँ लाता हूँ तेरे लिये नवीन मकान बना देता हूँ। वह गया कई घण्टोंके पीछे लकड़ियाँ ले आया। दूसरे दिन गया। समस्त दिन वहाँ रहकर थोड़ीसी लकड़ियाँ ले आया। स्त्री यह देख बड़ी असन्तुष्ट हुई, एक बड़ी लकड़ी उठाकर अपने पतिको भली प्रकार मारा। तब वह पुरुष तीसरी बार वनमें गया रातभर वहाँ रहकर भी कुछ लकड़ियाँ न लाया, आकर अपनी स्त्रीसे कहने लगा कि, जो वृक्ष मैंने काटा था वह बहुत भारी था मैं इसी कारण उसको