भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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अन्तर दृष्टिसे भली भाँति निगाह कर लेता है कि मैं अपने कर्म्मोंका कर्त्ता नहीं तब अपने शुभ अशुभ कामोंको परमेश्वरको सौंप उसके शरणमें होकर उससे सहायता माँगता है, जान लेता है कि, मेरे कार्य्य भुझको बचाने योग्य नहीं, मैं सत्यगुरुकी शरण लूँ, इसके अतिरिक्त और छुटकारेका कोई उपाय नहीं है। अपनी अज्ञानताके कारण मैं अपने कार्य्योंका कर्त्ता आपको जानता था परन्तु आगे ऐसा कदापि न करूँगा। यदि यह स्वतन्त्र होता तो सब कुछ कर लेता। फिर अपनेको दीनता तथा दुर्दशामें कदापि नहीं फँसाता। एक दिनका वृत्तान्त है कि, एक पादरी साहब आकर मेरे पास बैठे और बाद विवादपर प्रस्तुत हुये। उसने कहा कि, मनुष्य अपने कार्य्योँमें स्वतन्त्र हैं। इसपर मैंने उत्तर दिया कि, यह बात कदापि नहीं कर्म स्वतन्त्रता किसीको प्राप्त नहीं। सब कलके समान गतिमान हैं। सुतरां तौरीतमें उत्पत्तिकी पुस्तक देखो जब आदम उत्पन्न हुआ खुदाने उसको मना किया कि, तू यह कार्य्य कदापि न करना और इस वृक्षके फलको न खाना। आदमने न माना और खाया। जिससे वह ऐसा दुर्दशा प्रस्त हुआ कि, फिर न संभला।

यदि आदम कर्म करनेमें स्वतन्त्र होता तो ऐसा कदापि न होता। फिर आदमके पुत्र काबील और हाबील हुए वे भी तो ऐसेही थे। क्योंकि दोनोंने एक दिवस परमेश्वरके समक्ष भेंट चढ़ाई। छोटे भाईकी भेंट तो स्वीकृत हुई पर बड़े काबीलकी अस्वीकृत हुई इस कारण काबील अत्यंत क्रुद्ध हुआ। परमेश्वरने कहा कि, ऐ काबील ! तू क्यों क्रोध करता है ? यदि तू अच्छे मनसे देता तो क्या तेरी भेंट स्वीकार न की जाती ? परन्तु तू अपने भाईपर जय पावेगा। काबीलने अपने भाईपर जय पाई उसको मार डाला। परमेश्वरने उससे पूछा कि, तेरा भाई हाबील कहाँ है ? तब उसने उत्तर दिया कि, मैं नहीं जानता क्या मैं अपने भाईका रख-वाला हूँ। इसपर खुदाने उत्तर दिया कि, तेरे भाईका खून मुझे पुकारता है। अब तू हत्यारा तथा दोषी हुआ यह कहकर खुदाने उसको श्राप दिया। भलाजी ! यह न्यायकी बात थी कि, खुदाने तो स्वयम् कहा कि तू अपने भाईपर जय पावेगा। उससे जय पाई और उसको मार डाला। फिर वह दोषी कैसे ठहरा ? यदि अपने भाईको न मारता तो खुदा झूठा होता और मारा तो दोषी हुआ, हजूरसे दूर किया गया। वह तथा उसकी सन्तान पापिष्ठी ठहरी।

ऐसाही नूहके विषयमें जानना चाहिये कि, नूह सिखाते सिखाते विवश हो गया। किसीने उसका कहना न माना। अन्तको बाढ़ आई और समस्त मनुष्य डूब मरे। कोई जीव सिवा उनके कि, जो नूहकी नावपर था नहीं बचा। फिर

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