भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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स्वतन्त्रता केवल कबीर साहबकोही है दूसरेको नहीं है। क्योंकि, जब वे मनसे जिसको छुटकारा दिलाना चाहते हैं उसको अवश्य छुड़ा ही लेते हैं जो कुछ करना चाहते हैं करही लेते हैं। उनको रोकनेवाला दूसरा कोई नहीं है।

जाग्रत अवस्थामें यह मनुष्य जैसा कुछ कार्य करता है वैसाही स्वप्नावस्थामें किया करता है। परन्तु स्वप्नावस्थाके कर्मोंको कोई नहीं कहता कि मैंने किया। यद्यपि जाग्रत अवस्थाके कर्मोंका करता यह स्वयम् बनता है कि यह कर्म मेरे हैं ज्ञान दृष्टिसे जाग्रत तथा स्वप्नावस्था दोनोंही समान हैं। केवल इतनीही विभिन्नता है कि, जाग्रत देरतक उसके साथ रहती है एवं स्वप्न थोड़ीही देरमें बीत जाता है। यदि स्वप्नके कर्म उसके नहीं तो जाग्रतके कर्म भी उसके नहीं हैं। इस कारण आपको स्वकर्ममें स्वतन्त्र समझना अज्ञानता है क्योंकि यह स्वतन्त्र कदापि नहीं है। ज्ञानकी दृष्टिसे यह अहंकार जाता रहता है। इस जीवकी चारों दशा स्वप्नके समान हैं।

दूसरा महाभोगी वह है जो कि समस्त भोगोंको भोगता है और आपको भोगनेवाला नहीं मानता। यह भी बिना अन्तर प्रकाशके जाना नहीं जा सकता कि, भोगनेवाला कौन है और मैं कौन हूँ। यदि मैं भोगने वाला होता तो जो मैं चाहता सो भोग भोग लेता। भोगोंसे कभी न भागता कोई भोग ऐसा नहीं है कि जो भोग भोगते भाग न जाय और थक न जाय। जो अपनेको भोगोंसे अलग जानता है उसके सामने अच्छा और बुरा समान है क्योंकि रानी द्रौपदीने श्वपच सुदर्शनके सामने भांति भांतिके स्वादिष्ट भोजनोंके थाल धरे, उन्होंने सब खट्टा, मीठा और नमकीन एकमें मिलाकर खाना आरम्भ किया। क्योंकि उनको स्वादों की कामना नहीं थी। एक साधुको एक मनुष्यने कड़ुई तुम्बेकी तरकारी बनाकर खिला दी, वह साधु कड़ुई तरकारीको बिना कुछ कहे सुने खागया, जब पीछे गृहस्वामी खाने लगा। तब उसको वह तरकारी कड़ुई जहर मालूम हुई। वह अपनी स्त्रीको डांटने लगा कि, तूने यह विष समान तरकारी साधुको खिला दी, उसको कितना दुख हुआ होगा। उसके मनमें बड़ा भय समाया और वह साधुके पास जाकर उससे क्षमा प्रार्थना करने लगा। एक साधुको एक गृहस्थने खीर खिलाई और चीनीके बदले भूलसे नमक डाल दिया। कारण यह कि, वह नमक चीनीके समान पीसा हुआ था। वह साधु बिना कुछ कहे खा गया। उसके भीतर जब नमककी आग लगी तब उस गृहस्थके घरमें आग लगी। जब घर में देखने लगे तब जान पड़ा कि, साधुको चीनीके भ्रमसे नमक दे दिया गया। लोगोंने कहा