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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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उनकी बीज शक्तिका नाश कर दिया जाता है फिर वो जगज्जाल नहीं फैला सकती किन्तु जबतक इनकी बीज शक्ति नहीं नष्ट होती अवकाश पातेही मनकी एकाग्रताको मिटा देती हैं इस दशामें साधकको सच्चे गुरुकी आवश्यकता होती है ।

योगी योगयुक्तिसे समाधिके समयमें मनको वश कर लेते हैं पर समाधिके हरतेही मनकी वृत्तिसरूपता हो जाती है । बिना सच्चे गुरुकी कृपासे वासनाओंको नहीं मार सकता ये बड़ी प्रदल है अब हम वासनाओंकाही निरूपण करते हैं ।

मनके पाँच अहङ्कार

स्थूल, लिङ्ग, कारण, महाकारण और कौवल्य मनके ये पाँच अहंकार हैं इसीमें स्वामी सेवक देवता और पुजारी सभी बन्द हैं । इन पाँचों अहंकारोंसे बाहर निकलना कठिन है । जिसने इन अहंकारोंको बनाया है वह स्वयम् इन्हीं में ही फँसा है । सत्यगुरु बिना इसको कौन निकाले । बंधेको बँधा कैसे छुड़ावे । अन्धेको अन्धा क्या राह दिखा सकेगा । ये ही पाँचो अहंकार मनुष्यके बन्धनकी जड़ें हैं सब जीव इन्हींमें आवागमन किया करते हैं ।

१ स्थूल अहंकार—स्थूल अहंकारके अभिमानीमें यह कामना रहती है कि, पुत्र, गृह, धन, संसार, राग, रङ्ग, अच्छे अच्छे भोजन सौन्दर्य, सुगन्ध, सृंग अच्छे वस्तु, सवारी, शिकार और सम्भोग इत्यादि मिलें ये तो मिल जाय प्रसन्न होता है । नहीं तो दुःखी रहता है ।

२ लिंग अहंकार—लिङ्ग, कहो अथवा सूक्ष्म कहो । इस अहंकारवाले के मनमें यह रहता कि, स्वर्ग तथा बैकुण्ठके द्वारोंसे मिलूं । यंत्र मंत्र तंत्रादिकी योग्यता प्राप्त करूं । राजा इन्द्र इत्यादिके राज्यको प्राप्त करूं, उसकी विद्या जानूं जो यह सब मिले तो प्रसन्न रहता है न मिले तो दुःखी होता है ।

३ कारण अहंकार—कारण अहंकारवालेके मनमें यह ध्यान रहता है कि, योग समाधि वचन सिद्धि, प्राणायाम और प्रत्याहार, भूत, भविष्य, वर्तमानका हाल जाननेकी सिद्धि इत्यादि हों । दूसरोंकी देहमें समा जाना एकसे सहस्रों हो जाना, फिर सहस्रोंसे एक हो जाना, यह सब इसी अहंकारीके काम हैं । सुतरां जैसे शंकराचार्यजी संन्यासियोंके गुरु राजा अमरूकके शरीरमें समा गये और छः मास पर्यन्त रह आये वो इसीके बलसे रह आये थे ।

४ महाकारण अहंकार—महाकारण देहके अभिमानीको यह इच्छा होती है कि, योग वैराग्य, समाधि किया और उपरम, तितिक्षा, शम, दम, मुमुक्षताकी अवस्था और ज्ञान मिले । मैं ज्ञानी और मैं मुक्त हूँ । दूसरे सब बन्धनमें हूँ । केवल मैं छूटा हुआ हूँ । ऐसी अवस्था जब पूरी हो तो बड़ी प्रसन्नता हो और