BharatKosha
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

Page 728 of 1367

Read in context
Page 728

नहीं हो सकता। वह वैष्णव वह दूध तथा संखिया सब कुछ पी गया और चङ्गन रहा। संखियाने उसको किसी प्रकारकी क्षति नहीं पहुँचाई। उसके भीतर भोगता विष्णु था विष्णु उसको देखता था और वह विष्णुको देखता था। आप उस भोगसे अलग रहा। मीराकी भी तो यही बात थी। यह है मूर्तिपूजाका महत्त्व। फिर जो मूर्तियोंको कंकड़ पत्थर कहते हैं यह उनकी भूल है।

तीसरे महात्यागी तब होता है जब देहके अभिमानको छोड़े। जबतक देह का अभिमान न छूटे तबतक त्यागी नहीं। अभिमानही करके यह देह मिलता है और इसीसे स्थित हो रहा है। सहस्रों त्यागी हो गये परंतु देहका अभिमान न छोड़नेसे बन्धनमें रहे। बाहरसे तो उन्होंने सब छोड़ दिया पर भीतरसे न छोड़ सके न देहका अभिमान छूटा, देहका अभिमान छूटा तो तब जाने कि, किसी प्रकारकी आपत्ति तथा सहसाकी घटना संघटित हो तब स्थिरता न छूटे न किसी प्रकारकी घबड़ाहट हो। सुतरां ऋषि मुनिगण उजाड़ बनमें बसते हैं वहां उनको प्रत्येक प्रकारकी आपत्तियाँ आ घेरती हैं। शोर, सोंप, भेड़िये, रीछ और कानखजूर इत्यादि नानाप्रकारकी आपत्तियाँ दिखाई देती हैं। इस स्थानपर साधु अपने मनको बहुतही दृढ़ रखते हैं। कोई हिंसक जीव फाड़कर खाजावे तनिक भी नहीं समझते कि, यह मेरी देह है सब तपस्वियोंकी ऐसीही अवस्था होती है। जब भीतरी अथवा बाहरी अपने शरीरकी ओर ध्यान हुआ तब तो उनका कुछ भी त्याग नहीं। सुतरां सर्व त्यागियोंमें बड़े त्यागी शुक्देवजी थे जो कि, मायाके भयसे बारह वर्षतक माताके गर्भमें रहे थे, जब बाहर निकले तो उनको त्याग और वैराग रहा। उनका हाल बहुत प्रसिद्ध है जब राजा जनकके समीप गये तब उन्होंने एक कौतुक दिखाया कि, उनके समस्त नगरमें आग लगी सब कुंछ जलने लगा। राजा। जनक निभंय बैठे रहे और शुक्देवजी अपनी तूँबी लंगोटी लेने दौड़े। राजाने कहा कि बैठ किधर जाता है तू तो आपको बड़ा त्यागी समझता है अब लंगोटी और तूँबी लेने दौड़ा? मेरे राज्यका समस्त सामान जल रहा है मैं तनिक भी अधीर नहीं हुआ। तू कौनसा त्यागी है तुझे तो लंगोटी और तूँबीकी चिन्ता लगी हुई है। जिसकी तूँबी लंगोटीकी चिन्ता नहीं छूटी उसका देहका अभिमान कैसे छूट जायगा? अतः जबतक देहका अभिमान न छूटे, तबतक महात्यागी कैसे हुआ? यह सब प्रशंसा तथा गुण कबीर साहबहीके हैं दूसरेके नहीं हो सकते हैं। बनारस में कैसे कैसे कष्ट मिले परन्तु उनका तनिकभी ध्यान नहीं किया, न मनमें ही कुछ माना। महात्याग इसीका नाम है। सहस्रों साधु सन्तोंने अपनेको ईश्वरमें लीन कर दिया तो भी उनके मनमें देहका अभिमान और वासना रही ही, इस