कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 729, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंकारण उनका भगवान्में लीन होना भी काममें न आया । जो लोग सत्यगुरुको पहचानकर भगवत्में लीन होते हैं वे धन्य हैं, उन्हींका भगवत्में लीन होना सफल है ।
वेद तीन भागोंमें विभक्त हुआ—कर्म, उपसाना, ज्ञान । कर्मोंमें दो भाग हुये—एक तो यज्ञ इत्यादि जो सांसारिक अर्थोंके लिये करते हैं, दूसरा योग जो अपनी मुक्तिके लिये करते हैं । इन कर्मोंद्वारा सांसारिक तथा पारलौकिक अभिप्राय सिद्ध होते हैं । जिसके जैसे पाप पुण्य होते हैं वैसेही अवस्थामें वे जाते हैं वैसेही उनका भोग मिलता है ।
दूसरी उपासना है । सांसारिक लोग उपासना करते हैं और उपासनाके निमित्त विष्णु, राम, कृष्ण, शिव, चण्डी, सूर्य और गणेश आदि देवता ठहराये गये हैं ।
तीसरा ज्ञान काण्ड है । उसमें जीव परमात्मा और सत्य पुरुषका विचार है, इसकी सात भूमिका हैं । ये समस्त कर्मकाण्डी उपासक और ज्ञानी अपनी अपनी सीमाको पहुँच जाते हैं ।
मीमांसक और जैन कर्महीसे मुक्ति समझते हैं परन्तु यह नहीं जानते कि, यह कर्म कहाँसे उत्पन्न हुआ कहाँतक पहुँच सकता है । यह विधि निषेद दोनों शाखा निरञ्जननिमित्त हैं । वहाँही तक पहुँचानेकी सामर्थ्य रखते हैं । इन कर्मों द्वारा स्वर्ग तथा नरक सब कुछ प्राप्त होता है । जहाँतक कर्मोंकी पहुँच है वहींतक कालपुरुष हस्तक्षेप करता है । कर्मोंका सुविशाल बन है उसमें यह जीव भूलकर अपने घरसे बाहर हो गया है । यह बन हिंसक जन्तुओंसे भरा हुआ है, सूर्य चन्द्र सितारे इत्यादि तनिक भी दिखाई नहीं देते । न कोई सड़क और न पगडण्डी है, जो पगडण्डी कहीं है सो पशुओंकी है मनुष्योंकी नहीं हो सकती । इस कारण इन कर्मोंके बनसे कोई बाहर हो नहीं सकता । कर्म करता है फिर २ कर्म करनेके लिये देह धारण करता है । इसको कुछ पता नहीं लगता कि, वह कौन कर्म है जिससे मेरे कर्मोंका बन्धन कटे । वह कर्म जिससे इसका बन्धन कटे केवल स्वसंवेदकी शिक्षा ही है । उससे तो यह जीव अज्ञान है । इन्हीं लौकिक कर्मोंसे सारी योनि ठहराई गई हैं ।
जैनी जिनका कि समस्त ध्यान कर्मोंपर है वे आठ प्रकारके कर्म कहते हैं वे कबीर सागर नं. ९ जैन धर्म बोधसे लिखे जाते हैं : १—ज्ञानावर्णी कर्म । २—दर्शनावर्णी कर्म । ३—वेदनी कर्म । ४—मोहिनी कर्म । ५—नाम कर्म । ६—आयु कर्म । ७—गौत कर्म । ८—अन्तराय कर्म । अब इन आठों कर्मों