कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextकरे परवाज जब इस कालबुदसे ।
हो सदहा बार पै दरपै तनासुख ॥
कभी छूटे न इस खुमकी खुमारी ।
जो फिर फिर नोश करता मैं तनासुख ॥
जो बदखसमी अमलकी हो रही है ।
तो करता बारहा यह कैं तनासुख ॥
न सूझे और न यह रह रास्त बूझे ।
रही है घेर हर रुख दिये तनासुख ॥
जो खींच और धुवाँ दिलसे उठावे ।
कि पीता शौकसे यह नय तनासुख ॥
बहर सिमतो बहर सूरत बहर हाल ।
बहर जानिव नगर हर शय तनासुख ॥
कि वरकत मिहवां मुरशि इसे आजिज ।
हुआ लारेव तू निर्भय तनासुख ॥
पश्चिमके देशवासी जिनका कि, कामही मांसाहार तथा निर्दयताका है, वे जीवके पुनर्जन्मको अस्वीकार करते हैं। इसका कारण यह है कि, उस देशके पैगम्बरोंमें से किसीको आवागमनका ज्ञान मालूम नहीं था। यद्यपि प्रकाशकी हलकी झलक कभी कभी उनके मनपर भी आजाती थी परंतु उस प्रकाशकी स्थित नहीं होती थी। बिजलीके समान प्रकाशका प्रागटच हुआ और फिर अतर्धनि हो गया। सभी नबियोंमें हजरत आदम सबसे बड़े थे। अब पहले में उनके ज्ञानका वृत्तान्त लिखता हूँ। इसके साथही पश्चिम देशके पैगम्बरोंके आवागमनका हाल न जाननेके कारण सभी बात सप्रमाण लिखूंगा।
हजरत आदम—परमेश्वरके पुत्र थे। उनकी कांति तथा तेज सारे पैगम्बरोंसे बढ़ चढ़कर था कबीर साहबने कहा है कि, आदम ब्रह्माके औतार थे। इस खुदाके प्यारे पुत्रके साथ स्वयम् खुदा तथा फिरिश्ते वार्तालाप किया करते थे। हजरतको अनेक बार खुदाका दर्शन हुआ था। आपको लड़नी विद्या नहीं थी, न आपको खुदाकी पहचान थी। खुदासे जो आज्ञा पाते उसको व्यवहारमें लाते थे आपको खुदाका दर्शन तो मिलताही था परन्तु खुदाकी पहचान नहीं थी, क्योंकि, अन्तर प्रकाश बिना खुदाकी पहचान असम्भव है। आपको केवल शारीरिक दर्शन प्राप्त था, मानसिक दर्शन नहीं था। क्योंकि जिसको मानसिक दर्शन होता है वह वार्तालापके अधीन नहीं होता ऐसे प्रकाशित हृदयवालेको कोई धोखा भी नहीं दे