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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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मक्खियों पर विज्ञ ।

प्टामेक्स नामक एक बहुत बड़ा विद्वान् हुआ है जो कि, बराबर छप्पन वर्षतक मक्खियोंकी चाल ढालको देखकर भली भाँति निश्चय करता रहा । किलिक्स नामक एक बहुत बड़ा तत्ववेत्ता हुआ है जिसकी सारी उमर यही सब जाननेमें बीती । पोरों देशके कितनेही वैज्ञानिक इनका स्वभाव देखकर उनकी जाँच करते हुए इनकी बातें लिखते रहे थे ।

डाक्टर वाटथार्वी तथा फ्रानसिस हिउबर — प्राचीन कालके वैज्ञानिक जैसे डाक्टर वाट थार्वी—फ्रानसिस हिउबर इत्यादि सन् १२५२ ई० तक जाँचते देखते रहे ।

मधुमक्खियोंकी तीन जातियां — उन्होंने जान लिया कि मधुमक्खियोंके छत्तेमें तीन जातिकी मक्खियां बसती हैं । प्रथम तो परिश्रमी मक्खियां हैं । दूसरी सुस्त तथा निकम्मी मक्खियां हैं । तीसरी राजकुमारी तथा बेगमें हैं । जो बेगम मक्खियां हैं वे अण्डे देती हैं जो बेकाम तथा सुस्त नर मक्खियां हैं उनके सम्भोगसे अण्डे उत्पन्न होते हैं । परिश्रमी मक्खियां प्रत्येक दौड़ धूपके काय्यं किया करती हैं, मधु इकट्ठा करना उन्हींका कार्य है ।

इनके अग्रमें एक विचित्र प्रकारका सूँड होता है । जिसमें मधु भर लाती हैं । सूँडमें चालीस पेच होते हैं, उनके चारों ओर बहुत सुन्दर बाल उगे होते हैं । सूँडोंके पाँच भाग होते हैं, वे भाग इस प्रकार होते हैं कि, दो भाग तो उनके दोनों ओर और एक भाग उनके बीचमें होता है । बीचके भागमें मधु इकट्ठा होता है । सूँडके चारों ओरके बाल जिह्वाके समान हैं जिससे मधु चाटा जाता है । सूँड जो कुछ अपनी ओर खींचे उसको सुरक्षित रीतिसे लाकर मधुके खजानेमें एकत्रित कर देती हैं । इसके सुन्दर मुँह अनेक कार्यके लिये बने हुये हैं । इसकी छः टाँगें होती हैं । दो बिचली टाँगें छोटी होती हैं, शेषकी चार टाँगें बहुत लम्बी होती हैं अगली टाँगोंमें प्यालेके समान कुछ गड़हे मधु एकत्रित करनेके लिये बने होते हैं । इसके एक पांवमें कॅटियांसी लगी होती है । जिससे मधुके छत्तेपर सरलतापूर्वक घूम फिर सकती हैं । इसके पेटमें तीन भाग होते हैं—एक तो मधु एकत्रित करनेकी थैली, एक मोमकी थैली और तीसरी विषकी थैली होती है, जो थैली मधु एकत्रित करनेके लिये है सूँडसे मधु लेकर उसमें रख छोड़ती है । यह उसके आगे और नीचे बनी रहती हैं । उसके आगे एक थैली बनी है । उसकी राहसे उसमें मधु पड़ता है, वह मधुमक्खीका भोजन है, वह पेटमें जाकर हजम हो जाता है उसीसे उसका जीवन है जो भोजन करती है, उसको जब वह बाहर निकालती है तो मोम हो जाता है ।