कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 939, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंउसी पेटके पास एक हथियार है जिसको डंक कहते हैं वह भी बहुत विचित्र गुणके साथ बना है । दूरबीनसे देखा गया है कि, उसकी बनावट बहुत विचित्र है । उस हथियारमें दो डंक बने हुए हैं । दोनों डंकोंके लिये एक नेयाम बनी हुई है । वह डंक मारा चाहती है तो डंकको नेयामसे बाहर निकालती है डंक मार चुकनेके बाद नेयामसे विष खींचकर डंकमें भर देती है । डंककी जड़में दश बाल होते हैं, जिनके बलसे डंक बहुत पुष्ट है शीघ्र निकल नहीं सकता. हलाहल विष उनमेंसे निकलनेका मार्ग रखता है जिसके जोरसे दूसरे जीवको मृतक कर देती हैं । इस मक्खीकी पांच आंखें होती हैं, तीन आंखें तो उसके शिर पर होती हैं दो आंखें दोनों ओर होती हैं । दोनों आंखोंके बीचसे दो नलियां निकलती हैं वे दोनों ओर टेढ़ी होती हैं वे छूनेकी तीक्ष्ण इन्द्रिय हैं । वस्तुतः ये दोनों यन्त्र मक्खीके अत्यन्त उपयोगी हैं इन्हींसे अपनी कोठरियां बनाती हैं, अपने बच्चोंको खिलाती हैं, अपने खजानेको इकट्ठा करती है इसीसे वह अपने सजातीयको पहचानती है इस मक्खीके छत्तेकी कोठरियां छः पहले होती हैं उनमें मधु रक्खा जाता है, उससे बच्चोंका लालन पालन होता है, छत्तेमें दो दो मधु घर एक दूसरेकी ओर पीठ किये हुये होते हैं बहुत सिलसिलेवार बराबर होते हैं । इन दोनों कोठरियोंके बीच जो स्थान होता है उसमें दो मक्खियां स्वतंत्रतापूर्वक रह सकती हैं । चाहे एक दूसरेके निकट अथवा पृथक् पृथक् रहें । प्रत्येक कोठरी बहुत सुन्दर बनी हुई होती हैं, एक दूसरेसे तनिक भी बड़ी अथवा छोटी नहीं होती हैं । इस कारण थोडेही व्ययमें कोठरी बनानेका काम हो जाता है इसी प्रकार गृहकी बनावट बराबर बनती चली जाती है जैसेही एक मधुगृह युक्तिपूर्वक निर्मित किया जा चुका कुछ कोठरियां बन चुकीं उसी समय दूसरा और तीसरा बनना आरम्भ होता है । इसी प्रकार सब युक्तिपूर्वक बनता चला जाता है । जब तक छत्तेका कार्य सम्पूर्ण न हो ले मक्खियोंमेंसे केवल एक मक्खी मधुगृहकी नींव डालती है । नींव डालनेवाली मक्खी मोटे मोमको कुछ अपने कुछ दूसरेसे लेकर मिलाती है । उस मोमको अपने छिल्ले पावोंसे खींचकर अगले पावसे पकड़ ले आती है अपने मुँहकी तरीसे नरम तथा तर करती है जो मोम अन्यान्य मक्खियां उस गृह बनानेवाली मक्खीको देती हैं, उसको लेकर मकान बनानेवाली मक्खी अपने मधुगृहको बनाती जाती है । इस प्रकार एक दूसरीकी सहायक हुआ करती हैं जो कोठरियां सुस्त तथा निकम्मी मक्खियोंके लिये बनती हैं वे कुछ बड़ी होती हैं अन्यान्य कोठरियोंकी अपेक्षा सुदृढ़ और मधु-गृहके नीचे होती हैं । सबसे पीछे शाही महल होते हैं इनमें रानी रहती हैं । ये रानीके रहनेकी कोठरियां शहदखानेके बीचोबीच होती हैं । गिनतीमें तीनसे