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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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हूँ, क्योंकि तूने मेरा रंग हरा और चौंचे लाल बनायी है, माधव २ कहके मैं तेरा भजन करता हूँ।

भेड़—वीर २ कहकर पुकारती हैं कि, हे परमेश्वर ! मैंने क्या अपराध किया है कि, मैं विष्ठा खाती हूँ, हे प्रभु ! मुझको बचा ।

बैल—भजन करता है कि, ऐ मेरे उत्पन्न करनेवाले ! ऐ मेरे उत्पन्न करनेवाले परमेश्वर !! मुझको इस योनिसे मुक्त कर ।

चील्ह—भजन करती है कि, परमेश्वर ! न तेरा जन्म है न मरण, न तू कभी जाता है न आता है, तू सबका कल्याण कर्ता है । यह निरङ्कार निरङ्कार करके भजन करता है ।

पशुओंके भजनका वर्णन कौनकर सकता है ? सब गुप्तमें ईश्वरके भजनमें लगे रहते हैं, प्रगट भी उन लोगोंकी बोलीसे जान पड़ता है कि, सब भजन कर रहे हैं । जैसे तोता बोलता है तूही तुही तुही । पण्डुक बोलती है तू तू तू । मोर बोलता है या कयूम । सारस बोलती है या अजीज ।

कलगीदार छोटी चिड़या —जो गौरयेंसे भी छोटी होती है, उसके शिर-पर कलगी होती है और जहाँ आदमी कम आते जाते हैं, उजाड़ होती है वहाँ रहा करती है । उसका मुख्य भोजन सूखी और नरम मिट्टी है । कभी कभी खरबूजा आदिकका बीज मिलजाय तो उसे भी खाती है । यह पक्षी ऐसी निर्भय होती है कि, मनुष्य उसके निकट फिरा करे तो भी नहीं डरती, यह रात-भर भजन किया करती है । उसका शब्द है—तुही तुही निरङ्कार-तुही तुही निरङ्कार, पहर रात शेष रह जाती है ब्रह्म मूहूर्तका समय होता है । तो पृथ्वी और वृक्षको छोड़कर आकाशमें उड़ा करती है और “तुही निरङ्कार तुही निरङ्कार” ऐसा शब्द सूर्य निकलने तक किया करती है । दिन निकल आता है, थककर पृथ्वीपर गिर पड़ती है बहुत देर तक अचेत पड़ी रहती है, मुर्दोंके समान शरीरका कुछ भी चेत नहीं रहता, यहाँ तक कि, यदि किसी मनुष्य अथवा पशुके पगके तरे दब जाय अथवा कोई हिंसक पशु खा जाय तो भी कुछ चेत नहीं करती । कहते हैं कि, यदि कुत्ता उसको खाजाय तो पागल हो जाता है । वह अचेतसे सचेत होती है तब फिर अपने नित्यके भजनमें लग जाती है । ऐसे भजनानन्दीके समक्ष मनुष्योंका तपस्या कुछ नहीं है । यह पक्षी उजाड़में छोटे २ जलके डबरोंके किनारे रहती है उसका जल सूख जाता है तो उसकी नरम २ मिट्टी खाती है ऐसे समयमें भजन करती है कि, जिस समय तपस्वी और ताधु लोग नींदके वशमें पड़के अचेत सोये होते हैं । यह सत्य पुरुषकी ओरसे भजना-