कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextमाया तो विरजाके इसी पार रह जाती है तीनों लोकोंमें येही मुख्य हैं इनके बलकी कोई तुलना नहीं है ये यमोंके भी यम हैं काल भी इनके भयसे काम करता रहता है ॥ १५ ॥
ताते तीनों देवभय', ब्रह्मा विष्णु महेश ॥
चारि खानि तिन सिरजिया, मायाके उपदेश ॥ १६ ॥
ताते-उससे, ब्रह्मा-ब्रह्माजी, विष्णु-विष्णुजी, महेश-महादेवजी, ये तीनों-तीन, देव-देवता, भे-हुए, तिन-इन्होंने, मायाके-मायाके, उपदेश-बलसे, चारि-चारों, खानि-स्वेदज आदि, सिरजिया-रचा दिये ।
काल पायकर ब्रह्मा विष्णु और महेश उत्पन्न हुए इन्होंने मायाके बलसे चारि खानि चौरासी लाख जीव बना दिये ॥ १६ ॥
चारि वेद षट् शास्त्रउ, औ दश अष्ट पुरान ॥
आशा दै जग बांधिया, तीनों लोक भुलान ॥ १७ ॥
चारि-चारों वेद-वेद, औ-और, दश-दश, अष्ट-आठ, पुरान-पुराण, और षट्शास्त्र-छओ शास्त्रोंने, ऊ-भी, आशा-आश, दै-देकर, जग-संसारको, बांधिया-बांध दिया, उसमें, तीनों-तीनों, लोक-लोक, भुलान-भूल गये ।
चारि वेद, अठारह पुरान और छओ शास्त्रोंकी मायाने जीवोंको आशा देकर बांध दिया इसीमें तीनों लोकोंके प्राणी भूल रहे हैं ॥ १७ ॥
लख चौरासी धारमाँ, तहाँ जीव दिय बास ॥
चौदह यम रखवारिया, चारि वेद विश्वास ॥ १८ ॥
लख चौरासी-चौरासी लाखकी, धारमाँ-धारामें, तहाँ-उस जगह, जीव-जीवोंको, बास-निवास, दिया-दिया, जहाँ कि, चौदह-चौदह, यम-यमराज, रखवारिया-निगरानी करते हैं, और चारि वेद-चारों वेदोंका, विश्वास-विश्वास है ।
इस चौरासी लाख योनिकी धारावाले संसारमें इस जीवको उस जगह निवास दिया गया है कि, जहाँ चौदह यम इसकी निगरानी करते हैं एवम् यह चारों वेदोंका यथार्थ अर्थ न समझकर इतस्ततः विश्वास करते हैं ॥ १८ ॥
आपु आपु सुख सब रमें, एक अंडके माहिं ॥
उत्पत्ति परलय दुःख सुख, फिरि आवहिं फिरि जाहिं ॥ १९ ॥
एक एकही, अण्डके-ब्रह्माण्डके, माहिं-भीतर, आपु आपु-अपने अपने, सुख-आनन्दमें, सब-सारे जीव, रमें-रम रहे हैं, इस कारण इसीमें, उत्पत्ति-