कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextजब—जिस समय, अक्षरके—अक्षरपदवाच्य नारायणकी, नींद—निद्रा गे—चली गई, तब, निरबान्-निराकार, सुरति—चैतन्य, दबी—सबमें प्रविष्ट हुआ, श्याम वरण-श्याम रंगका चतुर्भुजी, यक—एक, अण्ड रूप, है— होकर—सो, वह, जलमें—पानीमें, उतरान—रहने लगा ।
अक्षरपदवाच्य नारायण भगवान्को योगमायाने जगा दिया वह श्यामल कोमलांग चतुर्भुजी होकर पानीमें निवास करने लगा ॥ १२ ॥
अक्षर घटमें ऊपजे, व्याकुल संशय शूल ॥
किन अंडा निरमाइया, कहा अंडका मूल ॥ १३ ॥
अक्षर—नारायणके, घटमें—नाभिमें, ऊपजे—कमल उत्पन्न होता है, उससे अण्डा—यह ब्रह्माण्ड, किन—किसने, निरमाइया—बनाया, अण्डका—इस, अण्डेका, मूल—जल, कहाँ कौनसी जगह है. इस, संशय—सन्देह रूपी, शूल कांटेसे व्याकुल—घबरा गया ।
नारायणकी नाभिके कमलसे ब्रह्मा उत्पन्न हुआ उसे सन्देह हुआ कि, इस ब्रह्माण्डको किसने बनाया, एवं इसकी जड़ कहाँ है ॥ १३ ॥
तेही अंडके मुखपर, लगी शब्दकी छाप ॥
अक्षर दृष्टिसे फूटिया, दश द्वारे कढ़ि बाप ॥ १४ ॥
तेही—उसी, अण्डके—ब्रह्मारूपी पिण्डके, मुखपर—मुंहपर, शब्दकी—वेदोंके सारका, छाप—चिह्न, लगी—लगा, अक्षर—समष्टि जीवकी, दृष्टिसे—जगत् मुख, दृष्टिसे, बाप—मायाशबलित ब्रह्म, दश—दश, द्वारे—इन्द्रियोंसे, कढ़ि—निकलकर, फूटिया—फँल गया ।
नारायणने ब्रह्माको ओम्का उपदेश दिया ब्रह्माने उसका जप किया उसीसे चारों वेदोंका प्राकट्य हुआ । वेदोंका भी जगत् मुख अर्थ देखा गया उस समय माया शबलित ब्रह्म दशों इन्द्रियोंका विषय और इन्द्रिय बनकर बाहिर निकल संसार बन गया ॥ ४ ॥
तेहिंते ज्योति निरज्जनौ प्रकटे रूपनिधान ॥
काल अपरबल वीर भा, तीन लोक परधान ॥ १५ ॥
तेहिंते—उसी, रामनामसे, रूपनिधान—रूपके खजाने, निरंजनौ—माया रहित ज्योति महाविष्णु, प्रकटे—उत्पन्न हुए येही, तीन—तीनों, लोक—लोकोंमें, परधान—मुख्य, अपरबल—अमित बलवाले, वीर—बलवान्, काल—काल, भा—हुए ।
इसी नामसे विरजा पार निवासी श्री महाविष्णु भये ये मायासे परे हैं