कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 970, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंतेज अण्ड आचिन्त्यका, दीन्हो सकल पसार ॥
अण्ड शिखा पर बैठिके अधर दीप निरधार ॥ ९ ॥
आचिन्त्यका—चिन्तनमें न आनेवाले रामका, तेज, अण्ड—अण्डेकी सूरतमें कल्पित किया गया जो तेज रेफ उसका माया मुख अर्थ जो पराशक्ति है उसने, सकल-सारा, पसार—फँलाव, दीन्हों—कर दिया, वही अण्ड-ब्रह्माण्डकी, शिखापर—चोटीपर, बैठिके—बैठकर, अधर—नीचेकी ओर, दीप—प्रकाशका, निरधार—निर्माण किया ।
रके जगत मुख अर्थ पराआद्या शक्तिने सारे संसारको बनाकर खड़ा कर दिया वही इस ब्रह्माण्डकी चोटीपर बैठकर नीचेके लोकोंको प्रकाशित कर रही है ॥ ९ ॥
ते अचिन्तके प्रेमते, उपजे अक्षर सार ॥
चारि अंश निरमाइया, चारि वेद विस्तार ॥ १० ॥
ते-उस, अचिन्तके—भगवान् रामके नाम, प्रेमते—प्रेमके कारण, सार—सबमें प्रधान, अक्षर-ओम्, उपज्यो-उत्पन्न हुआ, उसके, चारि-चार, अंश—भाग, निरमाइया—निरमाण—किये, उसीसे चारि-चार, वेद-वेदोंका, विस्तार—निर्माण हुआ ।
रामनामके जानने की चिन्तासे इसीसे ओम् शब्द प्रकट हुआ, यही सार अक्षर है इसके अ, उ, म् और बिन्दुसे चार वेद उत्पन्न हुए ॥ १० ॥
तब अक्षरका दीनिया, नींद मोह अलसान ॥
वे समरथ अविगति करी, मर्म कोई नहिं जान ॥ ११ ॥
तब—इसके बाद, योगमायाने, अक्षरका ओम् शब्दवाच्य ईश्वरको नींद—निद्रा, मोह-असावधानी, और अलसान—आलस्य, दीनिया—देदिये वे वेदोंने, अविगति—नहीं समझमें आनेवाले, समरथ—समर्थ भगवान् रामकी स्तुति, करी—की है, पर कइ—कोई, मर्म—इस तात्पर्यको, न-नहीं, जान-जानता ।
योगमायाने ईश्वरको नींद मोह और आलस्य देदिया, वेदोंने भगवान् रामकी बड़ी प्रशंसा की है पर इसे कोई समझ नहीं सकता सब माया मुख अर्थ करके भूल रहे हैं ॥ ११ ॥
जब अक्षरके नींद गै, देवी सुरति निरवान ॥
श्यामवरण यक अंड है, सो जलमें उत्तरान ॥ १२ ॥