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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

by कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास

Source: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

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( ४ )

ज्ञानसागर

धर्मदास वचन-चौपाई

हे स्वामी मोहि आदि सुनाओ । कैसे पुरुष वह लोक बनाओ ॥ कैसे द्रौप करी निर्मावा । होहु दयाल सो मोहि बतावा ॥

साहव कबीर वचन

सुन हंसा तोहे कहब विचारी । लोकद्रौप जिमि करी सम्हारी ॥ इते अदेह दुतिया नहि काळ । सुरति सनेही जान कछु भाळ ॥ नहि तहाँ पांच तत्त्व परकाशा । गुण तीनों न छिनहीं अकाशा ॥ नहि तहाँ ज्योति निरंजन राया । नहि तहाँ दशौ जनम निर्माया ॥ नहि तहाँ ब्रह्मा विष्णु मद्देशा । आदि भवानी गवरि गनेशा ॥ नहि तहाँ जीव सीव कर मूला । नहि अनंग जिह्विते सब फूला ॥ नहि तहाँ ऋषी सहस्र अठासी । षट् दर्शन न सिद्ध चौरासी ॥ सात वार पन्द्रह तिथि नाहीं । आदि अंत नहि कालकी छाहीं ॥

छंद

नहि कूर्म चक्रिय वारि पर्वत अग्नि वसुधा नाहि हो । शून्य विशून्य न तहां होई अगाध महिमा सो कहो ॥ जिमि पुढुप तिमि छाया राखो बास भरो ता संग मई । स्वरूप बूझो अगम आदि महिमा अक्षर अंग मई ॥ सोरठा-प्रकट कहो जिमि रूप, देखो हृदय विचारिके । आदिहि रूप स्वरूप, जिहि ते सकल प्रकाश भयो ॥

चौपाई

तिनहि भयो पुन गुप्त निवासा । स्वासा सार ते पुहुमि प्रकाशा ॥ सोई पुढुप विना नर नाला । ज्योति अनेकहोत झल हाला ॥ पुढुप मनोहर सेतई भाळ । पुढुप द्रौप सबही निर्माळ ॥ अजे सरोवर कीन्हो सारा । अष्ट कमल ते आठौं वारा ॥ पोडश मुत तबही निर्मावा । कछु प्रगट कछु गुप्त प्रभावा ॥