BharatKosha
Back to the archive

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

by कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास

Source: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished2,136 pages

प्रारंभिक पृष्ठ (ज्ञान सागर)

Page 1Permalink

कबीरसागर

(सम्पूर्ण ११ भाग)

खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई.

Page 2Permalink

This image shows a blank, aged, light gray page, likely an endpaper or flyleaf from an old book. The paper has a slightly textured appearance with subtle variations in tone. A prominent vertical crease or fold line is visible along the right edge, suggesting the page was once part of a bound volume. There are no markings, text, or illustrations on the page.

Page 3Permalink

कबीरसागर

( सम्पूर्ण ११ भाग )

मूल्य : १२०० रुपये मात्र

खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई

Page 4Permalink

हमारे प्रकाशनों की अधिक जानकारी व खरीद के लिये हमारे निजी स्थान

खेमराज श्रीकृष्णदास

अध्यक्ष : श्रीवेंकटेश्वर प्रेस,

११/१०१, खेमराज श्रीकृष्णदास मार्ग,

७ वी खेतवाडी बैंक रोड कान्नी,

मुंबई - ४०० ००४.

दूरभाष/फैक्स-०२२-२३८५७४५६.

खेमराज श्रीकृष्णदास-

६६, हडप्सर इण्डस्ट्रियल इस्टेट,

पुणे - ४११ ०१३.

दूरभाष-०२०-२६८७१०२५.

गंगाविष्णु श्रीकृष्णदास,

लक्ष्मी वेंकटेश्वर प्रेस व बुक डिपो

श्रीलक्ष्मीवेंकटेश्वर प्रेस बिल्डींग,

बुना छापाखाना गली, अहिल्याबाई चौक,

कल्याण, जि. ठाणे, महाराष्ट्र - ४२१ ३०१

दूरभाष - ०२५१-२२०९०६१.

खेमराज श्रीकृष्णदास

चौक, वाराणसी (उ.प्र.) २२१ ००१

दूरभाष - ०५४२-२४२००७८.

© सर्वाधिकार : प्रकाशक द्वारा सुरक्षित

मुद्रक एवं प्रकाशक:

खेमराज श्रीकृष्णदास TM,

अध्यक्ष : श्रीवेंकटेश्वर प्रेस,

खेमराज श्रीकृष्णदास मार्ग,

मुंबई - ४०० ००४.

Printers & Publishers

Khemraj Shrikrishnadass

Prop: Shri Venkateshwar Press

Khemraj Shrikrishnadass Marg,

7th Khetwadi, Mumbai - 400 004.

Web Site : http://www.khe-shri.com

E-mail : khemraj@vsnl.com

Printed by Sanjay Bajaj for M/s Khemraj Shrikrishnadass

Prop. Shri Venkateshwar Press, Mumbai-400004,

at their Shri Venkateshwar Press, 66 Hadapsar Industrial Estate,

Pune -411 013.

Page 5Permalink

सत्य

कबीरसागर

ज्ञानसागर

(प्रथम खण्ड)

कबीरपंथी भारत पथिक स्वामी युगलानन्द (विहारी) द्वारा परिष्कृत

मुद्रक एवं प्रकाशकः

खेमाराजा श्रीकृष्णदासा,

अध्यक्ष : श्रीवेंकटेश्वर प्रेस,

खेमराज श्रीकृष्णदास मार्ग, मुंबई - ४०० ००४.

नं. १ कबीरसागर -

Page 6Permalink

संस्करण : फरवरी २०२०, संवत् २०७६

मूल्य : १०० रुपये मात्र ।

मुद्रक एवं प्रकाशक:

खेमराज श्रीकृष्णदासTM

अध्यक्ष : श्रीवेंकटेश्वर प्रेस,

खेमराज श्रीकृष्णदास मार्ग,

मुंबई - ४०० ००४.

Printers & Publishers :

Khemraj Shrikrishnadass,

Prop: Shri Venkateshwar Press,

Khemraj Shrikrishnadass Marg, 7th Khetwadi,

Mumbai - 400 004.

Web Site : http://www.Khe-shri.com

Email : khemraj@vsnl.com

Printed by Sanjay Bajaj For M/s. Khemraj Shrikrishnadass

Proprietors Shri Venkateshwar Press, Mumbai - 400 004,

at their Shri Venkateshwar Press, 86 Hadapsar Industrial

Estate, Pune 411 013.

Page 7Permalink

सत्यनाम

A black and white woodcut-style illustration of a bearded man, likely a Sikh Guru, seated in a meditative posture on an ornate throne. He wears a tall, pointed turban and holds a mala. A large, ornate umbrella is positioned above him. A small pot is visible on the floor to the left.

श्री कबीर साहिब

Page 8Permalink

महात्म्यम्

श्री श्री गणेशाय नमः

A faint, stylized illustration of a seated figure, likely Lord Ganesha, holding a conch shell and a sword, surrounded by a decorative border.

श्री गणेशाय नमः

Page 9Permalink

श्रीज्ञानसागरकी अनुक्रमणिका

विषय.पृष्ठ
मुक्तिभेद, अमरलोक वर्णन
सत्य पुरुष का वर्णन
सृष्टि उत्पत्ति वर्णन प्रारंभ
द्वीप वर्णन
धर्मरायके द्वीप नहीं पानेका वर्णन
धर्मरायका सत्य पुरुषकी सेवा करके द्वीप पानेका वर्णन । सहज की विन्ती
धर्मरायका अधिकस्थान मांगना और मान-सरोवरका पाना
धर्मरायका कामिनीको निगल जाना
पुरुषका निरञ्जनको शाप देना
पुरुषका योगसंतायनको जीवोंको कालके फन्दसे छुड़ानेकी आज्ञा देना और योग संतायन तथा कालका युद्ध
कन्याका धर्मरायके पटसे निकलना और धर्मरायका उसे ठगना तथा दोनोंका मिल-कर सृष्टिकी रचना करनेका विचार करना और रचना११
चौदह यमका नाम और कर्म१२
कालका जीवोंको दुःखित करना और सत्य पुरुषकी आज्ञासे ज्ञानीजीका पृथ्वी-पर आना१३
धर्मराय और ज्ञानीजीका वार्तालाप और कोल करार
धर्मरायका ज्ञानीजीसे जगन्नाथ की स्थापनाका वचन लेना
सृष्टि उत्पत्तिकी कथा वर्णन१६
तीन देवका प्रगट होना और आदि मायाका तीनोंका काम बताना१७
विषय.पृष्ठ.
ब्रह्माका समुद्र खुदवाना१८
श्वानीकी आज्ञासे तीनों देवका समुद्र मंथन करना और तीन कन्याका प्रकट होना
श्वानीकी आज्ञासे तीनों देवका छारे समुद्रको मंथन करना और उससे वेद आदिक प्रकट होना१९
चार खानिकी उत्पत्ति२०
ब्रह्माको वेद पढ़कर संदेह होना और माताकी आज्ञासे पिताकी खोजमें जाना२१
मायाका मायत्रीको उत्पन्न करके ब्रह्माको बुलानेके लिये भजना और मायाका ब्रह्माको झूठ बोलनेके कारण शाप देकर निरंजन से आप शाप पाना२२
मायाका विष्णुको पिताके खोजके लिये भजना । विष्णुका शुक्लसे श्याम हो जाना । मायाके पास आकर विष्णुका सत्य बोलना और तीनों लोकका राज्य पाना२३
मायाका महादेवको वर देना२४
तीनों देवका मानुषी सृष्टिकी उत्पत्ति करना । मनुष्य की अधिकतासे पीड़ित होकर पृथ्वीका गौरूपधरके विष्णुके समीप जाना और विष्णुका अवतार लेनेका वचन देना२५
अवतारों की कथा
बलिचरित्र (वामन अवतार)२७
सनक सनन्दन चरित्र२९
Page 10Permalink

( ६ )

ज्ञानसागरकी अनुक्रमणिका

विषय.पृष्ठ.विषय.पृष्ठ.
नारदचरित्र३१कलियुग में कबीरसाहबका प्रगटघ६७
श्वेषणचरित्र३२जगन्नाथके मन्दिरकी स्थापना६८
सती दाहकी कथा३३चन्दवारमें कबीरसाहबका जाना७१
शिवकी समाधि छुड़ानेके लिये कामदेवका प्रयत्न करना और नारदका कामवश होना तथा विष्णुको शाप देना३४नूरीको मिलनेकी कथा७२
विष्णुका दशरथके घर अवतार लेना अर्थात् रामकथावर्णन३५नूरीके पूर्वजन्मकी कथा"
कृष्णचरित्रवर्णन४४बाललीला और रामानन्दको गुह करनेका वर्णन७५
पाण्डव यज्ञ तथा सुपच मुदशान कथा-वर्णन५२सिकन्दरसाहूकी वार्ता और रामानन्दजीका कत्ल होना७७
कृष्णका स्वर्गारोहण और जगन्नाथकी स्थापना५४मगहर गमनकी कथा"
निकलंक अवतारकी वार्ता५५रतनाकी कथा८०
उत्पति परलयका लेखा५६चौका आरतीकी विधि८३
कबीर वचनयोग कर्मका वर्णन८५
कृत्ययुगमें कबीरसाहबका पृथ्वीपर आना५७अष्ट कमल वर्णन८६
त्रेतामें कबीर साहबका पृथ्वीपर आना५८गैही रहनी९०
द्वापरमें कबीरसाहबका पृथ्वीपर आना६१आरतीका योगरूपसे वर्णन९१
नुमतीकी कथा"योगकी श्रेष्ठता"
पुनोकी बड़ाई९२
गुहवाके लक्षण९३
गुरुलक्षण९६
परलोकका मार्ग । सत्यलोक और हंसका वर्णन९७
भविष्यत् कथा । चक्रवर्षीका वर्णन१०५

इति अनुक्रमणिका समाप्त

मुक्तिभेद, अमरलोक वर्णन

Page 11Permalink

सत्यसुकृत, आदि अदली, अजर, अचिन्त, पुरुष, मुनीन्द्र, करुणामय, कबीर, सुरति, योग संतायन, धनी धर्मदास, चुरामणिनाम, सुदर्शन नाम, कुलपति नाम, प्रमोधगुरुवालापीरनाम, कमल- नाम, अमोलनाम, सुरतिसनेहीनाम, हकनाम, पाकनाम, प्रकट नाम, धीरज नाम, उग्र नाम, दयानामसाहबकी दया, वंश व्यालीसकी दया.

अथ ज्ञानसागर प्रारम्भः

सोरठा-सत्यनाम है सार, बूझो संत विवेक करि । उतरो भव जल पार, सतगुरुको उपदेश यह ॥ सतगुरु दीनदयाल, सुमिरो मन चित एक करि । छेड़ सके नहिं काल, अगम शब्द प्रमाण इमि ॥ बंदौं गुरु पद कंज, बंदीछोर दयाल प्रभु । तुम चरणन मन रंज, देत दान जो मुक्ति फल ॥

चोपाई

मुक्ति भेद मैं कहौं विचारी । ता कहैं नहिं जानत संसारी ॥ बहु आनंद होत तिहिं ठाऊँ । संशय रहित अमरपुर गाऊँ ॥

Page 12Permalink

(२)

ज्ञानसागर

तहँवा रोग सोग नहिं होई । क्रीडा विनोद करे सब कोई ॥ चंद्र न सूर दिवस नहिं राती । वरण भेद नहिं जाति अजाती ॥ तहँवा जरा मरन नहिं होई । बहु आनंद करै सब कोई ॥ पुष्प विमान सदा उजियारा । अमृत भोजन करत अहारा ॥ काया सुन्दर ताहि प्रमाना । उदित भये जनु षोडस भाना ॥ इतनौ एक हंस उजियारा । शोभित चिकुर तहां जनु तारा ॥ विमल बास तहँवां बिगसाई । योजन चार लौं बास उड़ाई ॥ सदा मनोहर क्षत्र सिर छाजा । बूझ न परै रंक औ राजा ॥ नहिं तहां काल वचनकी खानी । अमृत वचन बोल भल वानी ॥ आलस निद्रा नहीं मकासा । बहुत प्रेम सुख करै विलासा ॥

साखी-अस सुख है हमरे घरे, कहै कवीर समुझाय ।

सत्त शब्दको जानिके, असथिर बैठे जाय ॥

चौपाई

सुन धर्मनि मैं कहौं समुझाई । एक नाम खोजो चित लाई ॥ जिहिं सुमिरत जीव होय उबारा । जाते उत्तरी भन जल पारा ॥ काल वीर बांका बड़ होई । बिना नाम बानै नहिं कोई ॥ काल गरल है तिमिर अपारा । सुमिरत नाम होय उजियारा ॥ काल फांस डारे गल माहीं । नाम खड़ काटत पल माहीं ॥ काल जँजाल है गरल स्वभाऊ । नाम सुधारस विषथ बुझाऊ ॥ विषकी लहर मतो संसारा । नहिं कछु सुझे वार न पारा ॥ सुर नर माते नाम विहूना । औट मुये ज्यों जल बिन मीना ॥ भूल परै पाखँड व्यवहारा । तीरथ वृत्त औ नेम अचारा ॥ सगुण जोग जुगति जो गावै । बिना नाम मुक्ती नहिं पावै ॥

साखी-गुण तीनोंकी भक्तिमें, भूल परचो संसार ।

कहै कवीर निज नाम विन, कैसे उत्तरे पार ॥

सत्य पुरुष का वर्णन

Page 13Permalink

ज्ञानसागर

( ३ )

धर्मदास वचन-चौपाई

विनकैं स्वामी दोह कर जोरी । कहौ गुसाईं नामकी डोरी ॥ निरंकार निरंजन नाऊं । जोत स्वरूप सुमरत सब ठाऊं ॥ गावहि विद्या वेद अनूपा । जगरचना कियो ज्योति सरूपा ॥ भक्त वत्सल निजनाम कहाई । जिन यह रचि सृष्टि दुनियाई ॥ सोई पुरुष कि आहि निनारा । सो मोहि स्वामी कहौ व्यवहारा ॥ जिह्ति होय जीवको काजा । सो मैं करहुँ छोड़ कुल लाजा ॥ होहु दयाल दयानिधि स्वामी । बोलहु वचन सुधा रस वानी ॥ नाम प्रभाव निज मोहि बताओ । होहु दयाल मम तृषा बुझाओ ॥

साखी-जो कुछ मुझे सन्देश है, सो मोहि कहो समुझाय । निश्चय कर गुरु मानिहौँ, औ बंदो तुम पायँ ॥

साहिब कबीर वचन-चौपाई

तुमसों कहौँ जो नाम विचारी । ज्योति नहीं वह पुरुष न नारी ॥ तीन लोक ते भिन्न पसारा । जगमग जोत जहाँ उजियारा ॥ सदा वसंत होत तिहि ठाऊं । संशय रहित अमरपुर गाऊं ॥ तहँवा जाय अटल सो होई । धरमराय आवत फिरि रोई ॥ वरनों लोक सुनो सत भाऊ । जाहि लोकतें हम चलि आऊ ॥ जगमग जोती बहुत सुहावन । दीप अनेक गिने को पावन ॥ जगमग ज्योति सदा उजियारा । करी अनेक गिने को पारा ॥

छंद

जहँ ज्योति जगमग अति सुहावन तत्त्व वारिध अति चलै । कहत दोई कुल तिमिर मनो पन्न झलहल हलै ॥ फेन उडगन बहन लागे शसि मनोहर हेरि को । किमि देउँ पटतर बूझ देखो भाव नहिँ वहाँ जोर को ॥ सोरठा-शोभा अगम अपार, वर्णत बनेँ न एक मुख । कही न जात विसतार, जो मुख होवै पदम सत ॥

सृष्टि उत्पत्ति वर्णन प्रारंभ

Page 14Permalink

( ४ )

ज्ञानसागर

धर्मदास वचन-चौपाई

हे स्वामी मोहि आदि सुनाओ । कैसे पुरुष वह लोक बनाओ ॥ कैसे द्रौप करी निर्मावा । होहु दयाल सो मोहि बतावा ॥

साहव कबीर वचन

सुन हंसा तोहे कहब विचारी । लोकद्रौप जिमि करी सम्हारी ॥ इते अदेह दुतिया नहि काळ । सुरति सनेही जान कछु भाळ ॥ नहि तहाँ पांच तत्त्व परकाशा । गुण तीनों न छिनहीं अकाशा ॥ नहि तहाँ ज्योति निरंजन राया । नहि तहाँ दशौ जनम निर्माया ॥ नहि तहाँ ब्रह्मा विष्णु मद्देशा । आदि भवानी गवरि गनेशा ॥ नहि तहाँ जीव सीव कर मूला । नहि अनंग जिह्विते सब फूला ॥ नहि तहाँ ऋषी सहस्र अठासी । षट् दर्शन न सिद्ध चौरासी ॥ सात वार पन्द्रह तिथि नाहीं । आदि अंत नहि कालकी छाहीं ॥

छंद

नहि कूर्म चक्रिय वारि पर्वत अग्नि वसुधा नाहि हो । शून्य विशून्य न तहां होई अगाध महिमा सो कहो ॥ जिमि पुढुप तिमि छाया राखो बास भरो ता संग मई । स्वरूप बूझो अगम आदि महिमा अक्षर अंग मई ॥ सोरठा-प्रकट कहो जिमि रूप, देखो हृदय विचारिके । आदिहि रूप स्वरूप, जिहि ते सकल प्रकाश भयो ॥

चौपाई

तिनहि भयो पुन गुप्त निवासा । स्वासा सार ते पुहुमि प्रकाशा ॥ सोई पुढुप विना नर नाला । ज्योति अनेकहोत झल हाला ॥ पुढुप मनोहर सेतई भाळ । पुढुप द्रौप सबही निर्माळ ॥ अजे सरोवर कीन्हो सारा । अष्ट कमल ते आठौं वारा ॥ पोडश मुत तबही निर्मावा । कछु प्रगट कछु गुप्त प्रभावा ॥

द्वीप वर्णन

Page 15Permalink

ज्ञानसागर

( ५ )

पुढूप द्वीप किमि करव बखाना । आदि ब्रह्म तहँवा अस्थाना ॥ सत्रह संख पंखुरी राजै । नौ सौ संख द्वीप तहाँ छाजै ॥ तेरह संख सुरंग अपारा । तिहिन्हिं जान काल बरियारा ॥

धर्मदास वचन

धर्मदास कहैं सुनो गुसाई । द्वीप अनेक पुरुष के ठाई ॥ सो स्वामी मोहि भेद बताओ । दया करो जनि मोहि डुराओ ॥ तुमसों वरनि कहौं सत भाऊँ । मैं मनो आज महा निधि पाऊँ ॥ सुनत वचन गदगद सिर मोरा । थकित भये जनु चंद्र चकोरा ॥ मैं भुजंग तुम मलय्या गीरा । करहु दया मम दुखित शरीरा ॥

साहिब कबीर वचन

धर्मदास पूछो जो मोहीं । सो मैं भेद कहौं सब तोहीं ॥ कमल असंख भेद कहँ जाना । तहँवा पुरुष रहे निर्वाना ॥ मोही सतगुरु दियो बताई । सो सब भेद कहौं तुम पाई ॥ सत पंखुरी कमल निवासा । तहँवा कीन्ह आप रहि वासा ॥

साखी-शीश दरस अति निर्मल, काया न दीसत कोश । पदम संपुट लग रहै, बानी विगसन होय ॥

चौपाई

प्रगट द्वार जब देखौं शीशा । धर्मनि हिये देखौं अहै ईशा ॥ पाइर द्वीप जहँ निर्मल ठौरा । सो सब भेद कहौं कछु औरा ॥ अंबू द्वीप हंस को थाना । पाइर द्वीप पुढूप निर्वाना ॥ नौ सौ करी ताहि के हीठा । गुरु प्रसाद सबै हम दीठा ॥ तहाँ आइ पुन पाइर द्वीपा । मंजुल मंगल करी समीपा ॥ तहँवा जाइ अटल सो होई । धर्मराज आवै फिर रोई ॥ द्वीप अनेक औ करी अनेका । पाइर द्वीप हंस के थेका ॥ चार करी हैं सब से सारा । बहु शोभा तहँ रूप अपारा ॥

धर्मरायके द्वीप नहीं पानेका वर्णन

Page 16Permalink

( ६ )

ज्ञानसागर

साखी-करी भेद सुन हंसा, आई देखु सत लोक । गुरु जो बतावहीं, मिट जाई सब धोख ॥

धर्मदास बचन-चौपाई

हे स्वामी मैं विनऊं तोही । कछु संशय जिव उपज्यो मोही ॥ धर्मराय नहीं पायब दीपा । और सबै सुत द्रौप समीपा ॥ कारण कौन दरस नहीं होई । कहौ अगम जानि राखो गोई ॥

साहिब कवीर बचन

जो तुम पूछो अगम सन्देसा । सो सब तोहि कहौ उपदेसा ॥ आदि पुरुष अस कीन्हो साजा । पाँच बुन्द हुलास उपराजा ॥ बुन्दहि बुन्द अंड परकाशा । धर्म धीर जेहि अंड निवासा ॥ अटल जोत सुरंग उजियारा । तहँवा अंड रहै मनियारा ॥ धर्म धीर जबही उत्पाना । आदि ब्रह्म तबही सकुचाना ॥ एकहि मूल सबै उपजाई । मेटचो तेज अंड कुन्याई ॥

साखी-तेज रह्यो जिहि अंड मो, तेहि नहीं दीन्हौ ठौर । तेहिते उपज्यो धर्म अब, वंश अगिन के जोर ॥

चौपाई

बावन लक्ष बेर अनुमाना । मेटो न मिटत शब्द परवाना ॥ एकहि मूल सबै उपजाई । मिटै न अंड तेज अन्याई ॥ धर्मराय है काल अँकुरा । उपजो तहाँ काल कौ मुरा ॥ तबहि पुरुष अज जुगत विचारा । रहै धर्म द्रौप सो न्यारा ॥ जोपै रहै सदा सिव काई । तौ एक द्रौप तुमहि निर्माई ॥ पुरुष शब्द ते सबै उपराजा । सेवा करें सुत अति अनुरागा ॥ जानै भेद न दूसर कोई । उत्पनि सबकी बाहिर होई ॥ अभिअन्तर जो उत्पति होई । काया दरश पाय सब कोई ॥ काया दरश सुरति इक पावे । संगहि द्रौप सबै निर्मावे ॥

धर्मरायका सत्य पुरुषकी सेवा करके द्वीप पानेका वर्णन । सहज की विन्ती

Page 17Permalink

ज्ञानसागर

( ७ )

धर्म धीर नहि पावे द्वीपा । और सबै सुत द्वीप सर्मीपा ॥ धर्मराय अस कीन्ह बनाई । कर सेवा तेहि जागहि आई ॥ सेवा बहुत भांति सो किएऊ । आदि पुरुष तब हर्षित भयेऊ ॥ साखी-सेवा कीन्ही धर्म बड़, दियो ठौर अब सोय । जाय रहो वहि द्वीप में, सेवा निर्फ़ल न होय ॥

चौपाई

सात द्वीप कौ पायो राजू । भयो आनन्द धर्म मन गाजू ॥ सेवा करि पुन कीन्ह निहोरा । सुनो सहज तुम आता मोरा ॥ सेवा बसहि द्वीप मैं पाएऊँ । कैसोरचो मोहि गम्यन आएऊँ ॥ पुरुष सों विनती करु यह भारी । हे आता मैं तुम बलिहारी ॥ करिहौं सोई जो आज्ञा पाऊँ । कैसे मैं नव खंड बनाऊँ ॥ चले सहज जहँ द्वीप अमाना । कीन्ह जाय दण्डवत प्रणामा ॥ बहुविधि विनती सहज कियो जबही । बेग पुहुप बानी भई त ही ॥ पुरुष वाणी ते भया उजियारा । सुनहु सहज तुम वचन हमारा ॥ पक्षि पालना पाय है अंडा । सो लै धर्म रचै नव खंडा ॥ चले सहज तब बार न लावा । धर्म धीरसौं मता सुनावा ॥ साखी-सुनत संदेशो पुरुष को, धर्म शीस तब नाव । पायो आज्ञा पुरुष की, अब फाबी मो दांव ॥

चौपाई

सुनत संदेश भयो हरषंता । आन अंड जो चले तुरंता ॥ देखो धर्म जब कूर्म शरीरा । बारह पालंग है बल वीरा ॥ नव पालंग धर्म परमाना । बने न घात तब करे तिवाँना ॥ धावहि दशहू दिशा रिसाई । कैसे अंड लेऊँ मैं जाई ॥ तबहि उक्ति अस कीन्ह बनाई । तोरि शीस अस करचो उपाई ॥ शीस कीन्ह तब नख सौं छीना । अमी अंक तोरि कियो मीना ॥

धर्मरायका अधिकस्थान मांगना और मान-सरोवरका पाना

Page 18Permalink

( ८ )

ज्ञानसागर

शीस तोरि लियो द्वीप अपारा । तबहि धर्म भयो बरियारा ॥ पांचौ तत्त्व अंडसौं लीन्हा । गुन तीनों सुशीस कर कीन्हा ॥ पांचौ तत्त्व तीन गुन सारा । यही धर्म सब कीन्ह पसारा ॥ तब कियो नीर निरंजन राया । मीन रूप तबही उपजाया ॥ करि चरित्र धर्म तब आया । आज सहजसों विनती लाया ॥ साखी-जाय कहौ तुम पुरुष सों, बहु सेवा मैं कीन्ह । सब सुत रहिहैं लोकमहैं, नव खँड हम कहैं दीन्ह ॥

चोपाई

इतने में नहि मोर रहाऊँ । जहँवा रहव देव मोहि ठाऊँ ॥ चले सहज पुरुष पर जबहीं । विनती धर्म कीन्ह पुनि तबहीं ॥ मांग्यो बीज कीन्ह बड़ लोभा । जातैं द्वीप पावों मैं शोभा ॥ सहज विनय पुरुष सों कीन्हा । हे स्वामि तुव सुन बल हीना ॥ मांगै और ठौर पुनि सोई । धर्म धीर जो तुव सुत बल होई ॥ अति अधीन मांगै जौ बीजे । सोहे द्वीप पुहुप वहि दीजे ॥ तबहि पुरुष सेवा वश भयऊ । अष्टांगी कामिनि सो दयऊ ॥ मान सरोवर ताकर नाऊँ । सोऊ दियो धर्म कहैं ठाऊँ ॥ अष्टांगी कन्या उत्पानी । जासौं कहिये आदि भवानी ॥ रूप अनूप शोभा अधिकार्ई । कन्या मान सरोवर आई ॥ साखी-चौरासी लक्ष जीव सब, मूल बीजके संग । ये सब मान सरोवरा, रच्यो धर्म बड रंग ॥

चोपाई

सहज संदेशो ल्याये जहँवा । धर्म धीर ठाढे हैं तहँवा ॥ कह्यो संदेश धर्म मन गाजा । मान सरोवर जाइ विराजा ॥ साखी-देखि रूप कामिनि कौ, पल भर रह्यो न जाइ । आगे पीछे ना सोचिया, ताकौ लीन्हेसि खाइ ॥

पुरुषका निरञ्जनको शाप देना

Page 19Permalink

ज्ञानसागर

( ९ )

चौपाई

कन्या सों अस कीन्ह अन्याई । सहजसों लियो जो तुरत बुझाई ॥ यहै चरित पुरुष जब देखा । दीन्हें शाप सो कहों विशेखा ॥ सवा लक्ष जीव करौ आहारा । तऊ न ऊदर भैर तुम्हारा ॥ सुमिरन कूर्म पुरुष को कीन्हा । अहहो पुरुष धरम सिरछीन्हा ॥ तुव आज्ञा मैं अंड जो दीन्हा । धर्मराज काहे सिर लीन्हा ॥ सुनत वचन प्रभु बहुत रिसाने । जोगजीत तबही उतपाने ॥ आज्ञा भई तुम वेग सिधारी । धर्मराज कहैं मार निकारी ॥ आज्ञा मांग चले तब ज्ञानी । धर्मराय सो बातैं ठानी ॥ अरे पापी तू पुरुष को चोरा । भागहु वेग कहा सुन मोरा ॥ सुनतहि कोध भये धर्म धीरा । जोग जीतके सन्मुख भीरा ॥ जोग जीत तबहीं फटकारा । जाय रहौ तब लोक ते न्यारा ॥ जोग संतायन चल भये जबही । धर्म धीर आयौ पुनि तबही ॥ बार अनेक युद्ध जिहि कीन्हा । मारे न मरत बहुत बल कीन्हा ॥

धर्मराज वचन

तब मैं हतौ पुरुष के ठाऊँ । तब नहिं सुन्यो तुम्हारौ नाऊँ ॥ को तुम हौ सो मोहि बताऊ । सहज भाव तुम फेर बनाऊ ॥

ज्ञानी वचन

धर्म धीर सों कहा बखानी । मर्दन धर्म नाम मम ज्ञानी ॥ जब तुम कीन्ह चार का काजा । तातैं पुरुष मोहि उपराजा ॥ मारहुँ तोहि कहौ सतभाऊ । अष्टांगी तैं कामिन खाऊ ॥ सुनतहि कोध धरम पर जरेऊ । जरत हुताश मनहु घृत परेऊ ॥

साखी-करहि युद्ध बहु भांति सों, कैसेहु क्षमा न होय । क्षण एक लरचौ सहज तुम, करु उपाय अब सोय ॥

Page 20Permalink

( १० )

ज्ञानसागर

चौपाई

पुरुष आज्ञा अस भयउ अपारा । मारहु धर्म के मांझ कपारा ॥ आज्ञा पुरुष ज्ञानीदियो जबही । मारौ शीश परो खस तबही ॥ संशय भयो तासु की देहा । ताकहैं भयो जी महाँ संदेहा ॥ धर्म धीर कौ रुधिरसे जबही । विषम सरोवर उपजौ तबही ॥ कन्या निकस जो बाहिर आई । संशय काल तिहि घटहि समाई ॥ शीश दियो लै कुर्म के पास । पुरुष आज्ञा सौ कीन्ह निवासा ॥ आज्ञा कीन्हही बेग निकारहु । कहै जोइ अब धर्म सिधारहु ॥ छाड़हु अंश खंड का गाऊ । विषम सरोवर माहि सा जाऊ ॥ देखो बहुत रूप उजियारा । अस कामिनि तैं कीन्ह अहारा ॥ फिर मैं गयो पुरुष के पास । धर्म धीर अस करहि तमाशा ॥ कह कामिनि सुन पुरुष पुराना । मैं अपना कछु मरम न जाना ॥ कौन पुरुष मोही उपजाई । सो मोहि गम्य कहौ समुझाई ॥

धर्मराय वचन

कन्या मैं उपजायो तोही । रहौ अलख नहि भेंटसि मोही ॥ कन्या कह सुन पिता हमारा । खोजो वर होय व्याह हमारा ॥ वर खोजौ जो दुतिया होई । कन्या मैं अब व्याहौ तोही ॥ पुत्री पिता न होवत व्याहा । पितहि पाय बहुतै औगाहा ॥ साखी-धर्म कहै सुन कन्या, भर्म भयो मति तोहि ॥ पाप पुण्य हमरे घरे, क्या डहकस तैं मोहि ॥

चौपाई

आदि भवानी और धर्मराऊ । इन सब कीन्ह सृष्टि निर्माऊ ॥ पांच तत्त्व तीन गुण रहेऊ । बीज सहित अष्टांगी दण्ड ॥ चौरासीलक्ष जीवदियो सम्हारी । रचहु सृष्टि अब आदि कुवारी ॥ सेवा करहु सृष्टिकी ओरा । अलख निरंजन नाम है मोरा ॥