कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
by कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास
Source: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
प्रारंभिक पृष्ठ (ज्ञान सागर)
कबीरसागर
(सम्पूर्ण ११ भाग)
खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई.
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कबीरसागर
( सम्पूर्ण ११ भाग )
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खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई
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सत्य
कबीरसागर
ज्ञानसागर
(प्रथम खण्ड)
कबीरपंथी भारत पथिक स्वामी युगलानन्द (विहारी) द्वारा परिष्कृत
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सत्यनाम
A black and white woodcut-style illustration of a bearded man, likely a Sikh Guru, seated in a meditative posture on an ornate throne. He wears a tall, pointed turban and holds a mala. A large, ornate umbrella is positioned above him. A small pot is visible on the floor to the left.
श्री कबीर साहिब
महात्म्यम्
श्री श्री गणेशाय नमः
A faint, stylized illustration of a seated figure, likely Lord Ganesha, holding a conch shell and a sword, surrounded by a decorative border.
श्री गणेशाय नमः
श्रीज्ञानसागरकी अनुक्रमणिका
★
| विषय. | पृष्ठ |
|---|---|
| मुक्तिभेद, अमरलोक वर्णन | १ |
| सत्य पुरुष का वर्णन | ३ |
| सृष्टि उत्पत्ति वर्णन प्रारंभ | ४ |
| द्वीप वर्णन | ५ |
| धर्मरायके द्वीप नहीं पानेका वर्णन | ६ |
| धर्मरायका सत्य पुरुषकी सेवा करके द्वीप पानेका वर्णन । सहज की विन्ती | ७ |
| धर्मरायका अधिकस्थान मांगना और मान-सरोवरका पाना | ८ |
| धर्मरायका कामिनीको निगल जाना | ” |
| पुरुषका निरञ्जनको शाप देना | ९ |
| पुरुषका योगसंतायनको जीवोंको कालके फन्दसे छुड़ानेकी आज्ञा देना और योग संतायन तथा कालका युद्ध | ” |
| कन्याका धर्मरायके पटसे निकलना और धर्मरायका उसे ठगना तथा दोनोंका मिल-कर सृष्टिकी रचना करनेका विचार करना और रचना | ११ |
| चौदह यमका नाम और कर्म | १२ |
| कालका जीवोंको दुःखित करना और सत्य पुरुषकी आज्ञासे ज्ञानीजीका पृथ्वी-पर आना | १३ |
| धर्मराय और ज्ञानीजीका वार्तालाप और कोल करार | ” |
| धर्मरायका ज्ञानीजीसे जगन्नाथ की स्थापनाका वचन लेना | ” |
| सृष्टि उत्पत्तिकी कथा वर्णन | १६ |
| तीन देवका प्रगट होना और आदि मायाका तीनोंका काम बताना | १७ |
| विषय. | पृष्ठ. |
|---|---|
| ब्रह्माका समुद्र खुदवाना | १८ |
| श्वानीकी आज्ञासे तीनों देवका समुद्र मंथन करना और तीन कन्याका प्रकट होना | ” |
| श्वानीकी आज्ञासे तीनों देवका छारे समुद्रको मंथन करना और उससे वेद आदिक प्रकट होना | १९ |
| चार खानिकी उत्पत्ति | २० |
| ब्रह्माको वेद पढ़कर संदेह होना और माताकी आज्ञासे पिताकी खोजमें जाना | २१ |
| मायाका मायत्रीको उत्पन्न करके ब्रह्माको बुलानेके लिये भजना और मायाका ब्रह्माको झूठ बोलनेके कारण शाप देकर निरंजन से आप शाप पाना | २२ |
| मायाका विष्णुको पिताके खोजके लिये भजना । विष्णुका शुक्लसे श्याम हो जाना । मायाके पास आकर विष्णुका सत्य बोलना और तीनों लोकका राज्य पाना | २३ |
| मायाका महादेवको वर देना | २४ |
| तीनों देवका मानुषी सृष्टिकी उत्पत्ति करना । मनुष्य की अधिकतासे पीड़ित होकर पृथ्वीका गौरूपधरके विष्णुके समीप जाना और विष्णुका अवतार लेनेका वचन देना | २५ |
| अवतारों की कथा | |
| बलिचरित्र (वामन अवतार) | २७ |
| सनक सनन्दन चरित्र | २९ |
( ६ )
ज्ञानसागरकी अनुक्रमणिका
| विषय. | पृष्ठ. | विषय. | पृष्ठ. |
|---|---|---|---|
| नारदचरित्र | ३१ | कलियुग में कबीरसाहबका प्रगटघ | ६७ |
| श्वेषणचरित्र | ३२ | जगन्नाथके मन्दिरकी स्थापना | ६८ |
| सती दाहकी कथा | ३३ | चन्दवारमें कबीरसाहबका जाना | ७१ |
| शिवकी समाधि छुड़ानेके लिये कामदेवका प्रयत्न करना और नारदका कामवश होना तथा विष्णुको शाप देना | ३४ | नूरीको मिलनेकी कथा | ७२ |
| विष्णुका दशरथके घर अवतार लेना अर्थात् रामकथावर्णन | ३५ | नूरीके पूर्वजन्मकी कथा | " |
| कृष्णचरित्रवर्णन | ४४ | बाललीला और रामानन्दको गुह करनेका वर्णन | ७५ |
| पाण्डव यज्ञ तथा सुपच मुदशान कथा-वर्णन | ५२ | सिकन्दरसाहूकी वार्ता और रामानन्दजीका कत्ल होना | ७७ |
| कृष्णका स्वर्गारोहण और जगन्नाथकी स्थापना | ५४ | मगहर गमनकी कथा | " |
| निकलंक अवतारकी वार्ता | ५५ | रतनाकी कथा | ८० |
| उत्पति परलयका लेखा | ५६ | चौका आरतीकी विधि | ८३ |
| कबीर वचन | योग कर्मका वर्णन | ८५ | |
| कृत्ययुगमें कबीरसाहबका पृथ्वीपर आना | ५७ | अष्ट कमल वर्णन | ८६ |
| त्रेतामें कबीर साहबका पृथ्वीपर आना | ५८ | गैही रहनी | ९० |
| द्वापरमें कबीरसाहबका पृथ्वीपर आना | ६१ | आरतीका योगरूपसे वर्णन | ९१ |
| नुमतीकी कथा | " | योगकी श्रेष्ठता | " |
| पुनोकी बड़ाई | ९२ | ||
| गुहवाके लक्षण | ९३ | ||
| गुरुलक्षण | ९६ | ||
| परलोकका मार्ग । सत्यलोक और हंसका वर्णन | ९७ | ||
| भविष्यत् कथा । चक्रवर्षीका वर्णन | १०५ |
इति अनुक्रमणिका समाप्त
मुक्तिभेद, अमरलोक वर्णन
सत्यसुकृत, आदि अदली, अजर, अचिन्त, पुरुष, मुनीन्द्र, करुणामय, कबीर, सुरति, योग संतायन, धनी धर्मदास, चुरामणिनाम, सुदर्शन नाम, कुलपति नाम, प्रमोधगुरुवालापीरनाम, कमल- नाम, अमोलनाम, सुरतिसनेहीनाम, हकनाम, पाकनाम, प्रकट नाम, धीरज नाम, उग्र नाम, दयानामसाहबकी दया, वंश व्यालीसकी दया.
★
अथ ज्ञानसागर प्रारम्भः
सोरठा-सत्यनाम है सार, बूझो संत विवेक करि । उतरो भव जल पार, सतगुरुको उपदेश यह ॥ सतगुरु दीनदयाल, सुमिरो मन चित एक करि । छेड़ सके नहिं काल, अगम शब्द प्रमाण इमि ॥ बंदौं गुरु पद कंज, बंदीछोर दयाल प्रभु । तुम चरणन मन रंज, देत दान जो मुक्ति फल ॥
चोपाई
मुक्ति भेद मैं कहौं विचारी । ता कहैं नहिं जानत संसारी ॥ बहु आनंद होत तिहिं ठाऊँ । संशय रहित अमरपुर गाऊँ ॥
(२)
ज्ञानसागर
तहँवा रोग सोग नहिं होई । क्रीडा विनोद करे सब कोई ॥ चंद्र न सूर दिवस नहिं राती । वरण भेद नहिं जाति अजाती ॥ तहँवा जरा मरन नहिं होई । बहु आनंद करै सब कोई ॥ पुष्प विमान सदा उजियारा । अमृत भोजन करत अहारा ॥ काया सुन्दर ताहि प्रमाना । उदित भये जनु षोडस भाना ॥ इतनौ एक हंस उजियारा । शोभित चिकुर तहां जनु तारा ॥ विमल बास तहँवां बिगसाई । योजन चार लौं बास उड़ाई ॥ सदा मनोहर क्षत्र सिर छाजा । बूझ न परै रंक औ राजा ॥ नहिं तहां काल वचनकी खानी । अमृत वचन बोल भल वानी ॥ आलस निद्रा नहीं मकासा । बहुत प्रेम सुख करै विलासा ॥
साखी-अस सुख है हमरे घरे, कहै कवीर समुझाय ।
सत्त शब्दको जानिके, असथिर बैठे जाय ॥
चौपाई
सुन धर्मनि मैं कहौं समुझाई । एक नाम खोजो चित लाई ॥ जिहिं सुमिरत जीव होय उबारा । जाते उत्तरी भन जल पारा ॥ काल वीर बांका बड़ होई । बिना नाम बानै नहिं कोई ॥ काल गरल है तिमिर अपारा । सुमिरत नाम होय उजियारा ॥ काल फांस डारे गल माहीं । नाम खड़ काटत पल माहीं ॥ काल जँजाल है गरल स्वभाऊ । नाम सुधारस विषथ बुझाऊ ॥ विषकी लहर मतो संसारा । नहिं कछु सुझे वार न पारा ॥ सुर नर माते नाम विहूना । औट मुये ज्यों जल बिन मीना ॥ भूल परै पाखँड व्यवहारा । तीरथ वृत्त औ नेम अचारा ॥ सगुण जोग जुगति जो गावै । बिना नाम मुक्ती नहिं पावै ॥
साखी-गुण तीनोंकी भक्तिमें, भूल परचो संसार ।
कहै कवीर निज नाम विन, कैसे उत्तरे पार ॥
सत्य पुरुष का वर्णन
ज्ञानसागर
( ३ )
धर्मदास वचन-चौपाई
विनकैं स्वामी दोह कर जोरी । कहौ गुसाईं नामकी डोरी ॥ निरंकार निरंजन नाऊं । जोत स्वरूप सुमरत सब ठाऊं ॥ गावहि विद्या वेद अनूपा । जगरचना कियो ज्योति सरूपा ॥ भक्त वत्सल निजनाम कहाई । जिन यह रचि सृष्टि दुनियाई ॥ सोई पुरुष कि आहि निनारा । सो मोहि स्वामी कहौ व्यवहारा ॥ जिह्ति होय जीवको काजा । सो मैं करहुँ छोड़ कुल लाजा ॥ होहु दयाल दयानिधि स्वामी । बोलहु वचन सुधा रस वानी ॥ नाम प्रभाव निज मोहि बताओ । होहु दयाल मम तृषा बुझाओ ॥
साखी-जो कुछ मुझे सन्देश है, सो मोहि कहो समुझाय । निश्चय कर गुरु मानिहौँ, औ बंदो तुम पायँ ॥
साहिब कबीर वचन-चौपाई
तुमसों कहौँ जो नाम विचारी । ज्योति नहीं वह पुरुष न नारी ॥ तीन लोक ते भिन्न पसारा । जगमग जोत जहाँ उजियारा ॥ सदा वसंत होत तिहि ठाऊं । संशय रहित अमरपुर गाऊं ॥ तहँवा जाय अटल सो होई । धरमराय आवत फिरि रोई ॥ वरनों लोक सुनो सत भाऊ । जाहि लोकतें हम चलि आऊ ॥ जगमग जोती बहुत सुहावन । दीप अनेक गिने को पावन ॥ जगमग ज्योति सदा उजियारा । करी अनेक गिने को पारा ॥
छंद
जहँ ज्योति जगमग अति सुहावन तत्त्व वारिध अति चलै । कहत दोई कुल तिमिर मनो पन्न झलहल हलै ॥ फेन उडगन बहन लागे शसि मनोहर हेरि को । किमि देउँ पटतर बूझ देखो भाव नहिँ वहाँ जोर को ॥ सोरठा-शोभा अगम अपार, वर्णत बनेँ न एक मुख । कही न जात विसतार, जो मुख होवै पदम सत ॥
सृष्टि उत्पत्ति वर्णन प्रारंभ
( ४ )
ज्ञानसागर
धर्मदास वचन-चौपाई
हे स्वामी मोहि आदि सुनाओ । कैसे पुरुष वह लोक बनाओ ॥ कैसे द्रौप करी निर्मावा । होहु दयाल सो मोहि बतावा ॥
साहव कबीर वचन
सुन हंसा तोहे कहब विचारी । लोकद्रौप जिमि करी सम्हारी ॥ इते अदेह दुतिया नहि काळ । सुरति सनेही जान कछु भाळ ॥ नहि तहाँ पांच तत्त्व परकाशा । गुण तीनों न छिनहीं अकाशा ॥ नहि तहाँ ज्योति निरंजन राया । नहि तहाँ दशौ जनम निर्माया ॥ नहि तहाँ ब्रह्मा विष्णु मद्देशा । आदि भवानी गवरि गनेशा ॥ नहि तहाँ जीव सीव कर मूला । नहि अनंग जिह्विते सब फूला ॥ नहि तहाँ ऋषी सहस्र अठासी । षट् दर्शन न सिद्ध चौरासी ॥ सात वार पन्द्रह तिथि नाहीं । आदि अंत नहि कालकी छाहीं ॥
छंद
नहि कूर्म चक्रिय वारि पर्वत अग्नि वसुधा नाहि हो । शून्य विशून्य न तहां होई अगाध महिमा सो कहो ॥ जिमि पुढुप तिमि छाया राखो बास भरो ता संग मई । स्वरूप बूझो अगम आदि महिमा अक्षर अंग मई ॥ सोरठा-प्रकट कहो जिमि रूप, देखो हृदय विचारिके । आदिहि रूप स्वरूप, जिहि ते सकल प्रकाश भयो ॥
चौपाई
तिनहि भयो पुन गुप्त निवासा । स्वासा सार ते पुहुमि प्रकाशा ॥ सोई पुढुप विना नर नाला । ज्योति अनेकहोत झल हाला ॥ पुढुप मनोहर सेतई भाळ । पुढुप द्रौप सबही निर्माळ ॥ अजे सरोवर कीन्हो सारा । अष्ट कमल ते आठौं वारा ॥ पोडश मुत तबही निर्मावा । कछु प्रगट कछु गुप्त प्रभावा ॥
द्वीप वर्णन
ज्ञानसागर
( ५ )
पुढूप द्वीप किमि करव बखाना । आदि ब्रह्म तहँवा अस्थाना ॥ सत्रह संख पंखुरी राजै । नौ सौ संख द्वीप तहाँ छाजै ॥ तेरह संख सुरंग अपारा । तिहिन्हिं जान काल बरियारा ॥
धर्मदास वचन
धर्मदास कहैं सुनो गुसाई । द्वीप अनेक पुरुष के ठाई ॥ सो स्वामी मोहि भेद बताओ । दया करो जनि मोहि डुराओ ॥ तुमसों वरनि कहौं सत भाऊँ । मैं मनो आज महा निधि पाऊँ ॥ सुनत वचन गदगद सिर मोरा । थकित भये जनु चंद्र चकोरा ॥ मैं भुजंग तुम मलय्या गीरा । करहु दया मम दुखित शरीरा ॥
साहिब कबीर वचन
धर्मदास पूछो जो मोहीं । सो मैं भेद कहौं सब तोहीं ॥ कमल असंख भेद कहँ जाना । तहँवा पुरुष रहे निर्वाना ॥ मोही सतगुरु दियो बताई । सो सब भेद कहौं तुम पाई ॥ सत पंखुरी कमल निवासा । तहँवा कीन्ह आप रहि वासा ॥
साखी-शीश दरस अति निर्मल, काया न दीसत कोश । पदम संपुट लग रहै, बानी विगसन होय ॥
चौपाई
प्रगट द्वार जब देखौं शीशा । धर्मनि हिये देखौं अहै ईशा ॥ पाइर द्वीप जहँ निर्मल ठौरा । सो सब भेद कहौं कछु औरा ॥ अंबू द्वीप हंस को थाना । पाइर द्वीप पुढूप निर्वाना ॥ नौ सौ करी ताहि के हीठा । गुरु प्रसाद सबै हम दीठा ॥ तहाँ आइ पुन पाइर द्वीपा । मंजुल मंगल करी समीपा ॥ तहँवा जाइ अटल सो होई । धर्मराज आवै फिर रोई ॥ द्वीप अनेक औ करी अनेका । पाइर द्वीप हंस के थेका ॥ चार करी हैं सब से सारा । बहु शोभा तहँ रूप अपारा ॥
धर्मरायके द्वीप नहीं पानेका वर्णन
( ६ )
ज्ञानसागर
साखी-करी भेद सुन हंसा, आई देखु सत लोक । गुरु जो बतावहीं, मिट जाई सब धोख ॥
धर्मदास बचन-चौपाई
हे स्वामी मैं विनऊं तोही । कछु संशय जिव उपज्यो मोही ॥ धर्मराय नहीं पायब दीपा । और सबै सुत द्रौप समीपा ॥ कारण कौन दरस नहीं होई । कहौ अगम जानि राखो गोई ॥
साहिब कवीर बचन
जो तुम पूछो अगम सन्देसा । सो सब तोहि कहौ उपदेसा ॥ आदि पुरुष अस कीन्हो साजा । पाँच बुन्द हुलास उपराजा ॥ बुन्दहि बुन्द अंड परकाशा । धर्म धीर जेहि अंड निवासा ॥ अटल जोत सुरंग उजियारा । तहँवा अंड रहै मनियारा ॥ धर्म धीर जबही उत्पाना । आदि ब्रह्म तबही सकुचाना ॥ एकहि मूल सबै उपजाई । मेटचो तेज अंड कुन्याई ॥
साखी-तेज रह्यो जिहि अंड मो, तेहि नहीं दीन्हौ ठौर । तेहिते उपज्यो धर्म अब, वंश अगिन के जोर ॥
चौपाई
बावन लक्ष बेर अनुमाना । मेटो न मिटत शब्द परवाना ॥ एकहि मूल सबै उपजाई । मिटै न अंड तेज अन्याई ॥ धर्मराय है काल अँकुरा । उपजो तहाँ काल कौ मुरा ॥ तबहि पुरुष अज जुगत विचारा । रहै धर्म द्रौप सो न्यारा ॥ जोपै रहै सदा सिव काई । तौ एक द्रौप तुमहि निर्माई ॥ पुरुष शब्द ते सबै उपराजा । सेवा करें सुत अति अनुरागा ॥ जानै भेद न दूसर कोई । उत्पनि सबकी बाहिर होई ॥ अभिअन्तर जो उत्पति होई । काया दरश पाय सब कोई ॥ काया दरश सुरति इक पावे । संगहि द्रौप सबै निर्मावे ॥
धर्मरायका सत्य पुरुषकी सेवा करके द्वीप पानेका वर्णन । सहज की विन्ती
ज्ञानसागर
( ७ )
धर्म धीर नहि पावे द्वीपा । और सबै सुत द्वीप सर्मीपा ॥ धर्मराय अस कीन्ह बनाई । कर सेवा तेहि जागहि आई ॥ सेवा बहुत भांति सो किएऊ । आदि पुरुष तब हर्षित भयेऊ ॥ साखी-सेवा कीन्ही धर्म बड़, दियो ठौर अब सोय । जाय रहो वहि द्वीप में, सेवा निर्फ़ल न होय ॥
चौपाई
सात द्वीप कौ पायो राजू । भयो आनन्द धर्म मन गाजू ॥ सेवा करि पुन कीन्ह निहोरा । सुनो सहज तुम आता मोरा ॥ सेवा बसहि द्वीप मैं पाएऊँ । कैसोरचो मोहि गम्यन आएऊँ ॥ पुरुष सों विनती करु यह भारी । हे आता मैं तुम बलिहारी ॥ करिहौं सोई जो आज्ञा पाऊँ । कैसे मैं नव खंड बनाऊँ ॥ चले सहज जहँ द्वीप अमाना । कीन्ह जाय दण्डवत प्रणामा ॥ बहुविधि विनती सहज कियो जबही । बेग पुहुप बानी भई त ही ॥ पुरुष वाणी ते भया उजियारा । सुनहु सहज तुम वचन हमारा ॥ पक्षि पालना पाय है अंडा । सो लै धर्म रचै नव खंडा ॥ चले सहज तब बार न लावा । धर्म धीरसौं मता सुनावा ॥ साखी-सुनत संदेशो पुरुष को, धर्म शीस तब नाव । पायो आज्ञा पुरुष की, अब फाबी मो दांव ॥
चौपाई
सुनत संदेश भयो हरषंता । आन अंड जो चले तुरंता ॥ देखो धर्म जब कूर्म शरीरा । बारह पालंग है बल वीरा ॥ नव पालंग धर्म परमाना । बने न घात तब करे तिवाँना ॥ धावहि दशहू दिशा रिसाई । कैसे अंड लेऊँ मैं जाई ॥ तबहि उक्ति अस कीन्ह बनाई । तोरि शीस अस करचो उपाई ॥ शीस कीन्ह तब नख सौं छीना । अमी अंक तोरि कियो मीना ॥
धर्मरायका अधिकस्थान मांगना और मान-सरोवरका पाना
( ८ )
ज्ञानसागर
शीस तोरि लियो द्वीप अपारा । तबहि धर्म भयो बरियारा ॥ पांचौ तत्त्व अंडसौं लीन्हा । गुन तीनों सुशीस कर कीन्हा ॥ पांचौ तत्त्व तीन गुन सारा । यही धर्म सब कीन्ह पसारा ॥ तब कियो नीर निरंजन राया । मीन रूप तबही उपजाया ॥ करि चरित्र धर्म तब आया । आज सहजसों विनती लाया ॥ साखी-जाय कहौ तुम पुरुष सों, बहु सेवा मैं कीन्ह । सब सुत रहिहैं लोकमहैं, नव खँड हम कहैं दीन्ह ॥
चोपाई
इतने में नहि मोर रहाऊँ । जहँवा रहव देव मोहि ठाऊँ ॥ चले सहज पुरुष पर जबहीं । विनती धर्म कीन्ह पुनि तबहीं ॥ मांग्यो बीज कीन्ह बड़ लोभा । जातैं द्वीप पावों मैं शोभा ॥ सहज विनय पुरुष सों कीन्हा । हे स्वामि तुव सुन बल हीना ॥ मांगै और ठौर पुनि सोई । धर्म धीर जो तुव सुत बल होई ॥ अति अधीन मांगै जौ बीजे । सोहे द्वीप पुहुप वहि दीजे ॥ तबहि पुरुष सेवा वश भयऊ । अष्टांगी कामिनि सो दयऊ ॥ मान सरोवर ताकर नाऊँ । सोऊ दियो धर्म कहैं ठाऊँ ॥ अष्टांगी कन्या उत्पानी । जासौं कहिये आदि भवानी ॥ रूप अनूप शोभा अधिकार्ई । कन्या मान सरोवर आई ॥ साखी-चौरासी लक्ष जीव सब, मूल बीजके संग । ये सब मान सरोवरा, रच्यो धर्म बड रंग ॥
चोपाई
सहज संदेशो ल्याये जहँवा । धर्म धीर ठाढे हैं तहँवा ॥ कह्यो संदेश धर्म मन गाजा । मान सरोवर जाइ विराजा ॥ साखी-देखि रूप कामिनि कौ, पल भर रह्यो न जाइ । आगे पीछे ना सोचिया, ताकौ लीन्हेसि खाइ ॥
पुरुषका निरञ्जनको शाप देना
ज्ञानसागर
( ९ )
चौपाई
कन्या सों अस कीन्ह अन्याई । सहजसों लियो जो तुरत बुझाई ॥ यहै चरित पुरुष जब देखा । दीन्हें शाप सो कहों विशेखा ॥ सवा लक्ष जीव करौ आहारा । तऊ न ऊदर भैर तुम्हारा ॥ सुमिरन कूर्म पुरुष को कीन्हा । अहहो पुरुष धरम सिरछीन्हा ॥ तुव आज्ञा मैं अंड जो दीन्हा । धर्मराज काहे सिर लीन्हा ॥ सुनत वचन प्रभु बहुत रिसाने । जोगजीत तबही उतपाने ॥ आज्ञा भई तुम वेग सिधारी । धर्मराज कहैं मार निकारी ॥ आज्ञा मांग चले तब ज्ञानी । धर्मराय सो बातैं ठानी ॥ अरे पापी तू पुरुष को चोरा । भागहु वेग कहा सुन मोरा ॥ सुनतहि कोध भये धर्म धीरा । जोग जीतके सन्मुख भीरा ॥ जोग जीत तबहीं फटकारा । जाय रहौ तब लोक ते न्यारा ॥ जोग संतायन चल भये जबही । धर्म धीर आयौ पुनि तबही ॥ बार अनेक युद्ध जिहि कीन्हा । मारे न मरत बहुत बल कीन्हा ॥
धर्मराज वचन
तब मैं हतौ पुरुष के ठाऊँ । तब नहिं सुन्यो तुम्हारौ नाऊँ ॥ को तुम हौ सो मोहि बताऊ । सहज भाव तुम फेर बनाऊ ॥
ज्ञानी वचन
धर्म धीर सों कहा बखानी । मर्दन धर्म नाम मम ज्ञानी ॥ जब तुम कीन्ह चार का काजा । तातैं पुरुष मोहि उपराजा ॥ मारहुँ तोहि कहौ सतभाऊ । अष्टांगी तैं कामिन खाऊ ॥ सुनतहि कोध धरम पर जरेऊ । जरत हुताश मनहु घृत परेऊ ॥
साखी-करहि युद्ध बहु भांति सों, कैसेहु क्षमा न होय । क्षण एक लरचौ सहज तुम, करु उपाय अब सोय ॥
( १० )
ज्ञानसागर
चौपाई
पुरुष आज्ञा अस भयउ अपारा । मारहु धर्म के मांझ कपारा ॥ आज्ञा पुरुष ज्ञानीदियो जबही । मारौ शीश परो खस तबही ॥ संशय भयो तासु की देहा । ताकहैं भयो जी महाँ संदेहा ॥ धर्म धीर कौ रुधिरसे जबही । विषम सरोवर उपजौ तबही ॥ कन्या निकस जो बाहिर आई । संशय काल तिहि घटहि समाई ॥ शीश दियो लै कुर्म के पास । पुरुष आज्ञा सौ कीन्ह निवासा ॥ आज्ञा कीन्हही बेग निकारहु । कहै जोइ अब धर्म सिधारहु ॥ छाड़हु अंश खंड का गाऊ । विषम सरोवर माहि सा जाऊ ॥ देखो बहुत रूप उजियारा । अस कामिनि तैं कीन्ह अहारा ॥ फिर मैं गयो पुरुष के पास । धर्म धीर अस करहि तमाशा ॥ कह कामिनि सुन पुरुष पुराना । मैं अपना कछु मरम न जाना ॥ कौन पुरुष मोही उपजाई । सो मोहि गम्य कहौ समुझाई ॥
धर्मराय वचन
कन्या मैं उपजायो तोही । रहौ अलख नहि भेंटसि मोही ॥ कन्या कह सुन पिता हमारा । खोजो वर होय व्याह हमारा ॥ वर खोजौ जो दुतिया होई । कन्या मैं अब व्याहौ तोही ॥ पुत्री पिता न होवत व्याहा । पितहि पाय बहुतै औगाहा ॥ साखी-धर्म कहै सुन कन्या, भर्म भयो मति तोहि ॥ पाप पुण्य हमरे घरे, क्या डहकस तैं मोहि ॥
चौपाई
आदि भवानी और धर्मराऊ । इन सब कीन्ह सृष्टि निर्माऊ ॥ पांच तत्त्व तीन गुण रहेऊ । बीज सहित अष्टांगी दण्ड ॥ चौरासीलक्ष जीवदियो सम्हारी । रचहु सृष्टि अब आदि कुवारी ॥ सेवा करहु सृष्टिकी ओरा । अलख निरंजन नाम है मोरा ॥