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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

by कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास

Source: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished2,136 pages

कबीर साहबका निरंजनके अनुरोधसे कारीगरका रूप धरके राजाके द्वार पर जाना और प्रतिमा बनानेको बैठना

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बांधवसागर

( १५१ )

कारीगर

राजा कहा हमारा कीजै । सोलह दिनकी अवधी दीजै ॥ हमको साज मूरति का देओ । देवलको द्वार मूँदि कर लेओ ॥ जबही साज देवल ले जाऊ । तबहीं द्वार मूँदि हो भाऊ ॥ तबही कह्यो मूँदि पौरिहि दीजै । सब कोइ गमन यहाँसे कीजै ॥ सोलह दिनमें द्वार खुलै हो । तौ कछु विघ्न नहीं तुम पैहो ॥ देह कपाट तब ताला दीना । चहुँ दिशि पण्डों चौकी कीना ॥ दिन दंश सो बीति जब गयऊ । चलत फिरत गोरख तब अयऊ ॥

गोरख वचन

गोरख कहे दर्शन मोहि दीजै । नहिं तो शाप हमारो लीजै ॥

सत्यकबीर वचन

तब पण्डा राजा पहुँ जायी । राजा से सब बात सुनायी ॥ राजा पण्डा सों कहे बुझाई । कौन शाप गोरखकेर उठाई ॥ तब पंडा गोरख पै आये । हाथ जोरिके विन्ती लाये ॥ दिनछः हम तुमसों माँगे भाई । ता पाछे हम दरश कराई ॥

गोरख वचन

साखी-मैं गोरख प्रसिद्ध हूँ, हमरे आड जनि होइ । मोको दरश करावहू, कै शाप हमरो लेहु ॥

चौपाई

तब राजा गोरख पगु पड़िया । बहु विन्ती भावसों उच्चरिया ॥ जब गोरख नहिं माने राई । तब राजा अस कह्यो बुझायी ॥

१ इस चौपाईमें दशदिनके पश्चात् गोरखका आना बतलाया है किन्तु नवीन प्रतियों में सात ही दिन लिखा है ।

“विना सात बीते पुनि जाई । फिरत फिर गोरख पुनि आई ॥”

नवीन प्रतियोंमें सब ऐसे ही बेतुकी वाणीका ऐसा गढ़बड हुआ है कि सब यहाँ पर लिखना असम्भव है ।

सोलह दिनतक द्वार न खोलनेका वचन टूटनेसे प्रतिमा अपूर्ण रहना

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( १५४ )

लक्ष्मणबोध

तब राजा कहे सुन गोरख आयी । ऐसा तुम करिहो तैसा पायी ॥ नहि माना गोरख द्वार उघारा । तब सतगुरु एक कला परचारा ॥ भागा गोरख दूर ते भाई । सतगुरु शरण सो बैठा जाई ॥ जगन्नाथ कहे सुनु गोरख आई । योगी हमरो दरश न पाई ॥ यहि औगुन गोरख से भयऊ । ताते योगी दरश न पयऊ ॥ जगन्नाथ राजा सो कहेऊ । अवधिपूर नहीं सो भयऊ ॥ ताते हाथ ठूंट रहि जायी । दिन सोलह बीते नहि पायी ॥ देह सम्पूर्ण होन न पायी । झगरू पण्डहि को समझायी ॥ झगरू पण्डा शिष्य भयो आयी । केतिक दिन ऐसे बिति जायी ॥ तब जगन्नाथ सो भेंट करायी । जगन्नाथ कह सुनो जी आयी ॥ तुम्हरी हमरी भली बनि आयी । तब हम तेहि कहा समुझायी ॥ कहैं कवीर सुनो त्रिभुवन राई । सिंचल द्वीप हम देखन जाई ॥

साखी-सिंचल द्विप हम जावहीं, जगन्नाथ चित लाउ ।

समुन्दरका भय मेटिके, अटल राज कराउ ॥

इति श्रीबोधसागरे कबीरधर्मदाससम्भावे जगन्नाथ-

स्थापनवर्णनो नाम सप्तमस्तत्रंगः

इति ग्रन्थ लक्ष्मणबोध

संक्षेप सार

मोर

ग्रन्थपर साधारण वृद्धि

यद्यपि इस ग्रन्थमें लक्ष्मणजीको भी बोध करनेकी प्रसंगसे थोड़ी चर्चा आगयी है किन्तु प्रधानतः इस ग्रन्थमें वर्णन जगन्नाथजी की स्थापनाका है । इस जगन्नाथकी स्थापनाके विषयमें भी अनेक ग्रन्थोंमें बहुत मत भेद हैं इस कारण और-और ग्रन्थोंका भी इस विषयमें वर्णन थोडासा लिख देता हूँ ।

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बोधसागर

( १५५ )

जब श्रीकृष्णजीका स्वधाम गमन हुआ तब बौद्धावतार हुआ। और जब जगन्नाथजीका अवतार हुआ उस समय उड़ीसा देशका राजा इन्द्रदमन था। उस राजा इन्द्रदमनको कृष्णजीने स्वप्न दिखलाया कि तू मेरा मन्दिर उठा। जगन्नाथजीकी आज्ञानुसार राजा मन्दिर बनाने लगा, जब मन्दिर तैयार होगया तब समुद्र आया और मन्दिरको ढहाकर लेगया और भूमि बराबर कर गया। इसके उपरान्त फिर राजाने मन्दिर बनवाना आरंभ किया फिर उसकी वही दशा हुई। फिर बनवाया फिर वही दशा होगयी। इस प्रकार कई बेर राजाने मन्दिर बनवानेकी इच्छा की पर समुद्रने उसको तैयार होने नहीं दिया तब राजाने दुःखी होकर उस इमारत का बनवाना ही छोड़ दिया इस समय कबीर साहबने अपने वचनका स्मरण किया जैसा कि निरंजनगोष्ठि आदि ग्रन्थोंमें लिखा है कि, निरंजनने कबीर साहबसे निवेदन किया था कि जब मेरा जगन्नाथका अवतार होगा तब समुद्र मेरे मंदिरको तोड़ेगा, उस समय आप कृपा करके समुद्रको हटा देवें और मेरे मंदिरको स्थापित करा देवें तब आप वचनबद्ध हुए थे कि, मैं तुम्हारा मंदिर स्थापित करा दूँगा और समुद्रको हटा दूँगा। उसी वचनके अनुसार कबीर साहब उड़ीसा देशमें आन उतरे और राजा इन्द्रदमनके पास जाकर बोले, कि हे राजा! तुम जगन्नाथके मंदिरको बनाओ तब राजाने निवेदन किया कि, महाराज समुद्र मंदिरको बनाने नहीं देता मेरा कुछ वश नहीं चलता, जब मैं बनाता हूँ तब वह आकर ढहा जाता है मैं क्या कहूँ ? कबीर साहबने कहा कि राजा ! मैं इसी प्रयोजनसे आया हूँ अब प्रसन्नतापूर्वक ठाकुरद्वारा बनवाओ

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( १५६ )

लक्ष्मणबोध

मैं समुद्रको हटा दूँगा अब उसका कुछ वश नहीं चलेगा. तब राजाने पुनः मंदिरको बनवाना आरम्भ किया और मंदिर बनने लगा, कबीर साहब समुद्र तटपर गये और एक चबूतरा बनाकर उसपर समुद्रकी ओर मुँह करके बैठ गये। उधर ठाकुरका मंदिर बनकर तैयार होनेके समीप आगया और समुद्र ने देखा कि अब तो ठाकुरका मंदिर बन गया तब बडे वेगसे दौड़ा और लहरें आकाशको उठीं। जब लहरें मारता कबीरके चौराके समीप पहुँचा तब सामने कबीर साहबको बैठे देखा देखते ही समुद्र ठहर गया और आगेको चरण बढ़ा नहीं सका और ब्राह्मणका स्वरूप धरकर कबीर साहबके पास आया और दण्डवत प्रणाम करके निवेदन किया कि, हे महाराज ! मैं तो जगन्नाथके धोखेसे आया और मंदिर ढहाना चाहा अब तो सामने आप बैठे हैं अब मुझमें यह सामर्थ्य नहीं है कि आगेको चरण बढ़ा सकूँ, आप न्यायकर्ता हैं मेरा बदला दिलाओ। तब कबीर साहबने कहा कि हे समुद्र ! मैं तुम्हारा बदला जानता हूँ पर अब इस कलिकालमें जगन्नाथजीका माहात्म्य होगा तथा उनकी पूजा होवेगी इस कारण अब तुम ठाकुरका मंदिर उठने दो और किसी प्रकारकी बाधा उपस्थित मत करो, मैं तुमको इस ॥ मंदिरके बदले द्वारकापुरी देता हूँ तुम जाकर उसको डुबा लो। तब समुद्र प्रसन्नतापूर्वक वहाँसे पीछे पलटा और द्वारकापुरीको डुबा लिया और उधर जगन्नाथजीका मंदिर बनकर पूरा होजुका. समुद्रके हरिमंदिर तोड़नेका कारण यह था कि जब रामचन्द्रका अवतार हुआ था उस समय श्रीरामचन्द्रजीने समुद्रपर बलात्कार किया था और सेतुबन्धपुल बांधकर पार उतरे थे किन्तु समुद्र

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बोधसागर

( १५७ )

राम अवतारमें और कृष्णावतारमें भी बदला ले नहीं सका पर जगन्नाथके औतारमें अपना बदला लेने के निमित्त ऊद्यत हुआ और उसके बदले द्वारकापुरीको जुबा दिया । इससे यह सिद्ध होता है कि कियेका बदला अवश्य भोगना पड़ता है । इस प्रकार जब ठाकुरका मन्दिर बनकर भली भाँति प्रस्तुत होगया तब कृष्णजीने अपने पण्डाको स्वप्न दिखलाया कि हे पण्डे ! कबीर साहिबने मेरा मन्दिर स्थापित कर दिया अब तुम लोग आकर मेरी पूजा करो । जब जगन्नाथजीने ऐसा स्वप्न दिखलाया तब पण्डा घरसे चलकर पहले समुद्र तटपर आया और कबीर चौरे पर गया वहाँ कबीर साहबको बैठे देखा । उस समय सत्य गुरुका वेष जिन्दा साधुका था और वैष्णववेष नहीं था । इस कारण वह वेष देखकर उस ब्राह्मणने अपने मनमें अनुमान किया कि प्रथम मैंने अशुभ दर्शन किया ठाकुरका दर्शन नहीं किया, ऐसा अनुमान करके वह पण्डा ठाकुरके मन्दिरमें पहुँचा, तब कबीर साहिबने उसके मनकी समस्त बातें जान लीं और ऐसा कौतुक दिखलाया की जब वह पण्डा ठाकुरके मंडपमें आया तब उसको विचित्र कौतुक दिखलाई दिया कि ठाकुरका समस्त मन्दिर कबीर साहिबकी मूर्तियोंसे भरा हुआ है । जिस ओरको वह ब्राह्मण देखता है उधर वह कबीर साहबकी मूर्तिको उपस्थित पाता है और ठाकुरकी मूर्ति कहीं दिखाई नहीं देती, तब वह ब्राह्मण अक्षत और पुष्प लिये चकित होकर खड़ा रह गया कि मैं किसकी पूजा करूँ । ठाकुर तो कहीं दिखलाई नहीं देते । समस्त मन्दिर कबीरसाहिबकी मूर्तियोंसे भरा हुआ है । तब वह अपने मनमें सोचने लगा

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( १५८ )

लक्ष्मण बोध

कि इसका क्या कारण है और फिरसे भोजनके समयमें भी कबीर साहबने सर्वत्र दर्शन दिया जैसा इस ग्रन्थ लक्ष्मणबोधमें वर्णन है। अन्तमें उसने अपने दोषको जान लिया कि मैंने जो कबीर साहब को म्लेच्छ समझा था इस कारण ही मुझको यह दंड मिला है, और मुझको यह कौतुक दिखलाया। यह शोच समझकर वह ब्राह्मण कबीर साहबकी स्तुति और दोषके निमित्त क्षमा प्रार्थना करने लगा। जब इस पण्डाने सत्यगुरुकी बहुत प्रार्थना और स्तुति की और अत्यन्त नम्रतापूर्वक अपने दोषोंके निमित्त क्षमा प्रार्थना की तब आप दयालु हुए और अपनी सब मूर्तियोंको समेट लिया केवल एक मूर्ति रह गई और ठाकुरकी मूर्ति दिखाई देने लगी। तब कबीर साहबने उस ब्राह्मणसे कहा की हे पण्डा! अब तुम ठाकुरको पूजो पर इस बातका ध्यान रखना कि आजके दिनसे इस जगन्नाथपुरीमें छूत न रहेगी और जाति पाँतिका ध्यान तनिक भी न रहेगा। प्रत्येक जाति एक दूसरे जातिके साथ निधडक भोजन करेगी। अबल्लों पुरुषोत्तमपुरीमें वही नियम प्रचलित है। सब जातिके लोग एकही स्थानपर भोजन करते हैं कोई किसीके जूठेका कुछ भी ध्यान नहीं करता।

इस ग्रन्थकी भी कई प्रतियां मेरे पास उपस्थित हैं, कोई प्रति भी किसीके साथ मिलती नहीं है। सब प्रतियोंमें प्रसंगका तो ऐसा उलट पुलट है कि, कहीं किसीका पता नहीं मिलता और कविताकी तो यह दशा है कि चौपाईके किसी चरण में २२ मात्रा हैं और किसीमें १४। और लिखायी की जो बात है उसको कहनेकी आवश्यकता ही नहीं है, इस कारणसे यह

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बाघसागर

( १५९ )

पुस्तक सबसे पुरानी प्रति जो १८६० संवत् की लिखी हुई है उसके अनुसार रखा है। हाँ, नवीन प्रतियोंमें से भी प्रसंगानुसार जो उपयुक्त जान पडा है वह भी इसमें रक्खा है किन्तु सो बहुत कम।

इतिलक्षमणबोधः सम्पूर्णः


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इति श्रीबोधसागरान्तर्गत ग्रन्थ लक्ष्मणबोध समाप्त

प्रारंभिक पृष्ठ (मुहम्मदबोध एवं काफिरबोध)

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भारतपथिक कबीरपंथी—

स्वामी श्रीयुगलानन्दजीद्वारा संशोधित

श्री-मुहम्मदबोध

और

काफिरबोध

मुद्रक एवं प्रकाशकः

खेमराज श्रीकृष्णदास,

अध्यक्ष : श्रीवेंकटेश्वर प्रेस,

खेमराज श्रीकृष्णदास मार्ग, मुंबई - ४०० ००४.

नं. ६ कबीरसागर.

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संस्करण : फरवरी २०१९, संवत् २०७५

मूल्य : १०० रुपये मात्र ।

मुद्रक एवं प्रकाशक:

खेमराज श्रीकृष्णदास,™

अध्यक्ष : श्रीवेंकटेश्वर प्रेस,

खेमराज श्रीकृष्णदास मार्ग,

मुंबई - ४०० ००४.

© सर्वाधिकार : प्रकाशक द्वारा सुरक्षित

Printers & Publishers :

Khemraj Shrikrishnadass,

Prop: Shri Venkateshwar Press,

Khemraj Shrikrishnadass Marg, 7th Khetwadi,

Mumbai - 400 004.

Web Site : http://www.Khe-shri.com

Email : khemraj@vsnl.com

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सत्यनाम

श्री कबीर साहिब

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ॐ नमः शिवाय

A faint, stylized illustration of a seated figure, likely a deity or saint, wearing a conical hat and holding a staff or object. The figure is surrounded by a decorative, cloud-like or floral border.

ॐ नमः शिवाय

मुहम्मदबोध (नवम तरंग)

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श्रीजगद्गुरवे नमः

अथ श्रीबोधसागरे

नवमस्तरंगः

मुहम्मदबोध

धर्मदास--वचन

साखी-धर्मदास विनती करे, कृपा करहुं गुरुदेव ॥

नबी महम्मद जस भये, सो सब कहिये भेव

सत्यकबीर वचन-चौपाई

धर्मदास पूछ्यो भल बानी । सो सब कथा कहँ सहिदानी ॥

जेहि औसुर मुहम्मद औतारा । धरम आपनो जगत पसारा ॥

मारि काटि निज धर्म चलायो । जाते जीव बहुत दुख पायो ॥

परम पुरुष दिल दायो आयी । मुक्ता मणि कहँ कह्यो बुझायी ॥

मुक्तामणि संसार सिधाओ । काल कष्टते जीव बचाओ ॥

विगसी कमल उठी असबानी । मुक्तामनि सुनियो तुम ज्ञानी ॥

भवमें जाओ जीवके काजा । जीवन कष्ट देत यमराजा ॥

मुक्तामणि चले शीस नवायी । तेही क्षण भव प्रकटे आयी ॥

साखी-दोसौ युग कलि युग गयो, तब आयो संसार ॥

बहुतक जीव चितायऊ, कोइ कोइ हंस हमार ॥

चौपाई

ऐसे बहुत दिन गयो सिरायी । सिंचल द्रीपमें पहुंच्यो जायी ॥

तब वह मिले मुहम्मद पीरा । जिन सब हुकुम कीन तागीरा ॥

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( ६ )

मुहम्मदबोध

तहाँ जाय हम कीन सलामा । मात रहे अलमस्त इलामा ॥ नजर दिदार जो कीन हमारी । मत्त गयन्द करे असवारी ॥ कहु भाई तुम कहैं भरमाये । कहाँ ते आये कहाँ को जाये ॥ नाहक को नहिं साहब राजी । पढ़ि कुरान पूछो तुम काजी ॥ हुए हैरान नजर नहिं आये । किया नसीहत अल्ला फरमाये ॥

मुहम्मद वचन

साखी—कहाँ ते आये पीर तुम, क्यों कर किया पयान ॥ कौन शक्सका हुक्म है, किसका है फरमान ॥

रमैनी

पीर मुहम्मद सखुन जो खोला । अल्ला हमसे परदै बोला ॥ हम अहदी अल्ला फरमाना । वतन लाहूत मोर अस्थाना ॥ उन भेजे रूह बारह हजार । उम्मतके हम हैं सरदारा ॥ तिस कारण जो हम चलि आये । सोवत थे सब जीव जगाये ॥ जीव खाबमें परो भुलाये । तिस कारन फरमान ले आये ॥ तुम बूझो सो कौन हो भाई । अपनो ईस्म कहो सखुझाई ॥ साखी—दूरकी बाते जो करौ, करते रोजा नमाज ॥ सो पहुँचे लाहूतको, खोवे कुलकी लाज ॥

कबीर वचन

कहैं कबीर सुनो हो पीरा । तुम लाहूत करो तागीरा ॥ तुम भूले सो मरम न पाया । दे फरमान तुम्हें भरमाया ॥ फिर फिर आव फिर फिर जाई । बद अमली किसने फरमाई ॥ लाहूत मुकाम बीचको भाई । बिन तहकीक असल ठहराई ॥ तुम ऐसे उनके बहुतेरे । ले फरमान जाव तुम डेरे ॥

१ नाम । २ इसका वर्णन ग्रन्थ सारमें देखो । ३ स्थान ४ जाँच ।

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बोधसागर

(७)

साखी-खोजत खोजत खोजियाँ, हुवा सो गूना गून ॥ खोजत खोजत ना मिला, तब हार कहा बेचून ॥ बेचून जग राँचिया, साई नूर निनार ॥ आखिर केरे वक्त में, किसकी करो दिदार ॥

रमैनी

तुम लाहूंत रचे हो भाई । अगम गम्य तुम कैसे पाई ॥ यह तो एक आदि विसरामा । आगे पाँच आदि निज धामा ॥ तहँते हम फरमाँ ले आये । सब बदफेलको अमल मिटाये ॥ उन फरमान जो हमको दीना । तिनका नाम बेचून तुम लीना ॥ साखी-साहब का घर दूर है, जासु असल फरमान ॥ उनको कहो जो पीर तुम, सोह अमर अस्थान ॥

मुहम्मद वचन-रमैनी

कहै मुहम्मद सुनो कवीरा । तुम कैसे पायो अस्थीरा ॥ लाहूत मेटि जो अगम बतायो । खुद खुदाय हमहूँ नहिं पायो ॥ हम जानें खुद आपै आही । तुम कुदरत कर थापो ताही ॥ हम तो अर्श हाजिरी आयो । तुम तो कुदरतसे ठहराये ॥ तुम्हरे कहे भरम मोहि आयो । खुद खुदाय तुम दूर बतायो ॥ आप सुनाओ खुदकी बानी । आलम दुनियाँ कहो बखानी ॥ लाहूत मुकाम हम निजकर जाना । सो तो तुम कुदरत कर ठाना ॥ हलकी मुलकी बासरी भाई । तीन हुकम अछा फरमाई ॥ साखी-साई सुरशिद पीर है, साँचा जिस फरमान ॥ हलकी मुलकी बासरी, तीन हुकुम कर मान ॥

कबीर वचन-रमैनी

सुनो मुहम्मद कहूं खुदवाणी । खुद खोदायकी कहूं निशानी ॥ कादिर थे तब कुदरत नाही । कुदरत थी कादिरके माहीं ॥

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( ८ )

मुहम्मदबोध

ख्वार सभीको चीन्हो भाई । असल रुहको देउँ बताई ॥ असल रुहकि दीदार जो पावे । पावे निज मुसलमान कहावे ॥ हो आवाज जहां परदा पोशी । है वह मर्द कि है वह जोशी ॥ जब लग तरुत नजर नहिं आवे । दिल विश्वास कौन विधि पावे ॥ जब खुद की खबर न पावे । तब लग कुदरत भ्रम ठहरावे ॥ हाल माशूक नजर जो आवे । एक निगाह दीदार जो पावे ॥ चार वेद अक्षर निरमाई । चार अंश ताके सुत भाई ॥ एकअंश चौभाग जो कीना । ताते एक गुप्त कर लीना ॥ एक अंशते गुप्त छिपाई । तीन अंश संसार पठाई ॥ अंशाहि अंश भेद नहिं दीना । यह अचरज अक्षरने कीना ॥ जो तुम कहा हमारा मानो । तो हम तुमते निर्णय ठानो ॥ साखी—यह प्रपञ्च बेचूनका, तुमते कहा न भेव ॥ आप सो रत होइ वैठा, तुम चार करत हो सेव ॥

मुहम्मद वचन

कहैं मुहम्मद सुन खुद अहदी । इल्म लद्दुब्रूी कहु बुनियादी ॥ जब नहिं पिण्ड ब्रह्माण्ड अस्थूला । तब ना हतो सृष्टिको मूला ॥ तादनकी कहिय उपतानी । आदि अन्त और मध्य निशानी ॥ साखी—बुजरुग हकीकत सब कहो, किस विधि भया प्रकाश ॥ जब हम जाने आदिको, तो हमहूँ बाँधे आश ॥

कबीर वचन

सुनो मुहम्मद सांचे पीरा । समरथ हुकुम खुद आदि कबीरा ॥ अब हम कहैं सुनो चितलायी । आदि अन्त सब कहों बुझायी ॥ प्रथमैं समरथ आदि अकेला । उनके संग हता नहिं चेला ॥ साखी—वाहिद थे तब आपमें, सकल हतो तेहि माहैं ॥ ज्यों तरुवरके बीजमें, पुष्प पात फल छाहैं ॥

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बोधसागर

( ९ )

बौपाई

आठों अंस त्रिदेव समेता । उत्पत्ति जगतकीन प्रभु एता ॥ तीनों दिन त्रैलोकको राज् । तिनवसपरि जिव भयेअकाज् ॥ तिन पुनि एक जुक्ति चित दीना । प्रथम ज्ञान चार जो कीना ॥ प्रथम क्षुद्रजो ज्ञान उपजाई । ध्यान अंशको तौन पठाई ॥ दूसर ज्ञान वाचा है भाई । राज अंशको तौन पठाई ॥ तीसर ज्ञान जो अनुभव कीना । धर्म राय को लेखा दीना ॥ चौथे ब्रह्मज्ञान उपजाई । माय अंश सो ध्यान लगाई ॥ पंचवा ज्ञान सहज की डोरी । सब जीवनकी बंदी छोरी ॥ जहाँसे चार ज्ञान जो आवा । सोई कला निरंजन पावा ॥ निरंजन भये राज अधिकारी । तिनके चार अंश सेवकारी ॥ चार ज्ञानते चारो वेदा । तिनते चारो भये कतेबा ॥ मूल कुरान वेद की वानी । सो कुरान तुम जगमें आनी ॥ हक् कुरान जो तुमको दीना । हद्दहुकम तुम आपन कीना ॥ चार कतेब के चारो अंशा । तिनके कहो भिन्न भिन बंशा ॥ वेद पढावत ब्रह्मा आये । ऋग वेद को नाम लखाये ॥ दूसर यजुरवेदकी वानी । राजनीति सो कीन बखानी ॥ तीसर सामवेदकी बानी । यज्ञ होम तिन कीन बखानी ॥ चौथ अथर्वन गुप्त छपाये । तौन हुकम तुम जगमें आये ॥ ऐकै मूल कुरानमें चारी । चार बीर तुम हो सरदारी ॥ जम्बूर किताब दाऊदने पाई । नासूत मोकाम रहै ठहराई ॥ तौरेत कीताब मूसाने पाई । मलकूत मोकाम रहै ठहराई ॥ इंजील किताब ईसाने पाई । जंबरूत मोकाम रहे ठहराई ॥ फुरकानकिताब नबी तुम पाई । लौहूतमोकाम रहे लौलाई ॥ कुरान वेहदको मरम न पावे । बिनदेखे विश्वास क्या आवै ॥

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( १० )

मुहम्मदबोध

चार मोकाम किताब है चारी । पंचये नाम अर्चित सँवारी ॥ तहँते आइ रूह बारह हजारी । तहाँ अर्चित गुप्त व्योहारी ॥ साखी-पीर औलिया था किया, यह सब उरले तीर ॥ समरथ का घर दूर है, तिनको खोजो पीर ॥

❁ मारफत

चौपाई

औवलमोकाम नासूत ठेकाना । दुजामोकाममलकूतजोजाना ॥ सेउम मोकाम जबरूत ठेकाना । चहारूममोकामलाहूतजोजाना ॥ पंचये मोकामहाहूत अस्थाना । छठे मोकाम सोहं जो माना ॥ हफतुम मोकाम बानी अस्थाना । अठये मोकाम अंकूर ठेकाना ॥ नवये मुकाम आहूत निशानी । दसये मोकाम पुरुषरजधानी ॥

बेतुक

औवल शरी अत् १ । तरीकत् २ । हकीकत् ३ । मारफत् ४ । मरोवत् ५ । ध्यान दोरहिअत् ६ । जुलफकार चन्द्र गेटा ७ । हुकुमसुरतद ८ । देयना कासो यही अत् ९ । सचपावेसमरथकाय १० । अंकार ओंकार कलिमा नवी सजुपावै देखा हद् बैहद्

मुहम्मद वर्चन

तुम कब्बीर भेद अधिकाये । खुद समरथकी खबरि जो ल्याये ॥ अब तुमको हम बूझैं अत् । सो कहिये खुद अहदी संत् ॥ को तुम आहु केहांते आये । क्यों तुम अपने बर्ण छिपाये ॥ सात सुरति समरथ निरमाई । यह अस्थान रहो की जाई ॥ यती मारफत कहु दुरवेशा । हम मानैं तुमरो उपदेशा ॥ सात सुरति केहि माहि समाई । जिव बोधे सो कह चलिजाई ॥ समरथ गम तुमु साँच कबीरा । समरथ भेद कहो मति धीरा ॥

  • इस विषय में लिखे हुये मुकामों का वर्णन पुस्तकके अन्तमें देखो ।
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बोधसागर

(११)

साखी-मेरे शंका बाढिया, थाके वेद कुरान ॥ वाहिद कैसे पाइये, समरथको मक्कान ॥

सत्यकबीर बचन

सुनो मुहम्मद कहों बुझाई । जो खुद आदि अस्थान है भाई ॥ जो जो हुकुम समरथ फरमाई । सो सो हुकुम हम आनि चलाई ॥ सुर नर मुनिको टेरि सुनाये । तुमको बहुत बार समुझाये ॥ तुमपर मोह अक्षरने डारा । तेहि कारण आये संसारा ॥ सोलह असंख जुग जबै सिराई । सोलह असंख उतपति मिटि जाई ॥ सात सुरति तब लोकहि जाई । जिव बोधो तेहि माह समाई ॥ सात सुन्य तजि ते अस्थाना । ते सब मिटे होय घमसाना ॥ वेद कतेवकि छोडो आशा । वेदकतेव अक्षर प्रकाशा ॥ तीन बार तुम जगमें आये । फिर फिर अक्षरने भरमाये ॥ अक्षर चीन्हिके छोडो भाई । तीन अंश अक्षर निरमाई ॥ ब्रह्मकि सृष्टि आपको कीना । जीव वृष्टि तीरथ व्रत दीना ॥ माया वृष्टि ईश्वरी जानो । सबमें आतम एक समानो ॥ साखी-खोजो खुद समरथको, जिन किया सब फरमान ॥ पीर मुहम्मद तहाँ चलो, सोई अमर अस्थान ॥

मुहम्मद बचन

पीर मुहम्मद मुख तब मोरा । कछु नहिं चलै तुम्हारी जोरा ॥ अक्षर हुकमको मेटनहारा । चार वेद जिन कीन पसारा ॥

कबीर बचन

मुनिये सखुन मुहम्मद पीरा । हम खुद अहदी आदि कबीरा ॥ मेटो अक्षरको बिस्तारा । मेटो निरंजन सकल पसारा ॥ मेटो अंचितकी रजधानी । मेटो ब्रह्मा वेद निशानी ॥ चौदह जमको बांधि नचावों । मृत अंधा मगहर ले आवों ॥

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(१२)

मुहम्मद बोध

धर्मरायते झगर पसारा । निरंजन बांधि रसातल डारा ॥ वेद कतेबको अमल मिटावों । घर घर सार शब्द फैलावों ॥ समर्थ हुकम चले सब माही । व्यापै सत्य असत्य उठिजाही ॥

मुहम्मद वचन

पीर मुहम्मद बोले वानी । अगम भेद काहू नहीं जानी ॥ सुनाकान नहीं आखिन देखा । बिन देखे को करे विवेखा ॥ जो नहीं देखो अपने नैना । कैसे मानो गुरुको वैना ॥ जो तुम खुद अहदी है आये । हुकम हजूर फरमानले आये ॥ जौन राहसे तुम चलिआवो । सोई राह मोकहैं बतलावो ॥ हँसनको अस्थान चिन्हावो । समर्थको मोहिलोक देखावो ॥ साखी-हँसनको अस्थान लखि, तब मानो परमान् ॥

जो समर्थको हुकम है, सो मेरे परवान् ॥

कबीर वचन

सुनो मुहम्मद कहों बुझाई । साहेब तुमको देऊँ बताई ॥ चले सैल को दोनो पीरा । एक मुहम्मद एक कबीरा ॥

मोकाम १

भूमिते छत्तिस सहस ऊँचाई । मानसरोवर तहाँ कहाई ॥ तहाँ नासूत आहि मोकामा । नबी कबीर पहुँच तेहि धामा ॥ तहाँ दाऊद पर्यंवर होई । जम्बूर किताब पठे तहाँ सोई ॥ तहाँ सलामालेक सोई कीना । दस्तावोस उनहु उठि लीना ॥

मोकाम

तहवाँते पुनि कीन पयाना । चौविस सहस वैकुंठ प्रमाना ॥ तहवाँ पहुँच बैठे ऋषि बासा । देव सबै बैठे तेहि पास ॥ वह वैकुंठ विष्णु अस्थाना । मलकूत मोकाम मूसाको जाना ॥ मूसा पैगम्बर पढ़ै किताबा । उसका नाम तौरैत किताबा ॥ सलामालेक तहाँ हम कीना । दस्तावोस उनहु उठि लीना ॥