कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंबांधवसागर
( १५१ )
कारीगर
राजा कहा हमारा कीजै । सोलह दिनकी अवधी दीजै ॥ हमको साज मूरति का देओ । देवलको द्वार मूँदि कर लेओ ॥ जबही साज देवल ले जाऊ । तबहीं द्वार मूँदि हो भाऊ ॥ तबही कह्यो मूँदि पौरिहि दीजै । सब कोइ गमन यहाँसे कीजै ॥ सोलह दिनमें द्वार खुलै हो । तौ कछु विघ्न नहीं तुम पैहो ॥ देह कपाट तब ताला दीना । चहुँ दिशि पण्डों चौकी कीना ॥ दिन दंश सो बीति जब गयऊ । चलत फिरत गोरख तब अयऊ ॥
गोरख वचन
गोरख कहे दर्शन मोहि दीजै । नहिं तो शाप हमारो लीजै ॥
सत्यकबीर वचन
तब पण्डा राजा पहुँ जायी । राजा से सब बात सुनायी ॥ राजा पण्डा सों कहे बुझाई । कौन शाप गोरखकेर उठाई ॥ तब पंडा गोरख पै आये । हाथ जोरिके विन्ती लाये ॥ दिनछः हम तुमसों माँगे भाई । ता पाछे हम दरश कराई ॥
गोरख वचन
साखी-मैं गोरख प्रसिद्ध हूँ, हमरे आड जनि होइ । मोको दरश करावहू, कै शाप हमरो लेहु ॥
चौपाई
तब राजा गोरख पगु पड़िया । बहु विन्ती भावसों उच्चरिया ॥ जब गोरख नहिं माने राई । तब राजा अस कह्यो बुझायी ॥
१ इस चौपाईमें दशदिनके पश्चात् गोरखका आना बतलाया है किन्तु नवीन प्रतियों में सात ही दिन लिखा है ।
“विना सात बीते पुनि जाई । फिरत फिर गोरख पुनि आई ॥”
नवीन प्रतियोंमें सब ऐसे ही बेतुकी वाणीका ऐसा गढ़बड हुआ है कि सब यहाँ पर लिखना असम्भव है ।