कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 732, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ें( १५२ )
लक्ष्मणबोध
सत्यकबीर वचन
ऐसी कहि अपने घर वह गयऊ । तब राजा मनमें सोचत भयऊ ॥ जगन्नाथ की जो मूर्ति बनाई । गाम परगना तेहि देउँ लिखाई ॥ तब लक्ष्मी हमसे विन्ती कीना । यहि शोभा तुमही भल दीना ॥ देखी मूरति तब कोइ गढि देई । अनदेखे सो कैसे करई ॥ जो तुम हमसे टहल कराओ । यही काम करो तुम जाओ ॥ हम पर भार जो सृष्टिका दीना । करो यह काम होहु ना भीना ॥ हमको टहल सृष्टिका देहु । इतना कारज अपने शिर लेहु ॥ लक्ष्मी विन्ती ऐसी लायी । नातो विरद तुम्हारी जायी ॥ तब हम भेष सुतारका लीन्हा । बरस सौकी आयुर्दी कीन्हा ॥ आये पौरि मैं ठाढ़ रहाये । पवरिया राजकहँ वचन सुनाये ॥ राजा मैं तोहि देउँ बधाई । कारीगर आया पौरके माई ॥ कांधे बसुला बोले लौ लीना । हाले गर्दन बोले झीना ॥ राजा मनमें भये अनन्दा । जैसे चकोर पायो निशि चंदा ॥ राज प्रधान पौरीमें आयी । कारीगरसे अस कहे अर्थायी ॥ जगन्नाथकी मूरति बनाओ । तौ तुम ग्राम परगना पाओ ॥ देवलमाहिं मूर्ति धरि दीजै । जो चाहो सो हमसे लीजै ॥
कारीगर वचन
हम तो गुरु सुखा आहैं भाई । लोभ लालच नहिं हमरे ठाई ॥ देवलकाज सिद्ध करि देहों । लालच चित में नहीं करैहों ॥
सत्यकबीर वचन
इतना सुनि राजापहँ गयऊ । राजा सुनि मन हर्षित भयऊ ॥ तबही राजा महलमें जायी । रानीसों सब बात जनायी ॥ तब मुक्ताहलसो थार भरायी । कारीगरको लीन बुलायी ॥