कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ८ )
मुहम्मदबोध
ख्वार सभीको चीन्हो भाई । असल रुहको देउँ बताई ॥ असल रुहकि दीदार जो पावे । पावे निज मुसलमान कहावे ॥ हो आवाज जहां परदा पोशी । है वह मर्द कि है वह जोशी ॥ जब लग तरुत नजर नहिं आवे । दिल विश्वास कौन विधि पावे ॥ जब खुद की खबर न पावे । तब लग कुदरत भ्रम ठहरावे ॥ हाल माशूक नजर जो आवे । एक निगाह दीदार जो पावे ॥ चार वेद अक्षर निरमाई । चार अंश ताके सुत भाई ॥ एकअंश चौभाग जो कीना । ताते एक गुप्त कर लीना ॥ एक अंशते गुप्त छिपाई । तीन अंश संसार पठाई ॥ अंशाहि अंश भेद नहिं दीना । यह अचरज अक्षरने कीना ॥ जो तुम कहा हमारा मानो । तो हम तुमते निर्णय ठानो ॥ साखी—यह प्रपञ्च बेचूनका, तुमते कहा न भेव ॥ आप सो रत होइ वैठा, तुम चार करत हो सेव ॥
मुहम्मद वचन
कहैं मुहम्मद सुन खुद अहदी । इल्म लद्दुब्रूी कहु बुनियादी ॥ जब नहिं पिण्ड ब्रह्माण्ड अस्थूला । तब ना हतो सृष्टिको मूला ॥ तादनकी कहिय उपतानी । आदि अन्त और मध्य निशानी ॥ साखी—बुजरुग हकीकत सब कहो, किस विधि भया प्रकाश ॥ जब हम जाने आदिको, तो हमहूँ बाँधे आश ॥
कबीर वचन
सुनो मुहम्मद सांचे पीरा । समरथ हुकुम खुद आदि कबीरा ॥ अब हम कहैं सुनो चितलायी । आदि अन्त सब कहों बुझायी ॥ प्रथमैं समरथ आदि अकेला । उनके संग हता नहिं चेला ॥ साखी—वाहिद थे तब आपमें, सकल हतो तेहि माहैं ॥ ज्यों तरुवरके बीजमें, पुष्प पात फल छाहैं ॥