भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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बोधसागर

( ९ )

बौपाई

आठों अंस त्रिदेव समेता । उत्पत्ति जगतकीन प्रभु एता ॥ तीनों दिन त्रैलोकको राज् । तिनवसपरि जिव भयेअकाज् ॥ तिन पुनि एक जुक्ति चित दीना । प्रथम ज्ञान चार जो कीना ॥ प्रथम क्षुद्रजो ज्ञान उपजाई । ध्यान अंशको तौन पठाई ॥ दूसर ज्ञान वाचा है भाई । राज अंशको तौन पठाई ॥ तीसर ज्ञान जो अनुभव कीना । धर्म राय को लेखा दीना ॥ चौथे ब्रह्मज्ञान उपजाई । माय अंश सो ध्यान लगाई ॥ पंचवा ज्ञान सहज की डोरी । सब जीवनकी बंदी छोरी ॥ जहाँसे चार ज्ञान जो आवा । सोई कला निरंजन पावा ॥ निरंजन भये राज अधिकारी । तिनके चार अंश सेवकारी ॥ चार ज्ञानते चारो वेदा । तिनते चारो भये कतेबा ॥ मूल कुरान वेद की वानी । सो कुरान तुम जगमें आनी ॥ हक् कुरान जो तुमको दीना । हद्दहुकम तुम आपन कीना ॥ चार कतेब के चारो अंशा । तिनके कहो भिन्न भिन बंशा ॥ वेद पढावत ब्रह्मा आये । ऋग वेद को नाम लखाये ॥ दूसर यजुरवेदकी वानी । राजनीति सो कीन बखानी ॥ तीसर सामवेदकी बानी । यज्ञ होम तिन कीन बखानी ॥ चौथ अथर्वन गुप्त छपाये । तौन हुकम तुम जगमें आये ॥ ऐकै मूल कुरानमें चारी । चार बीर तुम हो सरदारी ॥ जम्बूर किताब दाऊदने पाई । नासूत मोकाम रहै ठहराई ॥ तौरेत कीताब मूसाने पाई । मलकूत मोकाम रहै ठहराई ॥ इंजील किताब ईसाने पाई । जंबरूत मोकाम रहे ठहराई ॥ फुरकानकिताब नबी तुम पाई । लौहूतमोकाम रहे लौलाई ॥ कुरान वेहदको मरम न पावे । बिनदेखे विश्वास क्या आवै ॥