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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

कबीर पंचाशिका एवं अन्य बोध

स्वसमवेवबोध

( ११७ )

चौपाई

छन यक जीवनको सुख दैऊ । जिव बँध मेटि पुरुषपहँ गेऊ ॥

अथ जीवमुक्तावन हेत सत्य कबीरको संसारमें आगमन कथा—चौपाई

यहि विधि काल जक्त धरि खायौ । जिव नहिं कोई मुक्तिपद पायौ ॥

तीनों पुर पसरा यमजाला । सकल जीव कहँ कीन बिहाला ॥

कालके करते जीव न छूटे । बहुविधि योगयुक्तिमें जूटे ॥

विनशत शब्द न जीव उवारा । तब समरथ अस वचन उचारा ॥

सत्य पुरुष वचन—चौपाई

कैल सकल जग बारचौ खाई । एको जीव लोक नहिं आई ॥

तातै समरथ मोहि फरमाई । साँचे जीव आन मुक्ताई ॥

पुरुष वचन कीने तिहि बारा । ज्ञानी बेगि जाहु संसारा ॥

प्रथमहि चलयौ जीवके काजा । पुरुष प्रताप शीस पर छाजा ॥

सतयुग सत्य सुकृत मोर नाऊँ । आज्ञा पुरुष जीव बर आऊँ ॥

करि परनाम तब पगधारा । पहुँच्यौ आय धर्म दरबारा ॥

द्रीप झांझरी नाम बखानी । कैल पुरुषकी सो रजधानी ॥

पगके देत झांझरी गाजा । कैल पुरुष बैठा तहँ राजा ॥

गये झांझरी द्रीप मँजारा । गर्बित काल न बुद्धि विचारा ॥

मोकहँ देखि धर्म ढिग आई । महाक्रोध बोले अतुराई ॥

योगजीत इहवाँ कस आवो । सो तुम हमसे वचन सुनावो ॥

योगजीत वचन—चौपाई

तासो कह्यौ सुनो धर्मराई । जीवकाज संसार सिधाई ॥

तुम तो कष्ट जिवनको दीना । तबहि पुरुष मोहि आज्ञा कीना ॥

जीव चिताय लोक ले आवो । काल कष्टते जीव छोड़ावो ॥

ताते मैं संसारहि आवो । देय परवाना लोक पठावो ॥

अथ कालपुरुष और सत्यकबीरका युद्धवर्णन—चौपाई

काल क्रोध करि वचन उचारा । भवसागरमें राज हमारा ॥

( ११८ )

बोधसागर

तुम कस जिव मुक्तावन आवा । मारो तोहि अबहि भलदावा ॥ काल अनंत रूप तब धारा । योगजीत कह आनि प्रचारा ॥ महाभयंकर रूप बनावा । गज स्वरूप है सम्मुख धावा ॥ सत्तरयुग हम सेवा कीना । पुरुष मोहि भवसागर दीना ॥ परमपुरुष सेवा वस भैऊ । राज तिहुँ पुरको मोहि दैऊ ॥ तब तुम नारि निकारौ मोही । योगजीत नहि छोडो तोही ॥ अस कहि धाय सुंड फटकारा । दंतसो योगजीत पर मारा ॥ योगजीत कै लहि ललकारा । गहि कर सुंड दूर तिहि डारा ॥ पुरुषप्रताप सुमिर मन माहीं । मारचो सत्य शब्द से ताहीं ॥ ततछन ताहि दृष्टि पर हेरा । श्यामलिलार भयौ तिहिकेरा ॥ पंख घात जिमि होय पखेरू । तैसे कैल मोहि प्रति हेरू ॥ जब फटकार कर गहे डाला । भागा काल पैठ पाताला ॥ गयौ पाताल कूर्मके आगे । योगजीत गये पीछे लागे ॥ बिनती करे कूर्मसे जाई । राखो कूर्म शरन हम आई ॥ योगजीत मोहि मारि निकारा । जिव ले जाय पुरुष दरबारा ॥ युगन युगन हम सेवा कीना । पुरुष मोहि भवसागर दीना ॥ एक पायँ हम ठाढे रहेऊ । तबहि पुरुष सेवा सब भैऊ ॥ तीन लोक दीना मोहि हारी । अब कस मोकहँ मारि निकारी ॥ जाय कूर्मकी शरन जो परेऊ । तब ताने दाय़ा उर धरेऊ ॥

कूर्मवचन--चोपाई

तबै कूर्म उठि बिनती लाई । को तुम आहु कहाँ ते आई ॥ अपनो नाम कहो मोहि स्वामी । पुरुष अंश तुम अंतरयामी ॥

योगजीत वचन--चोपाई

तब हम कहा नाम मोर ज्ञानी । योगजीत हम अंश बखानी ॥ समरथ वचन जीव बर आवा । काल फौंस जीवन मुक्तावा ॥

स्वसमवेदबोध

( ११९ )

कैलवचन

सुन ज्ञानी मोर वचन अलेखा । अपने मनमें करो बिवेका ॥ सत्तर युग हम सेवा कीना । पुरुष बकसि भवसागर दीना ॥ समरथ वचन दीन मोहि हारी । तीन लोक पायौ संसारी ॥ तबकी बात रहित भै भाई । अब कस उलटी अदल चलाई ॥ सबै अंश भुक्तै रजधानी । हमपर कोप भयौ तुम ज्ञानी ॥ अब जस निरणय हमै सुनावो । तस सीषा पन जानि चलाओ ॥

कूर्मवचन

तबै कूर्म बोले अस वानी । बिनती एक सुनो हो ज्ञानी ॥ जो तुम बिनती मानो मोरा । तौ हम तुमसे करे निहोरा ॥ तुमहू कैल वचन जौ मानो । तौ हम ज्ञानी निर्णय ठानो ॥ ज्ञानी सुनौ पुरुष कै अंशा । धर्मरायको मेटो संसा ॥ चौका पान कजाव तुमारा । लोक वेदको काल पसारा ॥ जो कोइ करे जोर बरियाई । तौ हम ताके संग न भाई ॥ कूर्म जबै अस बिनती ठानी । ज्ञानी कैल दोहू सुख मानी ॥ फिरके कैल झांझरी आनो । ज्ञानी कैलको वचन सुनावो ॥

ज्ञानी और कालपुरुषको वार्ता--चौपाई

बिना शीसके यमकी देही । काल पुरुषको चीन्ह है येही ॥ सत्य कबीरसे बिनय उचारी । सुनिये ज्ञानी अरज हमारी ॥ अपनी देह नाथ मोहि दीजै । ऐसी मोपर दाय़ा कीजै ॥ ताको वचन मानि हम लीना । अपनी देहको कैलको दीना ॥ शीश समेत और बिन माथा । दोनों देह निरंजन साथा ॥ जब चाहे तब शीस देखाई । निज इच्छा पुनि ताहि लोपाई ॥ जो साधू बैराट निरेखे । सो यह कौतुक नैनन दीखे ॥ रूप विराट शून्यमें निरखे । निजु आगूको लेखा परखे ॥ जब षट्मास मरन रहि जावै । काल कबीर कि देह छपावै ॥

( १२० )

बोधसागर

अपनी देह देखावै काला । तब साधू जाने जंजाला ॥ बिना शीस जब दरसै देहा । काल पुरुष तब जाने येहा ॥ मरन काल निज साधु निहारी । होहि सचेत लगावै तारी ॥

निरंजन वचन

सोरठा-तुमहुँ करो बखशीश, पुरुष जो दीनो राज मोहि । षोडशमें तुम ईश, ज्ञानी पुरुष एक सम ॥

ज्ञानी वचन--चौपाई

ज्ञानी कहै सुनो धर्मराई । जीवनकहँ मैं आन बचाई ॥ पुरुष आज्ञाते मैं चलि आवों । भवसागरते जीव मुक्तावों ॥ पुरुष अवाज टार यहि बारी । तौ मैं तोकहँ देब निकारी ॥

शब्द

अपने नामकी सोंकर गह मैं पाटि डरी हो । तना तनतकै बेटवा मारे निधिया गई बौराई ॥ देहरि चढ़िके मेहरि मारे निर्ई देखो गुरुवाई । परवा फोरि द्वैचोखा निकसे बीचमें मिलि गई हस्ती ॥ सोटा चार कमरमें मारेनि निकर गई अलमस्ती । आसन लूटेनि वासन लूटेनि लूटे तिनपाई पौवा ॥ ताल अस मोर सनहक लूटी हांडी चलावन डौवा । हँसियाको बेट कोदोकै भूसी ईमोर न्यामत लूटी ॥ कहैं कबीर सुनो भाई साधो दुविधा गै अब छूटी ।

निरंजन वचन--चौपाई

धर्मराय अस बिनती ठानी । मैं सेवक दुतिया नहिं मानी ॥ ज्ञानी बिनती एक हमारा । सो न करो मोर होय बिगारा ॥ पुरुष मोकहँ दीनो राजू । तुमहू देव होय तब काजू ॥ बिनती एक करो हो ताता । दृढ़ करि जान्यौ हमरी बाता ॥

स्वसमवेदबोध

( १२१ )

कहा तुमार जीव नहीं माने । हमरी दिशभै वाद बखानै ॥ मैं हठ फंदा रच्यौ बनाई । जामें जीव परा अरुझाई ॥ वेद शास्त्र सुमिरन गुन नाना । पुत्र हैं तीन देव परधाना ॥ देवल देव पखान पुजार्ह । तीरथ व्रत जप तप मन लाई ॥ यज्ञ होम अरु नियम अचारा । और अनेक फंद हम डारा ॥ जौ ज्ञानी जैहो संसारा । जीव न माने कहा तुमारा ॥

ज्ञानी वचन-चौपाई

ज्ञानी कहै सुनो धर्मराई । काटो फंद जीव ले जाई ॥ जेतो फंद रची तुम बारी । सत्यशब्द ले सकल विडारी ॥ जिहि जिवको हम शब्द हटै हैं । फंद तुम्हार सबै सुतैहैं ॥

निरंजन वचन चौपाई

सतयुग त्रेता द्वापर माहीं । तीनों युग जिव थोरे रहिजाही ॥ चौथा युग जब कलऊ आई । तब तुव शरण जीव बहु जाई ॥ ऐसे वचन हारि मोहि दीजै । तब संसार गौन तुम कीजै ॥

ज्ञानी वचन चौपाई

अरे काल परंपंच पसारा । तीनो युग जीवन दुख डारा ॥ बिनती तोरि लीन मैं मानी । मोकहैं ठगे काल अभिमानी ॥ चौथा युग जब कलऊ आई । तब हम अपनो अंश पठाई ॥ काल फन्द छूटे नर लोई । सकल सृष्टि परवानिक होई ॥ घर घर देखो बोध विचारा । सत्य नाम सब ठोर उचारा ॥ पांच हजार पांचसौ पांचा । तब यह वचन होयगा सांचा ॥ कलियुग बीत जाय जब येता । सब जिव परम पुरुषपद चेता ॥

निरंजन वचन चौपाई

ज्ञानी बिनती सुनो हमारी । द्वापर अंत होय जिहि बारी ॥ बोध शरीर धरब हम जाई । जगन्नाथको नाम धराई ॥

( १२२ )

बोधसागर

राजा इंद्रदौन पहाँ जैहैं । मेरो मंदिर सोई उठै हैं ॥ तब समुद्र ढाहनको धावै । मंदिर मेरो तोरि बहावै ॥ कृपा करो तब तुम तहाँ जाई । मेरो मन्दिर देहु थपाई ॥ जो हंसा तुमरो गुण गाई । ताके निकट तो हम नहिं जाई ॥ जो कछु वर माँग्यो धर्मराया । सो ज्ञानी दीनो करि दाया ॥ धर्मराय उठि शीस नवाई । तब ज्ञानी संसारहि आई ॥

इति

अथ सतयुगमें ज्ञानीजीको मृत्युलोकमें आगमनकथा और सत्य

सुकृत नाम धारण और जवत जीव तारण--चौपाई

ज्ञानी योगजीत कहलाये । सत्यसुकृत सुनींद्र बतलाये ॥ पुनि अचित मुक्तामणि होई । योग संतायन कहिये सोई ॥ अविनाशी करुणामय जानी । कबीर आदि बहुनाम बखानी ॥ चारों युगके चारों नामा । सतयुग सत्यसुकृत गुणधामा ॥ त्रेतामाँह सुनींद्र नामधर । करुणामय स्वामी कह द्वापर ॥ कलियुगमाँह कबीर कहाये । हिंदू मुसलमान गुण गाये ॥ सैद अहमद कबीर बखाना । शेख कबीर कहे मुसलमाना ॥ सोई सकल जक्त गुरु पीरा । नाम अनेकन ताके तीरा ॥ देश देशमें नाम है न्यारा । सारे जीव जक्तको तारा ॥ वेद पुराण जासु गुण गावै । नाम अनंत जासु निरतावै ॥ आदिकाल जब सतयुग आया । सत्यसुकृत सो नाम धराया ॥ तीन देवते कीन पुकारा । सो नहिं माने मन हंकारा ॥ प्रथमहिं जब पृथ्वीपर आये । नृप घोघल कह नाम हढ़ाये ॥ सतगुरु चीन्हि चरण लपटाना । नरनायक लह पद निर्वाना ॥ पुनि सतगुरु मथुरामें आई । खेमसरी तिय तहाँ रहाई ॥ खेमसरी ग्वालिनहि चितावा । कुल परिवार सहित मुक्तावा ॥

स्वसमवेदबोध

( १२३ )

पुनि सत सुकृत लोक सीधारा । पहुँच हंस पुरुष दरबारा ॥ पुरुष दरश सब हंसन पाईं । कोटि सोम रवि रोम लजाईं ॥ पुरुष स्वरूप भये सब हंसा । बीती सब यमकी भ्रम शंसा ॥ कछु दिन कीने लोक निवासा । बहुरि आय देख्यो निजदासा ॥ निशि दिन रहौं गुप्त जगमाहीं । मोकहँ कोइ जिव चीन्हत नाहीं ॥ जिहि जीवन परबोध्यौ आईं । दीन्हौं तिनको लोक पठाईं ॥ सत्यलोक हंसनको बासा । सदा वसंत पुरुषके पास ॥

इति

सतयुगका वृत्तान्त

अथ त्रेतायुगमें सतसुकृतजीको पृथ्वीमें आगमनकथा और

मुनींद्रनाम धारण और जबत जीवतारण

सत्कबीर वचन-चौपाई

सतयुग गत है त्रेता आवा । नाम मुनींद्र जीव मुक्तावा ॥ जब आयो जीवन उपदेशा । धर्मराय उर हुआ अँदेशा ॥ इन भवसागर मोर उजारा । जिव ले जाय पुरुष दरबारा ॥ कितनो छल बल करो उपाईं । ज्ञानी डर मोर नाहिं डेराईं ॥ पुरुष प्रताप ज्ञानीके पास । ताते मोर न लागे फाँसा ॥ इनते काल बसावै नाहीं । नाम प्रताप जीव घर जाहीं ॥ छंद-सतनामके परताप धर्मन हंस निज घरको चले ॥ जिमि देखि केहरि त्रास गज हो कँपिके धरनी रले ॥ पुरुष नाम प्रताप केहरि काल गज सो जानिहै ॥ नाम गहि इसलोक पहुँचे बहुरि भव नाहिं आनिहै ॥ सोरठा-सतगुरु शब्द समय, गुरु आज्ञा निरखत रहै । रहै नाम लौ लाय, कर्म भर्म ममता तजे ॥

चौपाई

त्रेतायुग तबही पग धारा । मृत्युलोक कीनो पैसारा ॥

( १२४ )

बोधसागर

जीव अनेकन पूछेहु जाई । यमसे को तोहि लेय छोड़ाई ॥ कहै कर्म वश जिव अज्ञाना । हमरे कर्ता पुरुष है ध्याना ॥ विष्णु सदा हमरे रखवारा । यमसे मोहि छोडावनहारा ॥ कोई महेश कि आसा लावै । कोइ चंडी देवीको गावै ॥ कहा करो जिव भयो बिगाना । खसम छोड़िकर जार बिकाना ॥ भरम कोठरी सब जग डारा । धोखा दे यम जीवन मारा ॥

साखी सोई काल सोई है करता, भक्ति मुक्ति तिहि हाथ । हमरो कहा न आदरे, मन यम जिवके साथ ॥ परंपंची निरंजन, मन सोई ओंकार । फंदे तीनों लोक सब, कोई न पावै पार ॥

चौपाई

सत्यपुरुषको आयसु पावो । कालहि मेटिछोरि जिव ल्यावो ॥ जोर करो तो वचन नशाई । सहज जीवन लेहु चेताई ॥ जो ग्रासै जिव सेवै ताही । अनचीन्है यमके मुख जाही ॥ चहुँदिशि फिर आयौ गढलंका । जहँवाँ रावण बसै निशंका ॥ भाट विचित्र पन्यौ गुरुचरना । पायौ अमर धाम गहि शरना ॥ मंदोदरी प्रेममें पागी । सतगुरुके सो चरनन लागी ॥ रानीको दीनो गुरुदिच्छा । पूरन भई तासुकी इच्छा ॥ पुनि आयौ रावण दरबारा । जहाँ पौरिया रह रखवारा ॥ कह्यौ पौरियाते तब जाई । रावणको मम पांह बोलाई ॥ जबहि पौरिया खबरि जनाई । सिद्ध एक प्रभु तुमहिं बोलाई ॥ सुनि प्रभु क्रोधकीन तेहि बारा । तैं मतिहीन आहि प्रतिहारा ॥ शिवसुत मोर दरश नहि पावै । भिक्षुक मोकहँ कहा बोलावै ॥ यह मत ज्ञान हन्यौकिन तोरा । जो तू मोहि बोलावन दोरा ॥

स्वसमवेदबोध

( १२५ )

हे प्रतिहार सुनो यह बानी । सिद्धरूप तुम कहो बखानी ॥ कौन बरन अरु कौन है भेखा । मोसन कहो दृष्टि जो देखा ॥ अहो राव तिहि श्वेत स्वरूपा । श्वेतहि माला तिलक अनुपा ॥ शशिसमान तिहि रूप विराजा । श्वेतबरन सब श्वेतहि साजा ॥ मंदोदरि कह सुन रावण राजा । यह तो रूप पुरुषको साजा ॥ वेगिहि आय गहो तुम पाई । तौ तुव राज अटल है जाई ॥ छोड़िहो अपनो मान बढ़ाई । गहो चरण तिहि शीस नवाई ॥ रावण सुनत कोध अति कीना । जरत हुताशन जनु घृत दीना ॥ रावण चलो अस्त्र गहि हाथा । तुरत जाय तिहि काटो माथा ॥ मारो ताहि शीस खसि परई । देखो भिक्षुक कहा मोर करई ॥ जहैं सुनींद्र तहैं रावण आई । सत्तर बार तरवार चलाई ॥ लै सुनींद्र यक तृणको ओटा । अतिबल रावण मान्यो चोटा ॥ रावण अस्त्र अफल जब भयऊ । तब खिसियायके सोरहि गयऊ ॥ तृण सुनींद्र लीने यहि भावन । बल तुमार देखो नृप रावण ॥ काटे जो तृण कटै न तेरे । कौन भाँति शिर खंडै मेरे ॥ मन्दोदरी कहै समुझाई । हे नृप सतगुरुको गहु पाई ॥ रावण कहे सहित अभिमाना । सेवों शिव नहिं जानों आना ॥ जाने अटल राज मोहिं दीना । ताहि दंडवत पलपल कीना ॥ ऐसो वचन सुनींद्र पुकारी । हो रावण तुम गर्व प्रहारी ॥ भेद हमारा तुम नहिं जानी । वचन एक तोहि कहौं बखानी ॥ रामचंद्र तोहि माँरें आई । मांस तुम्हार स्वान नहिं खाई ॥ रावणको कीनो अपमाना । औध नग्र कह कीन पयांना ॥ मारगमाहँ चलो जब जाई । मधुकर विप्र मिला तब आई ॥ सो सुनींद्रके चरनन परेऊ । अतिसै प्रेम मोद मन भरेऊ ॥ तापर सतगुरु कीनी दाय। सहितकुटुम निजलोक पठाया ॥

( १२६ )

बोधसागर

रामचन्द्र वन भये दुखारी । तबहिं मुनींद्र तहाँ पग धारी ॥ योग युक्ति रघुपतिहि दृढ़ाई । बहुविधि ताकहैं शांति धराई ॥ जब मुनींद्रजी दायो कीने । सेत बांधि लंका पग दीने ॥ मन संशय कीने हनुमाना । सतगुरु कृपा लह्यौ दृढ़ ज्ञाना ॥ गरुड़ जो परम प्रेमते ध्याये । परम हंसकी पदवी पाये ॥ यहि बिधि केते जीव चेतार्ई । तब मुनींद्र निज लोक सिधार्ई । पहुँचे हंस पुरुष दरबारा । दरस पाय दुख हंस विदारा ॥ कछुक दिवसजबयहिबिधि बीते । त्रेता गत द्वापर तब थीते ॥

इति त्रेतायुगवृत्तान्त

अथ द्वापर युगमें मुनींद्रजीको पृथ्वीमें आगमन कथा और करुणामय स्वामी नामधारन और जवतजीव तारन--बोपाई

पुरुष अवाज भई तेहि बारा । ज्ञानी बेगि जाहु संसारा ॥ परम पुरुष कह शीस नवाई । महि मंडल मुनींद्र चलि आई ॥ जो प्रभु आहि नाम अरु नामी । द्वापर कह करुणामय स्वामी ॥ प्रथमहि जब भूलोक सिधारे । गढ गिरनार तहाँ पग धारे ॥ चंद्रविजय नृप नाम बखानी । गढ गिरनार तासु रजधानी ॥ परम भक्ति मय ताकी रानी । इंद्रमती तेहि नाम बखानी ॥ साधुसे परम प्रीति सो धारे । नित साधुनकी बाट निहारे ॥ साधुको जहाँ कहुँ आवत हेरे । नित आपने ढिग सो टरे ॥ परम प्रीतिसे सेवा धारे । तन मन धन साधुनपर वारे ॥ तासु प्रीतिकी रीति बिचारी । करुणामय स्वामी पग धारी ॥ जात चले तेहि मारग माहीं । रानीको मंदिर रह जाहीं ॥ देखे रानी चढ़ी अटारी । साधु जानि हरषित भइ भारी ॥ त्वरित पठायौ तहाँ निज चेरी । बेगि साधुको आनहु टेरी ॥ वृषली चलि हमकहैं शिर नावा । रानीको संदेश सुनावा ॥

स्वसमवेदबोध

( १२७ )

महाराज दाया चित दीजै । भूपति भौन गौन अब कीजै ॥ करुणामय स्वामी कह ताहीं । हम नहिं भूपतिके गृह जाहीं ॥ राज काज है मान बड़ाई । हमैं साय ना नृप घर जाई ॥ पुनि वृषली रानी ढिग आवो । साधु न आवै मोर बोलावो ॥ यह सुनि इंद्रमती उठि धाई । करुणामयके पद शिर नाई ॥ मोपर दाया कीजै नाथा । मो गृह चलिये करो सनाथा ॥ रानीकी लखि प्रीति अपारा । करुणामय तिहि भौन सिधारा ॥ ताके भौन जबहि पग दीनो । चरण धोय चरनोदक लीनो ॥ रानी चरनामृत करि पाना । बहुतभांति कीने सनमाना ॥ कीन सेव भल हिय हर्षाई । पीछे ज्ञान मुननको आई ॥ सुनि गुरुज्ञान प्रीति अति बाढ़ी । चरनन लागि प्रेममें गाढ़ी ॥ नाथ मोहि गुरुदीक्षा दीजै । अपनी शरन माहिं अबलीजै ॥ रानीको गुरुदीक्षा दीना । राजा चंद्रविजय नहिं लीना ॥ रानीको निज लोक पठाया । सो सतगुरुसे विनय सुनाया ॥ हे प्रभु नृपको करो उबारा । यद्यपि वह नहिं शिष्य तुमारा ॥ भावभक्ति रानीके काजा । सतगुरु कृपा तरो सो राजा ॥ यहिबिधिजिनजिनगृहगुरुज्ञाना । सो सब सत्यलोक कर थाना ॥ हंसनको सतलोक ले जाई । तहाँ आप कछु काल वितार्ई ॥

इति द्वापर युग

अथ कलियुगमें करुणामय स्वामीको पृथ्वीमें आगमन कथा

और सत्य कबीर और सेयद अहमद कबीर शेख कबीर

नामधारण और जग जीव तारण--चौपाई

द्वापर जगको अंत जो पाया । पुरुष बचन तब टेरि सुनाया ॥ ज्ञानी बेगि जाहु मर्त्य लोक । नाश करो जीवनको शोका ॥ सत्य पुरुषको करो प्रणामा । तब ज्ञानी पहुँचे नर धामा ॥

( १२८ )

बोधसागर

प्रथमहि मृत्युलोक जब आये । कलियुग नाम कबीर कहाये ॥ हिंदू मुसलमान गुरुपीरा । मिश्रित नाम कहाव कबीरा ॥ प्रथमहि प्रकट भये चलि काशी । तहाँ आपनो ज्ञान प्रकाशी ॥ नग्रमें जबहिं धरे निज पाई । श्वपच सुदर्शन तहाँ रहाई ॥ ताने सतगुरुको पहिचाना । चरनन लागि गह्यो दृढ़ ज्ञाना ॥ जब सतगुरुकी दीक्षा पाई । करे भक्ति सो मन चित लाई ॥ श्वपच करे भक्ती मन लाई । मात पिता देखै हर्षाई ॥ भक्ति पुत्र लखि हरषित होई । सतगुरु दीक्षा लियो न दोई ॥ ताही काल कृष्ण औतारा । अरु कौरौ पांडव तन धारा ॥ सत्य कबीर कृष्णसंवादा । ज्ञानगुष्टि तहैं बहु कथि बादा ॥ कृष्णहि बहु विधि ज्ञान दृढाई । क्षर अक्षरके पार लखाई ॥ सत्य कबीर ज्ञान गंभीरा । कथे सकल सुर नर मुनितीरा ॥ ताही समय युधिष्ठिर राजा । ताने कीन यज्ञको साजा ॥ वंधु मारि अपकीरति कीना । ताते यज्ञ रचन चित दीना ॥ कृष्णकेरि जब आज्ञा पाई । तब पांडौ सब साज मँगाई ॥ यज्ञ कि सामित्री गहि सारी । जहैं तहैंते सब साधु हँकारी ॥ पांडौ प्रति बोले यदुपाला । पूरन यज्ञ जान तिहि काला ॥ घंट अकास बजत सुनि आवो । यज्ञको तब पूरन फल पावो ॥ जुरे तहाँ कोटिन ऋषि राजा । साधू ब्राह्मण सहित समाजा ॥ भोजन विविध प्रकार बनाई । परम प्रीतिसे सबहि जेवाई ॥ भोजन कीन सकल ऋषिराई । बजा न घंट भूप भ्रम आई ॥ पांडौ तबहि कृष्णपहैं गयऊ । मन संशय करि पूछत भयऊ ॥ करिके कृपा कहो यदुराजा । कारन कौन घंट नहि बाजा ॥ सो अस कारण तासु बताई । साधू नहि कोइ भोजन पाई ॥ चक्रत है तब पांडौ कहेऊ । कोटिन साधू भोजन लहेऊ ॥

स्वसमवेदबोध

( १२९ )

अब कहँ साधु पाइये नाथा । तब तिनते बोले यदुनाथा ॥ श्वपच सुदर्शनको ले आवो । आदर मान समेत जँवावो ॥ सोई साधु और नहिं कोई । पूरन यज्ञ जाहिते होई ॥ कृष्णकी जब अस आज्ञा पाई । तब पांडौ ताके ढिग जाई ॥ श्वपच सुदर्शनको ले आई । विनय प्रीतिसे ताहि जँवाई ॥ भूप भौन भोजन कर जबही । बजा अकाशमें घंटा तबही ॥ काल कलुक जब गयौ सिराई । तब देहांत श्वपचको आई ॥ तन तजके तब सो चलि जाई । सतगुरु तिहि निजलोक पठाई ॥ ताही समय कृष्ण तज देही । बोधरूप धारचो तब येही ॥ नाम जो इन्द्रदौन तेहि काला । देश उड़ैसेको महिपाला ॥ तन तजि कृष्ण तहां चलि जाई । इन्द्रदौन कहँ स्वप्न देखाई ॥ स्वप्नमें अस हरि ताहि बताई । मेरो मंदिर देहु उठाई ॥ भूपतिसे जब ऐसे कहेऊ । सो मंदिरकी रचना गहेऊ ॥ रामचंद्र गहि निज दल भीरा । गये जबहि वारिधिके तीरा ॥ बांध्यौ सेत बंध बरियाई । तेहि कारन सागर दुख पाई ॥ जो बलवान अबल दुख देई । बदला अवशि भरैंगे तेई ॥ नीति निरंजनकी यह जाना । स्वसमवेदमें प्रथम बखाना ॥ बदला पूर्व लेन तिहि बारा । छोभित सिन्धु उठा खरधारा ॥ जब रचि मंदिर लाग उठावा । क्रोधवंत सागर तब धावा ॥ छनमें धाय सकल सो बोरे । जगन्नाथको मंदिर तोरे ॥ हारा नृप करि जतन उपाई । हरि मंदिर तहाँ उठै न पाई ॥

सत्यकबीर बचन-चौपाई

मंदिरकी यह दशा बिचारी । बर पूरब मनमाहँ सँभारी ॥ तब हम चले उड़ैसे माहीं । इन्द्रदौन भूपतिके पाहीं ॥ मन्दिर षट परकार बनाई । उदधि नीर तेहि लीन बुडाई ॥ पीछे उदधि तीर हम जाई । जायके चौरा तहाँ बनाई ॥

बो० सा० ९/

( १३० )

बोधसागर

इन्द्रदौनकहँ वचन सुनावो । अहो राव तुम काम लगावो ॥ मण्डप शंक न राखो राजा । इहवों हम आये यहि काजा ॥ जाहु बेगि जनि लावहु बारा । निश्चय मानो वचन हमारा ॥ राजा मण्डप काम लगाई । मण्डप देखि उदधि तब धाई ॥ सागर लहरि उठै बिकरारा । आवै लहरि क्रोध चित धारा ॥ उदधि उमङ्ग क्रोध अति आई । लहरि आनि चौरा नियराई ॥ दरस हमार उदधि तब पाई । अतिभय मान रहा ठहराई ॥

समुद्र वचन

छन्द-रूप धान्यो विप्रको तब उदधि हमपै आइया । चरन गहिके माथ नायो मरम हम नहि पाइया ॥ जगन्नाथके भोर स्वामी ताने हम इत आइया । अपराध मेरो क्षमा कीजै मरम अब हमपाइया ॥ सोरठा-तुम प्रभु दीन दयाल, रघुपति ओल दिवाइये । वचन करो प्रतिपाल, कर जोरे बिनती करो ॥

चौपाई

कीनो गौन लंक रघुवीरा । उदधि बांधि उतरे रन धीरा ॥ जो कोइ करे जोर बरियाई । अलखरूप तिहि ओल दिवाई ॥ मोपर दया करो तुम स्वामी । लेव ओल उर अंतर्धामी ॥

कबीर वचन--चौपाई

ओल तुमार उदधि हम चीन्हा । बोरे नम्र द्वारिका दीना ॥

उदधि वचन

यह सुनि उदधि धरचो तब पाई । चरन टेकि तब चल हरषाई ॥ उदधि लहरि उमँगौ तब धाई । बोरचो नम्र द्वारिका जाई ॥ मंदिर काम पूर तब भयऊ । हरिको थापन तहवों कियऊ ॥

कृष्ण वचन--चौपाई

तब पंडन हरि स्वप्न जनायो । सत्य कबीर मोहिं पै आयो ॥

स्वसमवेदबोध

( १३१ )

आसन सागर तीर बनाईं । दरस कबीर उदधि उठि जाईं॥ यहि विधि मंदिर मोर थपाईं । कलि युगमें एक धाम बसाईं ॥

पंडा वचन--चौपाई

पंडा उदधि तीर तब जाईं । करि असनान मंडपहि जाईं ॥ पंडा मन अस पाखण्ड लाईं । प्रथमहि दरस मलेच्छ देखाईं॥ हरिको दरसन हम नहि पाईं । पहिले हम चौरा गनि आईं ॥ तब हम कौतुक एक बनाईं । पूजन मंडप पंडा जाईं ॥ तहवाँ एक चरित्र रहाईं । लखि पंडा चक्रुत है जाईं ॥ जहँ लगि सूरत मंदिर माहीं । भये कबीर रूप धरि ताहीं ॥ हरि मूरति कहैं पंडा देखा । भये कबीर रूप धरि भेखा ॥ अछत पुष्प लै विप्र भुलाईं । नहिं ठाकुरको पूजन पाईं ॥ देखि चरित्र विप्र शिर नावा । हम स्वामी तुम मर्म न पावा ॥ तुमकहैं देखि हीन मन लाईं । ताते मोहि चरित्र देखाईं ॥ छमा अपराध करो प्रभु मोरे । विनती करौं दोउ कर जोरे ॥

छन्द-बचन एक मैं कह्यौं ताते विप्र सुन तैं कान दे ।

पूज ठाकुर दीन आयसु दुबिधा मनकी छाड़ दे ॥

आंति भोजन करे जो जिव आगहीनो तासुको ।

करे भोजन छूति राखे शीश उलटै जासुको ॥

चौपाई

पंडौ मनमें मान्यौ हीना । ताते यह चरित्र गुरु कीना ॥ जगन्नाथकी छूति उठाईं । बर्न विवेक न तहाँ रहाईं ॥ सबहि जाति हरि भोग लगावैं । यकठे बैठके भोजन पावैं ॥ कछु नहिं छूति रही तिहि ठामा । सर्वजाति यकमय हरिधामा ॥ आचारिनि बहु कीन विचारा । जगन्नाथ है चलै अचारा ॥ तिनको तहैं आचार न चाले । सत्य कबीर वचन को टाले ॥

( १३२ )

बोधसागर

इमि गुरु हरि मंदिर थपवाई । पूरब कथा बहुरि अब आई ॥ श्वपच सुदर्शन तन तजि गयऊ । लोकजाय गुरु बिनती कियऊ ॥ हे सतगुरु अस दाया कीजै । मेरे मातु पिता गति दीजै ॥ श्वपचके मातु पिता जो रहेऊ । पूर्वदेह गुरु ज्ञान न कहेऊ ॥ ताते बहुरि देह सो धारी । द्विजकुलमें प्रकटे नर नारी ॥ पुत्रकि भक्ति प्रतापते सोई । श्वपच देह तजिके द्विज होई ॥ कुलपति नाम पिताको रहेऊ । श्रिया नाम माताको कहेऊ ॥ चन्दवार तेहि नयको नाँऊ । नारी पुरुष बसैं तेहि ठाँऊ ॥ जब दोनों द्विज कुल तन पाई । नरहरि लछमना नाम धराई ॥ जगन्नाथ के योग पग धारे । सत्य कबीर चले चँदवारे ॥ दोऊ जीव तारनके काजा । चँदवार गुरु आनि विराजा ॥

सत्यकबीर वचन-चौपाई

जगन्नाथसे जब पग धारे । तबहि आनि पहुँचे चँदवारे ॥ बालक रूप धरयो तिहि ठामा । कीनेहु तालमाहि विश्रामा ॥ कमल पत्र पर आसन लाई । आठ पहर हम तहाँ रहाई ॥ नरहरि नारि लछमना जोई । तालके ऊपर पहुँची सोई ॥ पुत्र हेत सों आस लगाई । करि असनान विनय रविराई ॥ अञ्जल ले विनवै कर जोरी । सुन्दर पुत्रहेत चित दौरी ॥ ततछन हम अंचल पर आवा । हमकहँ देखि नारि हरषावा ॥ बालरूप है भेटयो ओही । विप्र नारि यह ले गई मोही ॥ बहुत धौस तिहि संग रहाऊ । नारि पुरुष मिलि सेवा लाऊ ॥ जब हम उठै पलँग झटकोरा । सुवरन मिलै तिन्हें यक तोरा ॥ तिनके हृदय न शब्द समार्ई । बालक जानि प्रतीत न आई ॥ ताहि देह नहि चीन्हो मोही । भयो गुप्त तबही तन ओही ॥ नरतिय जब दोनों तन त्यागे । जन्म लीन जोलहा है जागे ॥

स्वतमवेदबोध

( १३३ )

नीरू नीमा जोलह जोलाही । काशी नग्र बसै दोड ताही ॥ ताही नग्र कवीर तलाई । कमल पुष्प तामें रह छाई ॥ बालक रूप तहाँ हम लीने । कमल पुष्प पर आसन कीने ॥ तहैं बारह बालक पौढाऊ । करे कुटूहल बाल सुभाऊ ॥ तिहि औसरमें नीरू जोलाहा । नारि गौन सँग ल्यावै ताहा ॥ तृषावंत जब मै सो नारी । तालपै जल अँचवन पग धारी ॥ नीमा दृष्टि बाल पर परेऊ । देखत दृश मोद मन भरेऊ ॥ जिमिरविदृश पद्म विकशाना । धाय धरचो धन रंक समाना ॥ तब सो बालक लियौ उठाई । ले बालक नीरूपहैं आई ॥ क्रोधवन्त जोलहा तब भैऊ । नीमासे तब ऐसे कहेऊ ॥ काको बालक तैं लै आई । नग्रमें मेरी होय हँसाई ॥ नग्रके लोग हँसैगे मोही । गौनहि तिय बालक सँग जोही ॥ जोलहा रोष कीन तिहि वारी । बेगि देहु तुम बालक हारी ॥ हर्ष गुना बनि नारी लाई । तब हम तासे बचन सुनाई ॥

बाल वचन

छन्द-सुनहु बचन हमार नीमा तोहि कहीं समुझायके । पिछली प्रीतिके कारने तोहि दृस दीनो आयके ॥ आपने गृह लै चलो मोहि चीन्हिके जौँ गुरु करो । देहुँ नाम दृढाय तुमको फंद यमके नहि परो ॥ सोरठा-सुनत बचन अस नारि, नीरू त्रास न राखेऊ । ले गई नग्र मझार, काशी नगर पहुँचेऊ ॥

चौपाई

लै बालक जब घरको गैऊ । नग्र लोग सब देखत भैऊ ॥ नग्र नारि नर हाँसी लाई । नारि गौन सँग बालक ल्याई ॥ जोलहा सुनि सुनि लाजित होई । बाल वृतांत कहै सब सोई ॥

( १३४ )

बोधसागर

यह बालक तलावमें पाईं । नीमा देखि ताहि लै आई ॥ कमलपुष्प शिशु सेज बनाई । हरषित नारि सो लियौ उठाई ॥ जोलहा यद्यपि कथा प्रकासी । तऊ लोग सब करते हाँसी ॥ बहुत घौस तिहि भौन रहाऊ । जोलहा जाने बालक भाऊ ॥ बालक रूप तासु ग्रह रहते । खानपान तहँ नहिं कछु गहते ॥ बिन भोजन तन छवि सरसाई । दिन दिन देहकी दीरघताई ॥ जोलहा पुनि पंडितन बोलाये । बालक नाम धरनको आये ॥ पंडित करन जो लगे बिचारा । तब शिशु निजमुख बचन उचारा ॥ नाम कबीर हमारा अहई । और नाम जनि पंडित कहई ॥ यह सुनिके सब चकृत भैऊ । शिशु निजनाम आपते कहेऊ ॥ कोइ कहै यह दानौ देवा । कोई कहै यह अलख अभेवा ॥ कोई ईश्वर अंश बतावा । कोइ कह आप देह धरि आवा ॥ पंडित निज निज भौन सिधारा । बिन भोजन बीते बहु बारा ॥ जोलहा तब मनमें दुख पाईं । भोजन करो कबीर गोसाईं ॥ जोलहजोलाही दुखित निहारी । तब हम तिनते बचन उचारी ॥ कोरी यक बछिया ले आवो । कोरा भांडा एक मँगावो ॥ ततछन सो जोलहा चलि जाई । गऊ कि बछिया कोरी ल्याई ॥ कोरा भांडा एक गहाई । भांडा बछिया शीघ्रही आई ॥ दोऊ कबीरके सम्मुख आना । बछिया दिशाहछि निज ताना ॥ बछिया हेठ सो भांडा धरेऊ । ताके थनहि दूधते भरेऊ ॥ दूध हमारे आगे धरही । यहिबिधि खानपान नित करही ॥ तबसे जोलहा डरै बहुत । हमरे घर है अचरज पूता ॥ केते दिन यहि विधि चलिगैऊ । संग बालकन खेलत भैऊ ॥ कथै बालकन प्रति विज्ञाना । सो जड़वत नहिं कछु पहिचाना ॥ तब साधुन सँग गोछि कराही । अगम ज्ञान कथ तिनके पाही ॥

स्वसमवेदबोध

( १३५ )

सुनि साधुन मन अचरज होई । यह तो सिद्ध पुरुष है कोई ॥ सब जोलहा मिलके एक बारा । नीरू ते अस बचन उचारा ॥ बालककी सुन्नत करवावो । तिहि कारन सब साज मँगावो ॥ ताहि काल अस कथा कहाई । नाई सुन्नतको बोलवाई ॥ तब नाई कबीर ढिग आया । ले अस्तुरा निकट नियराया ॥ पांच इंद्री ताको दिखलावो । काटि लेहु जो तोहि मनभावो ॥ यह लखि भभरिके नाई भागा । सुन्नत नहीं कीन डर लागा ॥ पुनि जोलहन अस कौतुककीना । तब बोलाय काजीको लीना ॥ एक गाय तिहि काल मँगाई । काजी ताको जबह कराई ॥ जिहि औसर अस कौतुक ठाना । सत्यकबीर मरम सब जाना ॥ खेलत रहे बालकन माहीं । तेहि छन धायके पहुँचे ताहीं ॥ गऊ घात जब देखत भैऊ । दया धारि काजीते कहेऊ ॥ बहुबिधि काजीको समुझाई । महापाप जिव घात बताई ॥ काजी लज्जित है शिर नायौ । बिनती करै न उत्तर आयौ ॥ तबहि कबीर गऊ ढिग जाई । मरी गाय तिहि काल जिवाई ॥ तब जोलहा गृह तजे कबीरा । अब नहिं रहौं तुमारे तीरा ॥ विकल भये तब नीमा नीरू । नग्र चहुँ दिश बालक हेरू ॥ दूँदत सुत न लहौ नर नारी । रुदन बिलाप करै दोउ भारी ॥ विकल विलोकि दया उर आई । तब कबीर तेहि दियो देखाई ॥ नीरू नीमा बिनती करही । प्रभु हमरे गृह पुनि पग धरही ॥ तब हम तिनते बचन उचारी । ऐसो पाप कीन तुम भारी ॥ तब जोलहा बोलै शिर नाई । नहिं यह पाप मेरी समताई ॥ मिल जोलहन कीनी बरियाई । ताकी खबर न मैं कहु पाई ॥ तापर कृपा बढुरिकै कीना । पुनि ताके गृहमें पग दीना ॥ बाल चरित्र है विविधि विधाना । सो संकेत न होय बखाना ॥

( १३६ )

बोधसागर

चरचा जग अनेक परचारा । कछुकसोलिखौं होय विस्तारा॥ रामानंद गुरु जिमि गहेऊ । वेद मते प्रथमै सो कहेऊ ॥ केते ध्योस जोलहा गृह बासा । अजौं न ता हिय ज्ञान प्रकासा॥ बार बार तेहि नाम हटाई । तिनको नहिं प्रतीत गुरु आई॥ बालक जानि न गुरुपद गहेऊ । ताते परमधाम नहिं लहेऊ ॥ जोलहाकी जब आयु पुराई । मथुरा नग्र देह घर जाई ॥ सकल कथा मैं कीन प्रकाशा । जिमिगुरुकर जोलहा गृहवासा॥ श्वपचके मातु पिता जो रहेऊ । श्रीपाकुलपति नाम सोकहेऊ॥ बहुरि लछमना नरहर सोई । नीमा नीरू सोई होई ॥ तिन दुहुँके तारणके काजा । जोलहा गुरुगृह आनि विराजा॥ गर्भवास कबहुँ नहिं आवै । निज इच्छा नर तन दरसावै ॥ हिंदू मुसलमान नहिं सोई । बाल बृद्ध अरु युवा न होई ॥ दाय़ा करै देह नर धरही । जीव अनंत कोटि ले तरही ॥ जरा मरण कबहुँ नहिं ताही । सदा समान एकरस आही ॥ सो वृतांत अब करो बखाना । जिमि कबीर काशी कथ ज्ञाना॥ षट् दरसन झगरनको आवै । अगम ज्ञान सबको समुझावै ॥ सत्यपथको कीन प्रचारा । हिंसा कर्म निंद निरधारा ॥ तीरथ व्रत अरु मूरति पूजा । जीव हने ईश्वर कथ दूजा ॥ जीवघात करिहै जो कोई । वासा तासु नरकमें होई ॥ पाहन को पूजै पाखंडी । गल काटै जो सम्मुख चंडी ॥ बकरा मुरगा जबह जो करही । विस्मिच्छह कहि धर्म उचरही॥ सो सब पापकर्म बतलाये । हिंदू तुर्क सुनत दुख पाये ॥ वैरभाव दोनों कुल धरहीं । सत्यकबीर टेक नहिं टरहीं ॥ मिलि विप्रन अस युक्ति बनाई । किमि कबीरकी हुरमत जाई ॥ ऐसी गोष्ठि सबन मिलि ठाना । करि प्रपंच अस कीन बहाना॥