भारतकोश
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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

बंकुच्छका वर्णन

बोधसागर

(८५)

सतगुरु वचन

ज्ञानी कहे सुनो जमराई । हमरो हंसा न्यार रहाई ॥ परंपंच तुमरो देखि डराये । जीवघात कबहू नहिं लाये ॥ निशिदिन जीव दया उर धारे । ज्ञान ग्रंथ मन माहिं बिचारे ॥ अहो यमराय जाहु वैकुंठा । राजा विष्णुसों करावहु भेटा ॥

चित्रगुप्त वचन

चित्रगुप्त उठे कर जोरी । साहेब चूक जो बखशो मोरी ॥ तुम हो धनी मैं दास तुम्हारा । अपने दिल हम कीन बिचारा ॥

साखी-इतना कही चलत भये, राजा लीना पास ॥

मध्य चौक ठाडे भये, देख्यो सबको बास ॥

चौपाई

अगिन कौन है इंद्र कुबेरा । दक्षिण दिशा है काल बसेरा ॥ नैऋत कौन सुरनको बासा । पश्चिम देवी कीन निवासा ॥ देव वास वायव है भाई । गण गंधर्व सुनि देव रहाई ॥ उत्तर दिशा भगवान जो होई । निज वैकुंठ कहावैं सोई ॥ कनक भूमि रतननकी पोती । बने वैकुंठ अधिक जग जोती ॥ सकल देव दर्शनको आये । लक्ष्मी सहित बैठे प्रभु राये ॥ राजा साथ हमहूँ चलि गयऊ । देखि विष्णु तब ठाडे भयऊ ॥ डारि सिंहासन बैठक दीना । आज सुफल तुम हमको कीना ॥ भले आय तुम दर्श दिखाये । भूपति लेइ कहाँ तुम लाये ॥

अमरसिंह वचन

ओ भगवान सुनो मम वानी । सेवा तुम्हरी निष्फल जानी ॥ हम एकोत्तर मंदिर बनावा । तामैं मूरति लै पधरावा ॥ साधु राखि मंदिरके मांही । छाजन भोजन दीना ताही ॥ जेता धर्म हम सुने पुराना । विप्रन कहे धरम ठिकाना ॥ सुरभी सोने सींग मढाई । पीतांबर पुनि ताहि ओढाई ॥

(८६)

अमरसिंह बोध

भगवान वचन

यहि विधि गौ एकशत भाई । दइ विप्रनको सुनो प्रभुराई ॥ यहि विधि सेवा कीन तुम्हारी । तहू कर्म तुम हम शिर डारी ॥ सुनु राजा तोहि कहिसमझाऊं । पाप करे कस धरो छिपाऊं ॥ राजालोक कर्म बहु धरहीं । जीव मारिके भक्षण करहीं ॥ तुरी चढ़े बन खेले शिकारा । नाहक मारै जीव बिचारा ॥ मारे जीव तुमहु सुनाई । इतनो पाप कहां धरो छिपाई ॥

साखी-चार खानमें भरमहु, कीनो कर्म अपार ॥

विष्णु कहै राजा सुनो, कैसे होइ उबार ॥

चौपाई

सतगुरु ऐसी जुगति बनाई । लीला करी एक तेहि ठाई ॥ नृप शिर हाथ धरचोतेहिवारी । निकसे कागमुखमांहिअपारी ॥ बहुत काग जरे उद्र मंझारा । बहुतक भये पिंडते न्यारा ॥ लखि भगवान रहे शरमाई । फेर बात ना बोले भाई ॥ ततखन हमहूँ चले रिगाई । पहुँचे मानसरोवर जाई ॥ कामिनि शोभा बहुत अपारा । राजापरचो तब चरण मँझारा ॥ दयावंत भल लोक दिखाई । जुत्थजुत्थकामिनिअधिकाई ॥ करे ध्यान पुरुषको जहयँ । चारभानुकी शोभा जहवाँ ॥ झलके अंगकामिनिके भाई । रैन दिवस तहांजानि न जाई ॥ सिंहासन एकधर्यो तेहि ठाई । चंद्रअंश तहां बैठक पाई ॥ भाव प्रीति साहेब सो कीना । भले ज्ञानी तुम दरशन दीना ॥ बैठे एक सिंहासन दोई । राजा संग इत पुनि सोई ॥ अहो अंश दया अब होई । राजाकूँ ले जाओ सोई ॥ चन्द्रअंश तब शीश नवाई । आतुर हम तब चले रिगाई ॥ ले राजा तब शरीर समाया । भूपति बेगि उठे अकुलाया ॥ तबही राजा शीश नवाई । हमको तारो बेग गुसाई ॥

बोधसागर

(८७)

सतगुरु बचन

राजा सुनो वचन अब मोरा । करो आरती तितुका तोरा ॥ धर्मदास सब तोहि सुनाई । अमरहिंको वैकुण्ठ दिखाई ॥

धर्मदास बचन

धर्मदास तब दोउ कर जोरा । दया करो तुम बंदीछोरा ॥ और कथा मोहि वरनि सुनाओ । दया करो जनि मोहि डुरावो ॥ धर्मदास मैं कहूं समुझाई । जो कह्यु भगति करी सो राई ॥ जेतक जीव मुक्ति पद पाई । सो अब तुमकूँ वरनि सुनाई ॥

अमरसिंह बचन

साखी-राजा शीश नमाइके, बिनति करै कर जोर ॥ हमको सतगुरु तारिये, हम सो अधम न ओर ॥

सतगुरु बचन -चौपाई

सुन हो राय तजो सुरखाई । युग कंकवत हम चल आई ॥ मानसिंह भूपति बड़ राजा । तासो कीना ज्ञान समाजा ॥ तीस लाख अरु सात हजार । इतने हंसलोक पग धारा ॥ युग परवान चौकरी गयऊ । इतने युग मोहि आवत भयऊ ॥ कहैं लेख पूछो राय सुजाना । अपने जीवको करो छुटाना ॥ छन्द-गुरुचरण पद्मपराग पावन मृदुल मंजुल सोहावनी ॥ तरु सम सील परकासते तिमिर मोह नशावनी ॥ करहिं आरती बिसरि जन उरमांहि जे नर लावहीं ॥ भक्ति ज्ञान वैराग्य प्रगटे मोक्षपद तब पावहीं ॥

अमरसिंह बचन

सोरठा-तव चरनन अनुराग, और न दूजी आस ॥ मैं किंकर पद लाग, करहु अनुग्रह दास पर ॥ छन्द-आदि ब्रह्म अर्चित अविगत आदि अदली गाइए ॥ अजर नाम अर्चित अमर अकह अविचल धाइए ॥

(८८)

अमरसिंह बोध

अक्षय नाम आनंदरूपी अखिल सम अस्थिर मही ॥

अधम उधारण अखिलपति अखंडसरूपी हौ सही ॥

सोरठा-हंस उवारण नाम, हंसराज हंसनपति ॥

हंस श्रवण सुखधाम, सारशब्द दातार गुरु ॥

चौपाई

मैं कृमि गुरुभुंगी होय आये । अमी पिलाइके रूप फिराये ॥

मैं हूं लोह कुधात कहाया । गुरु पारस मोहि हेमबनाया ॥

एक मुख महिमा कही न जाई । जो मुख कहूँ पदमसत पाई ॥

जिमि पंछीका जोडा होई । नर नारी जुग बंध है सोई ॥

जिमि मोहि शब्द दीन गुरुराई । तिमि रानीको करिय मुक्ताई ॥

तुम बैदिछोर सबै विधिलायक । हम हैं जीव अकाम अलायक ॥

तेहि ते अरज करौ प्रभु साई । करि दया जिव मुक्ताऊ भाई ॥

तानी बचन

सुनो अमर हम कहे तुम सो । करनी बने करो कछु तुम सो ॥

हम कहे सोइ सुन तुम राई । भक्ति करो अब सुरति लगाई ॥

तन मन धन साहेबको दीना । शिरके साटे भक्ती लीन्हा ॥

रंभा नाम पुरेथंकी नारी । गुरु सेवामें रहे हुशियारी ॥

राजा बचन

तब राजा गुरुसे विनती कीना । अपनाकर मोहि निजकर लीना ॥

अब साहेब परवाना दीजे । जो कछु कहो सोई हम कीजे ॥

कौन वस्तु आनू गुरुदेवा । सो साहेब भाषो मोहि भेवा ॥

जेहि विधि तरन होय भवसागर । शब्द सरूप कहो तुम नागर ॥

साखी-मुक्त लोक जाते मिले जहां पुरुष अस्थान ॥

जरा मरण व्यापे नहीं सदा पुरुषको ध्यान ॥

१ पुरेय शब्द राजा अमरसिंहका सम्बोधन है।

राजाका कबीर साहबकी आज्ञासे चौका आरती करना

बोधसागर

(८९)

ज्ञानी बचन-चौपाई

भलमत बुझे राय ते मोही । निज गत कहूं बचन हट तोही ॥ तब हम दीन सिखापन राजा । जाते होय जीवका काजा ॥

साखी-चौदा कदली खंभ ले, उत्तम ठौर गडाय ॥

मध्य चैंदवा बांधिये, सिंहासन कनक बनाय ॥

चौपाई

गजमुक्ताहल थाल भराई । चन्दन चूनको चौक पुराई ॥ कंचनके पनवारा करहू । कंचन झारी जल भर धरहू ॥ तीन हजार मँगाये पाना । कंद पसेरी सात प्रमाना ॥ सात पसेरी मिष्टान्न मँगाओ । छतिस नारियल संगहि लाओ ॥ डुइसै एकतिस आनु सुपारी । तितनी खारक कहूं संभारी ॥ एतिक लौंग इलायची धारी । मेवा अष्ट लाओ यहि वारी ॥ मिर्च जायफल आनो भाई । द्राख जावत्री बेगि मँगाई ॥ शकर बदाम कपूर बखाना । सात हाथ बस्तर परवाना ॥ कंचनथाल गजमोती भराओ । मध्य आ ती मानिक धराओ ॥ कंचन कलस धरो बहु भांती । तापर बारो पाँचो बाती ॥ फूल चमेली अगर मगाई । परिमल और सुगंध धराई ॥ नाना पुष्प बताये माला । सब कछु आनि धरे ततकाला ॥ तब हम बैठे सिंहासन जाई । सकल समाज शब्द धुनि गाई ॥ अर्चित नामका चौका कीन्हा । ततक्षण थार हाथमें लीन्हा ॥ ठाढे सकल लोग अनुरागा । शब्द विरह सबहिन मिलि पागा ॥ दिवस कोकिला जिमि आनंदा । सकल हंस तिमि आनैंदकंदा ॥ तब हम बैठे थार धराई । अति आधीन परे सब पाई ॥ जब हम नारियल लीन्हा हाथा । सकल जीव तब भये सनाथा ॥ नरियल मोरि अंसगहि लीना । तितुका तोर परवाना दीना ॥ भय छूटे जप निरभे नामा । सतगुरु नाम भए विशरामा ॥

राजारानीका सत्यलोक जाना

(१०)

अमरसिंह बोध

कालजालते हंस छुडाये । राजा रानी भक्ति मन लाये ॥ सारखी-राजा रानी प्रेमसे, और सकल जिव साथ ॥ नाम पान सबहिन दिये, मस्तक धरिके हाथ ॥

चौपाई

कीन्हा दंडवत् सब बहु भांती । राजा रानि पुत्र औ नाती ॥ पुरेथभाणसा लीनो पाना । रंभा नाम पुरेथनी जाना ॥ तबही दिवान खेमसिंह आये । नर नारी परे गुरुके पाये ॥ आये बखशी लीन्हा पाना । भाव भक्ति मनमाहि समाना ॥ नाम रतनचंद्र कहे कर जोरी । दया करो मम बंधन छोरी ॥ आये चौधरी प्रेमचंद नामा । तन मन अरपी कीन्ह प्रनामा ॥ तबहीं शेष शामजा आये । प्रेमभावसे शीश नवाये ॥ और जीव बहु लीन्हा पाना । सबको चित्त गुरुचरण समाना ॥

छन्द-राजा खडा करे विनती प्रभु दीनबंधु दयाल हो ॥ हंस नायक प्रभू लायक शब्द दीन्हा रसाल हो ॥ जेहि खोज ऋषि मुनि नारद ब्रह्मा हरि हर थक रहे ॥ नहि पार पावत शारदा सोह नाम सतगुरु मोहिं दिये ॥

सोरठा-मोहि अनुग्रह कीन्ह, दास जानि दाया करी ॥ भक्तिदान मोहिं दीन्ह, लेह चलो समरापुरी ॥

ज्ञानी बचन-चौपाई

ज्ञानी कहे सुनो हो राऊ । तुमरी अवध सो सबै रहाऊ ॥ एते दिवस रहो भवसागर । पीछे चलो लोक कहैं नागर ॥

राजा रानी बचन

राजा रानि कहे कर जोरी । सतगुरु सुनिये विनती मोरी ॥ कठिन दुःख भवसागर मांही । क्षण भर इमपै रहौ न जाही ॥ इकइस लाख जीव तुव शरना । बहुत बरसमें होइ निज मरना ॥

बोधसागर

(११)

जो तुम सतगुरु हंस सहायक । होहु दयाल हंस सुखदायक ॥ अधम उधारन नाम तुम्हारा । अवगुन मोर न करहु विचारा ॥

ज्ञानी वचन

ज्ञानी वचन कहे गोहराई । राजा सकल हंसा बुलवाई ॥ सकल हंस सतगुरु संग लागा । इकइस लाख हंस तन त्यागा ॥ पावत पान गये एक ठारा । पहुँचे जाय पुरुष दरबारा ॥ भाव भक्ति भल कीन्ह बनाई । सर्वस अरपि चग्नामृत पाई ॥ काल जालको चिह्न जो पावे । सार शब्दमें सुरति लगावे ॥ मन निरंजन तेज ओंकारा । ये सब चीन्हे काल पसारा ॥ नाभि कमलते सुरति लगावे । मकरतार चढ़ि शब्द समावे ॥ पुरुष दरश पावे जब हंसा । जनम मरणको मेटै संसा ॥ षोडश भानु हंस तेहि रूपा । समझ न परे रंक औ भूपा ॥ एक बरन राजा औ रानी । ताकी भेद सब जाने जानी ॥ पुरुष सज्या हंस तहाँ आये । अमृत भोजन करत अघाये ॥ काया अमर अमरवर पाई । दुःख और द्वंद सबै मिट जाई ॥ एही विधि सकल जीव तहाँ आवा । सबही हंस एक नाम समावा ॥

सोरठा-कहा जीव करनी करे, कहा चलेगा चाल ॥

सतगुरु नाम प्रतापते, कबहुँ न खावे काल ॥

कहन सुननकी है नहीं, देखा देखी नाय ॥

सार सबद जो चिन्ही, सोइ मिलेगा आय ॥

चौपाई

पुरुष हुकुमसे जीव बुलाये । राजा रानी हंस तहाँ आये ॥

हंसन कह तब वचन सुनाये । भाग बडे तुव दर्शन पाये ॥

पुरुष वचन

अहो जीव कस कीन्ह कमाई । हंस सज्जन मोहि कहो सुनाई ॥

(९२)

अमरसिंह बोध

राजा रानी वचन

माथ नवाय कह राजा रानी । बार बार विनती बहु ठानी ॥ करनी चाल हम नहि जाना । परे ते कूपमें अति अज्ञाना ॥ आय जगाये अंध अचेता । सतगुरु शब्दते बांधे हेता ॥ पुरुष हुकुमते ज्ञानी चलि आये । कहो जीव कस करहि कमाये ॥ ज्ञानी वचन कहैं परमाना । इन सम हंस और नहि आना ॥ इनकी डोरी जीव सब आवा । पुरुष सुनी यह आनंद पावा ॥ अंक मिलाई हंस तब लीना । अरध सिंहासन बैठक दीना ॥ सेत छत्र शिर दीन्ह तनाई । सूरज कोटि छबि राजा पाइ ॥ यहिविधि राजा लोक सिधाये । सुनत बोध धर्मनि मन भाये ॥ एक वचनको संशय आई । सो मोहि नाथ कहौं समुझाई ॥ षोडश रवि सब हंस सराई । कैसे रायको दइ अधिकार्ई ॥

कबीर वचन

धर्मदास तोहैं कहि समुझाऊँ । तुमरे मनको धोख मिटाऊँ ॥ राज गुमान उन दिये विसारा । और जीवकी मुक्ति सुधारी ॥ पुरुष रायको पूछ न कीना । निज करनी कर नाम न लीना ॥ अपने मन तजि मान बढाई । ताते पुरुष दया उर आई ॥ धर्मदास सुनो चित लाई । यहिते राजा बढती पाई ॥

धर्मदास वचन

धर्मदास कहे युग कर जोरी । दया करी तुम बंदीछोरी ॥ दीनदयाल दयाके सागर । अच्छी कथा सुनाये आगर ॥ साखी-धर्मदास आधीन होइ, विनती करै कर जोर ॥ कथा कही अमरसिंहकी, संशय मिटायो मोर ॥

इति श्रीबोधसागरे कबीरधर्मदाससंवादे राजा अमरसिंहबोध कथा वर्णनो नाम द्वितीयस्तरंगः ॥ श्री अमरसिंहबोधः समाप्तः

श्री-बीरसिंहबोध

भारतपथिक कवीरपंथी-

स्वामी श्रीयुगलानन्द ( विहारी ) द्वारा संशोधित

हेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई

1947-1948

1947-1948

1947-1948

1947-1948

1947-1948

1947-1948

सत्यनाम

श्री कबीर साहिब

शिवलिंग

A faint, stylized illustration of a seated figure, likely Lord Shiva, wearing a crown and holding a trident (trishula). The figure is surrounded by a decorative border.

शिवलिंग

अथ बोधसागर

तृतीयस्तरंगः

बीरसिंहबोध

धर्मदास वचन-चोपाई

धर्मदास पूछे चित लायी । साहब मोहि कहो समझायी ॥ बीरसिंहराय किमि कीनी सेवा । करिके दया कहो गुरुदेवा ॥ बीरसिंहदेव बडा अभिमानी । कैसे साहिब सेवा ठानी ॥ सो वृत्तान्त कहो मोहि स्वामी । दया करि कहिये बहु नामी ॥

कबीर वचन

धर्मदास भल पूछहु बाता । तुमसे बरनि कहूँ विरुयाता ॥ तन मन धन अरु मोहन लावे । जो जिव हमरे संग सिधावे ॥ आदि अन्त सुरति हम कीना । तबही पग धरतीपर दीना ॥ और दिशा देख्यो हम जायी । पूरब पश्चिम दृष्टि फैलायी ॥ बीरसिंह देव काशीकर राऊ । हम पहुँचि तहाँ कीन गोहराऊ ॥ प्रथमहिं चले भक्तपर गयऊ । सकल संत जहाँ भक्ति करयऊ ॥ नामदेव भक्ति करन मन लावा । सेना धनाजाट तहाँ आवा ॥ राँका बाँक सदन कसाई । पद्मावती दीपक ले आई ॥ चौहटे तान चँदेवा दीना । ठाडे भक्त सब गायन लीना ॥ नामदेव लोटन करे भाई । हाथ ताल रेदास बजाई ॥

नं. ४ कबीरसागर - ४

कबीर साहबका काशीमें जाना और भक्तोंके साथ वार्तालाप करना

(९८)

बीरसिंह बोध

धना मृदंग पट्ट उजियारा । जुरे भक्त सब संत अपारा ॥ धर्मदास तहँवा हम गयऊ । राम राम सबही मिलि कियऊ ॥ तब हम वचन एक कहि लीना । सकल भक्तके हिये मन दीना ॥ नामदेव केहि पुरुषहि ध्याओ । भक्त करतका कर्म तुम लाओ ॥

नामदेव वचन

नामदेव कहे सन्त भुलाओ । दोसर पुरुष कौन ठहराओ ॥ हरि हर ब्रह्म हैं बड देवा । तिनकी करै सकल जग सेवा ॥ वे जगकर्ता सब कछु अहहीं । वेद शास्त्र सब तिनकहँ कहहीं ॥ है प्रभु आदि मध्य अरु अंता । शीश सुडाय जपो केहि संता ॥

कबीर वचन

हरि ब्रह्मा शिव शक्ति उपायी । इनकी उत्पन्न कहहुँ बुझायी ॥ विना भेद सब फूले ज्ञानी । ताते काल बांधि जिव तानी ॥ अजर अमर है देश सुहेला । सो वे कहहिं पंथ हुहेला ॥ ताका मरम भक्त नहि जाना । किरतम कर्तासे मन माना ॥ हम तो अगम देशसे आये । सत्यनाम सौदा हम लाये ॥

साखी-किरतम रस रंग भेदिया, वह तो पुरुष न्यार ॥ तीन लोकके बाहिरें, पुरुष सो रहत निनार ॥

चौपाई

बीरसिंहदेव बचेला राजा । बैठे आय महलके छाजा ॥ राजा नजर सबन पर कीना । सबकी भाव भक्ति चित दीना ॥ गावै भक्त आनन्द व्यवहारा । एक भक्त बेटा सो न्यारा ॥ टोपी एक अनूपम दीने । माथा तिलक कूबरी लीने ॥ स्वेत स्वरूप भगतकी काया । महा आनन्द पुरुष छबि छाया ॥

राजाबीरसिंह वचन

छरीदार राजा हँकरायी । नामदेवको आजु बुलायी ॥

कबीर साहबका वेष स्वरूप देखकर वीरसिंहका कबीर साहबके पास आना

बोधसागर

(११)

छड़ीदार वचन

बेगहिं छड़ीदार चलि आये । नामदेव राजा बुलवाये ॥

नामदेव वचन

नामदेव पूछे चित लायी । राव संग को और रहायी ॥ छड़ीदार तब वचन सुनावा । कोउ नहिं साथ रायके भावा ॥ नामदेव छड़ी हाथमें लयऊ । चले चले राजापहैं गयऊ ॥ राजा देखि ठाढ उठि भयऊ । कर गहिके आसन बैठयऊ ॥

राजा वचन

राजा कहै सुनौ हो देवा । कहौ कौनकी करत हो सेवा ॥

नामदेव वचन

सांखी-भक्ति करौं गोविंदकी, एक चित ध्यान लगाय ॥

राजावीरसिंह वचन

श्वेत रूप जो भक्त है, सो कस न्यार रहाय ॥

नामदेव वचन

राजा सुनो वचन यक मोरा । हम तुम हरि हर ब्रह्मा दोरा ॥ ताकर भक्ति करे वह हांसी । कहै पुरुष यक और अविनासी ॥ माला मेखली श्याम शरीरा । मिली जुलाहा सत्य कबीरा ॥ किरतन कहे सकल सब देवा । कहे साँछु देख नहिं सेवा ॥ मूर्ति कूटि पाथर का लाई । कारीगर छाती दे पाई ॥ काँसा ताँबा मूर्ति बनावा । तामें कैसे ब्रह्म समावा ॥ ऐसे कहे कबीर जुलाहा । झूठे देवन हमैं मनाहा ॥ वह तो कहे हम पुरुष अभेवा । नहिं कोइ जाने हमरो भेवा ॥ आप अपनपौ बहु विधि थापै । आपै देव सेवक पुनि आपै ॥ भक्ति ज्ञान योग को भेवा । तीरथ व्रत तप अरु सब देवा ॥ सबको काल जाल बतलावे । एकोको नहिं मनमें लावे ॥ हम सन बहु विधि वाद विवादा । नहि माने वह अनहद नादा ॥

राजा वीरसिंह और कबीर साहबकी वार्तालाप

(१००)

बोरसिंह बोध

साखी-जोलहा निंदत सबनको, बन्दत काहू नाहिं ॥ झूठ कहत हरि ब्रह्महीं, कहे निर्गुण एकै आहिं ॥

राजाबीरसिंह वचन

राजा नामदेव कह बानी । अगम ज्ञान वह करत बखानी ॥

नामदेव वचन

कह नामदेव सुनो हो राजा । बहु विधि कहै शब्द को साजा ॥ जो को निर्गुण नामहिं धावै । योनी संकट बहुरि न आवै ॥ राजा छरीदार पठवाई । जाय कबीरहिं आनु बुलाई ॥

राजाबीरसिंह वचन

परम खुशी हमरे मन आवै । जो कोइ निर्गुण नाम सुनावै ॥ अस्तुति वेद करत है जाको । पार न पावत हरि हर ताको ॥ अहिंपति अस्तुति करै जो ताही । कोउ विधि पार न पावत जाही ॥ तेहिकर भजन करै जो कोई । तब विधिसे पूरा है सोई ॥ नाम देव सुनु संत सुजाना । वह निन्दक नहि संत प्रमाना ॥ छडीदार भेजि तुरत बुलवाऊँ । निर्गुण भेद अबहि खुलवाऊँ ॥ रूप संत हृदय मम भावै । शांत रूप वह भजन प्रभावै ॥ देखो अबहीं आवत सोई । सब कहिहै तेहि भावत जोई ॥ छडीदार तुरते चलि आयऊँ । जहंवा हम वहाँ बैठे रहेऊँ ॥

छडीदार वचन

छडीदार तब विन्ती लावा । अहो कबीर तोहि राय बुलावा ॥ विन्ती राय कीन कर जोरी । लावा कबीर वेगि तैं दोरी ॥

कबीर वचन

कहे कबीर वचन अरथाई । केहि कारण मोहि राय बुलाई ॥ ना हम पण्डित ना परधाना । ना ठाकुर चाकर तेहि जाना ॥ ना हम विराना देश बसावैं । ना हम नाटक चेटक लावैं ॥

बोधसागर

(१०१)

पैसा दमरी नाहिं हमारे । केहि कारणे मोहि राय हंकारे ॥ गरज होय तो यहाँ चलि आवै । हम तो बैठे भजन करावै ॥

साखी—छडीदार तुम जायके, कहो रायके पास ॥ महा प्रचण्ड बघेल है, हम नहिं मानत त्रास ॥

चौपाई

छडीदार अति कोधित भयऊ । तुरतहिं चलि रायपहँ गयऊ ॥

छडीदार वचन

छडीदार कहै कर जोरी । महाराज एक विनती मोरी ॥ भक्त न आवै मोर हँकारे । कुछ भयभीरन राखु तुम्हारे ॥ कहैं हमारे कौन है काजा । तृणहि समान गिनत हौं राजा ॥ एता वचन राय सुनि लीन्हा । अगम बात कछु घटमो चीन्हा ॥ वह तो परमपुरुष है सोई । और होय तो आवै कोई ॥ सत्य भाव जाके उर आवे । मान बढाई लोभ सब जावे ॥ निर्गुण भक्ति जोई लवलीना । ताहि न उपजे भाव मलीना ॥ आशा तृष्णा जेहि घट व्यापै । धनवन्ता सो चाह मिलापै ॥ यहतो संत अविकल अविकारी । केहि कारण आवै केहु दुआरी ॥ शोचत राजा मनमें गूने । नामदेव मन रहे अलूने ॥ मान बढाई जो नर पागे । करत खुशामद नृपती आगे ॥ साखी—नामदेव राजा कहे, जुलहा यहाँ न आव ॥ है अभिमानी बहुत सो, बहु अहँकार जनाव ॥

चौपाई

कीन विवेक राय दिल माहीं । नहिं आये कवीर हम जाहीं ॥ वह तो सत्य भक्ति चित दीन्हा । कारण कौन त्रास मम कीन्हा ॥ यहि विधि कीन विवेक विचारा । तबहीं राजा आप सिधारा ॥

१ नामदेवजीने राजाके विचारका भाव नहीं समझा ॥

(१०२)

बीरसिंह बोध

हुकम पाय आय असवारा । गज औ तुरंग सु साज सँवारा ॥ आवत देखा जब हम भाई । तब हम लीला एक बनाई ॥ आसन अधर कीन तेहि वारा । सवा हाथ धरतीसे न्यारा ॥ माला तिलक औ टोप विराजै । हाथ स्वेत कुवरी सो छाजै ॥ नृपति देखि अचरज मन कीन्हा । यह तो पुरुष अगम कछु चीन्हा ॥ कीन अवलोकन जग हम सबहीं । ऐसे पुरुष न देखे कबहीं ॥ धन्य धन्य अस्तुति सब गावैं । धन्य कवीर चरण सब ध्यावैं ॥ राजा चरण पकड़ि दोउ भाई । धन्य धन्य नृप करई बडाई ॥ कहे राय धन भाग हमारा । दर्शन दीन्ह आय करतारा ॥

राजा बीरसिंह वचन

छन्द-अस्तुति करत नृपति भाषेउ तुम ब्रह्म निर्गुण आप हो ॥ अनाथ नाथ सनाथ करि दिये माथ हाथ अनाथ हो ॥ अपनो दास करि जानि साहब दरश दीनेउ आयकै ॥ कीजै कृपा यहि दासपै चलि भवन दरस दिखायकै ॥ सोरठा-कृपा कीन जस मोहिं, तस मन्दिर पग दीजिये ॥ विनय करौं प्रभु तोहिं, वेगि विलम्ब न कीजिये ॥

कवीर वचन-चोपाई

कहैं कवीर तहाँ नहिं काजा । तुम परचण्ड बघेला राजा ॥ काम क्रोध मद लोभ बडाई । रोम रोम अभिमान समाई ॥ तुरी सवा लक्ष सँग तोरे । लक्ष सवा दो प्यादा दोरे ॥ हस्ती चलत सहस तव संगा । निश्चिदिन भूले कामिनि रंगा ॥ कंचन कलसा महल अटारी । कैसे शब्द गहै नर नारी ॥ हम भिक्षुक जाने संसारा । कौन काज है तहाँ हमारा ॥

राजा बीरसिंह वचन

तुम सतगुरु हो दीन दयाला । करमवश्य हम अहैं विहाला ॥ माया तिमिर नैन पट लागी । दर्शन पाय भये अनुरागी ॥

राजाका रानीसे कबीर साहबको गुरु बनानेकी बात चलाना और रानीका राजाको नीति समझाना

बोधसागर

(१०३)

करो दया अपनो करि लीजै । दास जानि आयसु प्रभु दीजै ॥ दीन जानि मन्दिर पगु धारो । भक्तराज तुम वेगि पधारो ॥ हम हैं पापी अधम अजाना । तव विनु कृपा काल धरि ताना ॥ देह उपदेश प्रभु मोहि बचावो । पाप जालते वेगि छुडाओ ॥ तुमरी कृपा सुनहु हो साहब । अंस विश्वास भवहितरि जायब ॥ अब जनि लावहु बार गुसाई । चलहु कृपा करि हंसन राई ॥

साखी-भक्तराज दाता अहो, कीजै मोह सनाथ ॥

मैं आधीन शरण तुव, चलो हमारे साथ ॥

चोपाई

बहुत अधीन तेहि जब देखा । चलन विचार कीन तब लेखा ॥ ततक्षण राजा हस्ति मँगावा । लै हमहीं तब हस्ती बैठावा ॥ गजते आसन अधरहिं धारा । चले राय तब बजे नगारा ॥ जबै राय मन्दिर लै गयऊ । तबै रानि कहैं तुरत बोलेऊ ॥ मानिक देहरानी चलि आयी । तासे राजा बात सुनाई ॥

राजा बीरसिंह वचन

हम रानी गुरु कीन कबीरा । आदि ब्रह्म हैं मतिके धीरा ॥ चरण धोय चरणाभूत लीजै । सतगुरु दया करम सब छीजै ॥ तब सो रानी कहैं सुनु बाता । ओढे चीर सुभग निज गाता ॥

रानी मानिकदेवी वचन

राजा विन्ती सुनो हमारा । समुझि बूझि गुरु करो भुवारा ॥ तुम राजा हौ बहुतै ज्ञानी । विनय हमार लेहु सुनि मानी ॥

राजा बीरसिंह वचन

इतना सुनत राय मुसुकाये । रानी ज्ञान कौन बहुराये ॥ तुम हौ नारि भक्ति कहैं मानौ । साहबकी गति नहिं तुम जानौ ॥ कर्ता आप देह धरि लीना । भक्तरूप होय दर्शन दीना ॥

नामदेव आदि भक्तोंका कबीर साहबसे ईर्षा करना और उनका समाधान

(१०४)

बीरसिंह बोध

हम अरु राय बैठे जेवनारा । आनि सो वार घरे दोय थारा ॥ कंचन थारी झारी पानी । कंचनवटुकी व्यंजन आनी ॥ अधरसु थार भुईं ते न्यारा । महाप्रसाद राय चित धारा ॥ पाय प्रसाद राय जब लीन्हा । हम अरु राय बाहर पगु दीन्हा ॥ एकहि आसन बैठे दोई । नामदेव तब ठाढे होई ॥ नामदेव कह आसन दीन्हा । बहु सन्मान ताहिकर कीना ॥ नामदेव बैठे जब जायी । प्रश्न करन तिन चित तब लाई ॥

नामदेव वचन

कहहु कवीर मोहि समुझाई । कहैं तव गुरु शब्द कित पायी ॥ साहिब कौन सबनके पारा । मोसे कहहु वचन विचारा ॥ साहिब कौन जाहि तुम ध्याओ । कहैवा सुक्ति सुरति कित लाओ ॥ कौन भाँति यमसे जिव बाँचे । भिन्न भिन्न कहहु मोहि साँचे ॥ आप न समझो बोधो राजा । राम विना होय जीव अकाजा ॥ केतो पढे गुने अरु गावै । विनु हरि भक्ति पार नहीं पावै ॥

कवीर वचन

नामदेव भूले तुम जैसे । हमको मति जानहु तुम तैसे ॥ निर्गुण पुरुष आहि यक आना । अस्तुति ताकर वेद बखाना ॥ शिव ब्रह्मा नहि पावत पारा । और जीव है कौन विचारा ॥ छन्द-नित्य निगम अस्तुति अराघै हारि थके विरंच महेश हो ॥ सबै ऋषिदेव अस्तुति अराधई तेहि गावत सुरपति शेष हो ॥ जेहि गावत नारद शारदादि पार कोई ना लहे ॥ सो भेद सतगुरु गावही कोइ संत ज्ञानी चित गहे ॥ सोरठा-पूजहि हरि हर देव, जड मूर्ति पूजत बहै ॥ निशिदिन लावत सेव, जो रक्षक भक्षक अहै ॥ नामदेव तब सुनत लजाने । नहीं पाये भेद मनहिं पछताने ॥ सुनि लजायके उठि सो गयऊ । राजा तबहिं कहत अस भयऊ ॥