भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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(१०)

अमरसिंह बोध

कालजालते हंस छुडाये । राजा रानी भक्ति मन लाये ॥ सारखी-राजा रानी प्रेमसे, और सकल जिव साथ ॥ नाम पान सबहिन दिये, मस्तक धरिके हाथ ॥

चौपाई

कीन्हा दंडवत् सब बहु भांती । राजा रानि पुत्र औ नाती ॥ पुरेथभाणसा लीनो पाना । रंभा नाम पुरेथनी जाना ॥ तबही दिवान खेमसिंह आये । नर नारी परे गुरुके पाये ॥ आये बखशी लीन्हा पाना । भाव भक्ति मनमाहि समाना ॥ नाम रतनचंद्र कहे कर जोरी । दया करो मम बंधन छोरी ॥ आये चौधरी प्रेमचंद नामा । तन मन अरपी कीन्ह प्रनामा ॥ तबहीं शेष शामजा आये । प्रेमभावसे शीश नवाये ॥ और जीव बहु लीन्हा पाना । सबको चित्त गुरुचरण समाना ॥

छन्द-राजा खडा करे विनती प्रभु दीनबंधु दयाल हो ॥ हंस नायक प्रभू लायक शब्द दीन्हा रसाल हो ॥ जेहि खोज ऋषि मुनि नारद ब्रह्मा हरि हर थक रहे ॥ नहि पार पावत शारदा सोह नाम सतगुरु मोहिं दिये ॥

सोरठा-मोहि अनुग्रह कीन्ह, दास जानि दाया करी ॥ भक्तिदान मोहिं दीन्ह, लेह चलो समरापुरी ॥

ज्ञानी बचन-चौपाई

ज्ञानी कहे सुनो हो राऊ । तुमरी अवध सो सबै रहाऊ ॥ एते दिवस रहो भवसागर । पीछे चलो लोक कहैं नागर ॥

राजा रानी बचन

राजा रानि कहे कर जोरी । सतगुरु सुनिये विनती मोरी ॥ कठिन दुःख भवसागर मांही । क्षण भर इमपै रहौ न जाही ॥ इकइस लाख जीव तुव शरना । बहुत बरसमें होइ निज मरना ॥