कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
जगन्नाथके मन्दिरकी स्थापना
( ६८ )
ज्ञानसागर
पाँच तत्त्व तीन गुण साना । त्रिगुण रूप कीन्ह उत्पाना ॥ रूप मनुष्य सुदेह सम्हारा । नहिं लेई अहार व्यवहारा ॥ जो कोइ ये विधि करै उछेदा । सो तो है करता को भेदा ॥ करता देह तबै निरमावा । तामहिं तत्त्व प्रकृतिहि स्वभावा ॥ आयो निरगुण काछ शरीरा । आवा गमनकी भेटन पीरा ॥
जगन्नाथके मंदिरकी स्थापना
प्रथमहि आयो सागर तीरा । जगन्नाथ जहाँ काछ शरीरा ॥ जाते परम वचन मैं हारा । बाजी मांड किया प्रति पारा ॥ आसन बेल तीर मैं लीन्हा । सो स्वरूप काहू नहिं चीन्हा ॥ आया राम विप्रके रूपा । तासों कथि कह्यो अंजगूता ॥
साहित्य कबीर वचन
साखी-वाचा वंघ मैं आइया, मंडप उठि है तोर ॥ मान त्रास सिंधू जवे, दर्शन देखौ मोर ॥
चौपाई
तो कहैं थापौ वचन प्रवाना । तीन लोक तुम करत बखाना ॥ तो परसै को कहा अधिकारा । सोई कहौ तुम बौद्ध विचारा ॥
बौद्ध वचन
मन वच क्रम परसै जो मोई । कोटि जन्म लगि विप्र सोहोई ॥ औ पुनि विद्या औ धनवंता । यहि मुनकै जो भयो हरषंता ॥
साहित्य कबीर वचन
आवा गवन निरवारन आयो । सत् शब्द ते जीव छुड़ायो ॥ जो बहु जन्म थाकौ तुहि पाहीं । कैसे जीव लोक तब जाहीं ॥ बिना नाम नहिं जीव उबारा । कहि अब भाखौं कलु उपचारा ॥ मारकंठे तर जाइ नहाई । अस हँस बोले त्रिभुवन राई ॥
ज्ञानसागर
( ६९ )
अक्षैबट कृष्णरोहिणी अस्नाना । इन्द्र दमन समुद्र अस्थाना ॥ यहि विधि तीर्थकरे मन जानी । पुनर्जन्म ना होवे प्रानी ॥
सार्वी-हँसे कृष्ण छल मता कहि, जिमि माहुरको मीठ ॥
अस पुरुषोत्तम क्षेत्र फल, ज्ञानवन्त कहैं दीठ ॥
चौपाई
समाधान हरिको जब कीन्हहा । आसन उदधि तीर में लीन्हहा ॥
चौरा कीन्ह तहाँ पुन जाई । इन्द्र दमन तब आज्ञा पाई ॥
जबहीं मंडप काम लगावा । सागर उमँग खसावन आवा ॥
उठावहु मंडप करि निःशंका । उदधि त्रासकी मेटव शंका ॥
आयो क्रोध लहर जब पानी । मेटचो पुरुषोत्तम सहिदानी ॥
लहर उमंगी सागर तीरा । आय जहां तहैं सत्त कबीरा ॥
देखत दरस महा भय मानी । बोल्यो वचन जोर युग पानी ॥
हे स्वामी तुव मर्म न जाना । जगन्नाथ वर किया पयाना ॥
क्षमौ अपराध मोर प्रभुराया । लेउ बैर अस कीजै दाया ॥
तासों पुनि अस वचन उचारा । बोर द्वारिका बैर तुम्हारा ॥
सार्वी-राम रूप सागर बँध्यो, तातैं उदधि उमंग ॥
बोरौ नगर द्वारका, भयो रुचिर परसंग ॥
चौपाई
तब तैं उजर द्वारका भयऊ । पंडनको तब स्वप्ना दयऊ ॥
आये मोपर साहिब कबीरा । आवा गमनकी मेटन पीरा ॥
ऐसा स्वप्न पंडन दीन्हहा । तीर्थ स्नान तेहि सब कीन्हहा ॥
उठचो जो मंडप बाज बधावा । कनक उरे नहिं हाथ बनावा ॥
एक दिना कौतुक अस भयऊ । सागर तीर पंडा चलि गयऊ ॥
करि असनानचलो मंडप पासा । मनमें ऐसा वचन प्रकासा ॥
प्रथमहिं चौरा म्लेछ को गयऊ । ठाकुरके नहिं दर्शन कियऊ ॥
( ७० )
ज्ञानसागर
तेहिके मन पाखंड जब देखा । किय कौतुक सो कहौं विशेषा॥ जहँ लग मंडप पूजहि बीरा । तहँ लग देखहि रूप कबीरा ॥ गयो जहां कठ मूरत आहीं । कबीरको रूप भयो तेहि पाहीं॥ अच्छत पुहुप लैविप्रमन भूला । नहिं ठाकुर जो पूजहु फूला ॥
साखी-तब पंडा सिर नायो, प्रभु चरित्र अवगाह ॥ कोध छोड़िये स्वामी, कृपा करो मोहि पांह ॥
चौपाई
अपने मन आन्यो प्रभु हीना । तातैं प्रभु तुम कौतुक कीन्हा ॥ तासौं वचन मैं बोलये लीन्हा । सो पंडा पुनि कही जो कीन्हा॥ सुनहु विप्र तुम्हे आयसु होई । दुबिधा भाव करौ मत कोई ॥ ब्राह्मण छाड़हु जात अजाती । ताते मेटब सबकी फांसी ॥ भोजन माहि भर्म जो करहीं । ताकी अज्ञ हीन अनुसरहीं ॥ तब पडा विन्ता अस ठाना । हे स्वामी मैं तोहि न जाना ॥ करौं सोई जो आज्ञा दीजे । कछु जांचोंसोप्रदानमुहिकीजे॥ जो मन इच्छा होय तुम्हारी । देउ सोइ अस वचन उचारी ॥
साखी-सागर नीर बड़ खारा, सो तो असो न जाय ॥ निर्मल जल मैं मांगौं, सो दीजै प्रभुराय ॥
जहँ चौरा है सागर तीरा । खनहु कूप होय निर्मल नीरा ॥ तहां खनायो आय तब कीन्हा । जल मँगाय पंडन कहैं दीन्हा ॥ कूप बनायो सागर तीरा । तहां भयो पुनि निर्मल नीरा ॥ यह तो भेद जाने सोई संता । कबीर सागर बूझे मतवंता ॥ हरी भेद मैं सागर आयो । तेही सकल चरित्र सुनायो ॥ भुंगी को कीन्ही मैं दाय। ताको एक जो भेद बताया ॥ ताकी दियो मता कडहारी । जीव भेद सों लेत उबारी ॥
चन्दवारमें कबीरसाहबका जाना
ज्ञानसागर
( ७१ )
पठवै जीव नाम दे जहँवा । सुक्ति पदारथ फल है तहँवा ॥ चार भातु कामिन उजियारी । मान सरोवर है वह नारी ॥
धर्मदान वचन
धर्मदास कहै अस बानी । स्वामी कहू संत उत्पानी ॥ हंस रूप जो षोडश भाना । कामिनि चार भातु परवाना ॥
साखी-कारण कौन है कामिनि, चार भातु कह्यु थोर ॥
शब्द गहे सब हँसा, संशय भई जब मोर ॥
माहिर कबीर वचन-चोपाई
सुन धर्मनि मैं तोहि बताऊँ । यह सब भेद मैं तोहि बुझाऊँ ॥ चौरासी लक्ष जोइन ठाना । सुक्ति छेत्र नरको उत्पाना ॥ तातैं प्रभु प्रगटे नर भाऊ । ताते शोभा हंस बहु पाऊ ॥ आय अदेह पुरुष रह जहँवा । नर को रूप प्रगट भये तहँवा ॥ जेहि सुक्ति चंदा निर्माई । हंस प्यार सुक्ति अधिकाई ॥ भुंगी कीट शिष्य जो होई । पावै भेद मग्न होय मोई ॥ सिंधु मध्य राह तिन केरा । आवै जीव ताहि सों फेरा ॥ वहै राह भुंग राज कहैं दीन्हा । यही भेद विरले जन चीन्हा ॥ पाहै भेद सन्त जन सोई । आन्यो सतगुरु जेहि गम होई ॥ निज बीरा जो चौरा पावै । इकोतर सौ जीव लोक सिधवै ॥
साखी-यही चरित्र करि आयो, चौरा के व्यवहार ॥
निज बीरा जो पावै, तव जीव होय उवार ॥
चन्दवारैमें प्राकटचकी कथा
चोपाई
आसन कर आयो चंदवारा । चंदन शाह तहाँ पगु धारा ॥ बल रूप धर आयो तहँवा । आठै पहर रहचो मैं जहँवा ॥
नूरीको मिलनेकी कथा
( ७२ )
ज्ञानसागर
ताकी नारि गई अस्नाना । रूप देखि ताकर मन माना ॥ ले गये बालक सो निज गेहा । बहुत भांति तिन कीन्ह सनेहा ॥ चंदन साडु देखि रिसियाना । चल गयो नारि तोर अब ज्ञाना ॥ बेग डार बालक को आजू । सुने लोग तो होय अकाजू ॥ जाति कुटुम्ब सुने जो कोई । यह तो भली बात नहिं होई ॥ चेरी हाथ तिन दीन्ह पठाई । उद्यान मास तिन दीन्ह अडाई ॥
नूरीको मिलनेकी कथा
काशीमें प्राकट्य
कछु दिन काया धर दुख पावा । यहि अंतर इक जुलहा आवा ॥ नूरि नाम जो वा संग नारी । देखत बालक भई सुखारी ॥ बालक देख नारि मन भूला । रविके उदय कमल जस फूला ॥
सारखी-अति सनेह जिन कीन्हा, नूरी देख रिसान ॥
बालक लीन्हो नारि अब, कहा भयो अज्ञान ॥
बालक वचन-चौपाई
बालक दीन्ह मही मई डारी । अस सुनि बालक दीन्ह हुँकारी ॥ बूझो काल फांस नर नारी । पूर्व जन्म तेहि लीन्ह उबारी ॥ पाछिलि प्रीति भयी अब मोही । तातैं दरश भयो अब तोही ॥
नूरी वचन
तुम जानो अब मैं नहिं जाना । सो अब मोहि सुनाओ काना ॥
नूरीके पूर्वजन्मकी कथा
कबीर वचन
पूर्व जन्म तैं ब्राह्मण दूखी । तोरे गृह कबहु नहिं सूखी ॥ श्वपच भक्त मम प्राणन प्यारा । ताको मान पिता अवतारा ॥ श्वपच भक्ति करै पुनि जबही । मात पिता पर लगै तबही ॥
ज्ञानसागर
( ७३ )
ताकी प्रीति भक्त मन धारा । तातैं भयो विप्र अवतारा ॥ प्रथम प्रीति मोरे मन भावा । तोरे गृह मैं यहि विधि आवा ॥ तोसों कहीं इक भक्ति हटाई । राखौ मर्म हमार छिपाई ॥ देव सुवर्ण नित्य मैं तोही । एक सुहर पुनि ताकी होई ॥
साखी-बोलो नहिं यहि कारणे, ताहि सुक्ति नहिं भाव ॥
माया देख सुलानो, यहि कारण तब पाव ॥
चोपाई
घर नहिं रहो पुरुष औ नारी । मैं शिवसों अस वचन उचारी ॥ आनि देव लक्ष्मी संसारा । आपन को निज भीख अहारा ॥ आन की बार बदत हौ योगू । आपन नार करत हौ भोगू ॥ काशी मरे जन्म नहिं होई । तुव महिमा वगैँ सब कोई ॥ औ पुन तुम सब जग ठग राखा । काशी मरे अजल तुम भाखा ॥ जब शंकर होवे तुव काला । कहाँ रहे तब भक्त विचारा ॥ जीवन करत जो होय अकाजा । या शंकर तब तुम कहैं लाजा ॥ सुनि शंकर तब चलयो लजाई । यहि अन्तर जुलहिनि चलिआई ॥ हे स्वामी मम भिक्षा लीजै । सब अपराध क्षमा प्रभु कीजै ॥ एक पुत्र जो विधि मोहि दीन्हा । कबहुँ बात कहै नहिं लीन्हा ॥
शंकर वचन
तोरें गृह पंडित अधिकारी । झूठ बोल कस बोलहु नारी ॥ हरि कमला सम देखो ज्ञाना । बुद्धिवंत तुम पुत्र सुजाना ॥ साखी-सुनकर महिमा पुत्रकी, नारि धरे तब पांव ॥ हे स्वामी मम इच्छा, श्रवणन वचन सुनाव ॥
चोपाई
कहा लजान कहा फिर आवा । बिहँसि कहा तुम सिद्ध कहावा ॥ सुनिकै वहै दर्प बहु कीन्हा । भिक्षा कनक जाति को दीन्हा ॥
( ७४ )
ज्ञानसागर
भिक्षा दै प्रसुदित चलि आई । हस्तामल को खोज न पाई ॥ वाचा बन्ध तहाँ पुनि आयो । काल कष्ट मैं तोर मिटायो ॥ सुन जुलहा मन भयो आनंदा । जिमि चकोर पायो निशि चंदा ॥ ले सुत चले हर्ष मन कीन्हा । तासों पुनि अस बोलेहि लीन्हा ॥ आगिल जन्म जब होइ तुम्हारा । तुम्हैं पठायब यम तैं न्यारा ॥
साखी-सुत काशी को लै चले, लोग देखन तहाँ आव ॥ अन्न पानी भक्ष नहीं, जुलहा शोक जनाव ॥
चौपाई
तब जुलहा मन कीन्ह तिवाना । रामानन्द सौँ कहि उत्पाना ॥ मैं सुत पायो बड़ गुणवंता । कारण कौन भखै नहीं संता ॥ रामानन्द ध्यान तब धारा । जुलहा सो तब वचन उचारा ॥ पूर्व जन्म तैं ब्राह्मण जाती । हरि सेवा कीन्हेसि भलि भांती ॥ कछु तुव सेवा हरिकी चूका । तातैं भायो जुलहा को रूपा ॥ प्रीति प्रभू गहि तोरी लीन्हा । तातैं उद्यानमें सुत तोहि दीन्हा ॥
नूरी वचन
हे प्रभु जस कीन्हो तस पायो । आरत हो तुव दर्शन आयो ॥ सो कहिये उपाय गुसाई । बालक श्रुधावंत कछु खाई ॥ रामानंद अस युक्ति विचारा । तुम सुत कोई ज्ञानी अवतारा ॥ बछिया जाही बैल नहीं लागा । सो ले ठाढै करै तेहि आगा ॥ साखी-दूध चले तेहि थन तैं, दूधहि धरौ छिपाइ ॥ श्रुधावंत जब होवै, ता कहैं देउ खवाइ ॥
चौपाई
जुलहा इक बछिया ले आवा । चल्यो दूत कोउ मर्म न पावा ॥ चल्यो दूत जुलहा हरषाना । राख छिपाइ काहूँ नहीं जाना ॥ सुन भामिनि आगे चल आवा । सो ले जाइ कोई भेद न पावा ॥
बाललीला और रामानन्दको गुरु करनेका वर्णन
ज्ञानसागर
( ७५ )
दूध न पीवत नाम कबीरा । खेलेत संत संग मत धीरा ॥ तिनसौँ कहैं जागौ रे भाई । बिना नाम नहिँ काल पराई ॥ कोई न बूझौ भेद हमारा । रामानंद पर तब पगु धारा ॥ तब अपने मन कीन्ह उपाई । तिनहि दरश कैसहु नहि पाई ॥
रामानन्दको गुरु करना
जाहि रामानंद गंग स्नाना । तेहि मारग में जा पौढाना ॥ तबहि पांव गुरु लाग कबीरू । रामानंद बोल्यो मत धीरू ॥ उठ कबीर तब वचन उचारा । रामानंद है गुरु हमारा ॥
साखी-करहिगोष्ठी शिष्य सब, कोई ज्ञान जीत नहिं जाय ॥ सत ऋषि सुधि पाई, गुरु सों बोले आय ॥
बोपाई
विद्या कहे मलेच्छ को दीन्हा । रामानंद कोध तब कीन्हा ॥ चले शिष्य तब आज्ञा पाई । कबीर संतको आन बुलाई ॥ सुनतहिं शिष्य चहुँ दिशि धाये । हेर खोज कबीरै लाये ॥ आये कबीर लागि नहि बारा । गुरु मंडलमें आन पगु धारा ॥ अन्तर कपाट शिष्य तब लाया । पूजत रामानंद हरि राया ॥ सुन कबीर आगे चलि आये । गुरुहि आनकर मस्तक नाये ॥ लक्ष्मीनारायण मुकुट सिरनाये । पहिरै वस्त्र माल नहीं समाये ॥ तबहि कबीर वचन अस भाखा । वस्त्र पहिरि माला तुम राखा ॥ अंतर कपाट खोल तब दीन्हा । रामानंद सुन अचरज कीन्हा ॥ दिव्यज्ञान तुम कहैं केहि दीन्हा । जोर कर गुरुहि विनोदित कीन्हा ॥ कब हम तुम को दिशा दीन्हा । नाम हमारा काहे तुम लीन्हा ॥ गुरु हमैं तुम दिशा दीन्हा । झूठ बोलका क्या फल चीन्हा ॥
नं. १ कबीर सागर -
( ७६ )
ज्ञानसागर
साखी-गुरु जब चलैं नहाने, तब हम दिक्षा पाव ॥ तातैं गुरु कहि थाप्यो, फिर पीछे पछताव
चौपाई
पूज्यो पाहन पंडित धर्मा । पहिल न जानो तुम्हरो मर्मा ॥ मैं तो चाहत मुक्ति पदार्थ । तुम पाहिन जापूजे निश्चारथ ॥ तब गुरु सुनकै अचरज भयऊ । योग समाधि वैकुंठहि गयऊ ॥ सत्त समाधि विष्णु जब देखा । तापर देश कबीरहि लेखा ॥ जहैं देखा तहां सत्त कबीरा । झूठ ध्यान भूले मत धीरा ॥ हे कबीर तुम मर्म न जाना । जान मलेछ किया अपमाना ॥ जो कछु आहि मुक्ति सन्देशा । सो सब मोहि कहौ उपदेशा ॥
साहिब कबीर वचन
छोड़ी सबै मान अभिमाना । तो कह देव मुक्ति फल दाना ॥ शिष्य सरवा सौ बात जनाऊ । काल तोर शरणगत आऊ ॥ कहैं कबीर काल है काला । है बड़ दारुण काल कराला ॥
साखी-मुक्तिदेव नहिं लेव तुम, रामानंद गुरु देव ॥ भोरहि जन्म गवांय हो, करि पाहन की सेव ॥
सिकन्दर शाहकी बारता-चौपाई
ता निशि को तब भयो प्रभाता । काशी आइ भयी एक बाता ॥ आये सिकन्दर शाह सुल्ताना । है व्याधा बहु भेद न जाना ॥ रामानंद की सुनी बड़ावा । तातैं शाह आप चलि आवा ॥ आये मंडप जहां सुल्ताना । रामानंद तब देख रिसाना ॥ आये शाह सन्मुख भये जबही । रामानंद मुख फेरा तबही ॥ वार अनेक तिहितें सुख फेरा । तांकी ओर क्रोध कर हेरा ॥ मारचो खंग परचो खसि धरनी । शाह के अङ्ग अनिल सम बरनी ॥ आये शाह जहां दुःख नसावन । अधिक भई जो देह सतावन ॥
सिकन्दरसाहूकी वार्ता और रामानन्दजीका कत्ल होना
ज्ञानसागर
( ७७ )
पय औ रुधिर चल्योगुरु अंगा । पावक उठी शाह के अंगा ॥ तवै शाह ने सुधि अस पाई । महिमा जान कबीर बुलाई ॥
सारखी-कबीर दर्शन दीन्हा जबै, तपन भई सब दूर ॥
शाह कहा तुम सांच हो, औ अल्लहका नूर ॥
सिक्कन्दरवन-चोपाई
पय औ रुधिर चल्यो गुरु अंगा । शाह कहै यह कौन प्रसंगा ॥
कबीरवन
जेहि तन मान्यो शब्द हमारा । तेहि तैं चले दूध की धारा ॥
कीन्हा कालउ केर विचारा । आधा अङ्ग रुधिर अनुसारा ॥
अगले जन्म मुक्ति जो होई । अंकूरी जीव कहावै सोई ॥
गोको बिलाना
यहै चरित्र तहां पुनि भयऊ । तब नूरी के मंदिर गयऊ ॥
काजी मुह्ता सबै रहाये । गाय आनि के गलो कटाये ॥
देखि दुखित भये सत्त कबीरू । महा व्याधि गाई की पीरू ॥
केहि कारण गाई जो मारा । सो सब मोहि कहो उपचारा ॥
काजी काया देख विचारी । एकहि ब्रह्म गाय क्यों मारी ॥
गाय ज़िवावहु मुर्गा सारू । नातर वेद अथर्वन हारू ॥
सत्त शब्द है जासु शरीरू । व्यापी महा गाय की पीरू ॥
सारखी-उठिके गाय ठाढ़ी भई, आज्ञा जबही कीन्ह ॥
काजी मुह्ता जानि कै, पाव पकर तब लीन्ह ॥
चोपाई
नगर के लोग अचंभो लागा । यह कबीर कर्ता हो जागा ॥
मगध गवन
तब तहैं से पुनि कीन पयाना । उत्तर देश मगध अस्थाना ॥
नूवा नूरी काल बस भयऊ । तिन पुनि जन्म मनुष्य हिलयऊ ॥
( ७८ )
ज्ञानसागर
राजा बीरसिंह देव बड़ राज । ताके गृह अब धारचो पाऊँ ॥ कमलावती तासु नृप नारी । तिन बड़ सेवा कीन्ह हमारी ॥ ताकौ दीन्ह पान परवाना । तिन कछु भेद हमारा जाना ॥ कह्यो तासों मुक्ति प्रभाऊ । सुनत भयो आनंदित चाऊ ॥ विजुलीखां पठान बड़ ज्ञानी । सन्त जान जिन सेवा ठानी ॥ तासों कही मुक्ति परभाऊ । ज्ञान गम्य तिन बहुत कराऊ ॥
साखी-अति आधीन जब देखा, ता कहैं दीन्हहा नाम ॥
प्रीति जानि कै ताकी, कछु दिन किय विश्राम ॥
चोपाई
विजुलीखां कहै पीर हमारे । नृप वीरसिंह शिष्य तुम्हारे ॥ साहिब आप तजो जब देहा । दोह दीन सो कीन्ह सनेहा ॥ सुनि विहंसि अस आज्ञा ठानी । दोह दीन से हम निरवानी ॥ हिन्दू तुरक नहीं हो भाई । सुन पठान संशय उपजाई ॥ जो तुम दोइसों न्यारी रीती । मेरे मन कैसे होय प्रतीती ॥ तुम तो हो अछह के बन्दा । यह तो अहै आदमी गंदा ॥ तुमहि शरीर तजौगे जबही । शरीर उपाय करों क्या तबही ॥ कै पृथिवी कै देहों जारा । करहु हुकम सो पीर हमारा ॥ जो कछु होई लोक व्यवहारा । सोई कहो मम पीर पियारा ॥ जो साहिब हुकम जस करिहौ । मजार तुम्हारा रचिके धरिहौ ॥
साखी-बिहंसि कह्यो तब तिनसैं, मजार करौ सम्हार ॥
हिन्दू तुरक नहीं हौं, ऐसा वचन हमार ॥
चोपाई
दिन कछु गये तासु संबादा । राजा बीरसिंह ने भेजे प्यादा ॥ बन्दीछोर आवैं मम गेहा । रानी विन्ती कीन्ह सनेहा ॥ ताकी प्रीति तहाँ पगुधारा । दुःखद्वन्द्व तिन सबै विसारा ॥
ज्ञानसागर
( ७१ )
तिन पुनि कही सुनौ गुरु ज्ञानी । दुतिया ब्याह लगन में ठानी ॥ ब्याह जो होय बिकट अस्थाना । क्या जाने होवे संग्रामा ॥ कोइ घायल कोइ जाई मारा । खाड़ो आही दुहु दिशि धारा ॥ ताकी आज्ञा करौ गुसाई । तिनहि देह क्या करो उपाई ॥ कै गाड़ौ कै जारौ धूरी । यह संशय मेटो प्रभु मोरी ॥ करौ सोई लोक कुल धर्मा । बिन लागै कोई जानै न मर्मा ॥ साखी-जो गाड़ौ तो माटी, जो जारौ तो छार ॥ करो लोककी जो कृति, बोलता ब्रह्म निनार ॥
चौपाई
हे स्वामी तुम मोहि बताओ । तुम तनतजोतो काहि कराओ ॥ जस प्रभु तस पुन सेवक करई । सेवा युक्ति सदा सो तरई ॥ जो तुम कितहू करहू प्याना । गाड़हि लागै तुमहिं पठाना ॥ हँसै सबै यह देखि परतच्छा । गुरु तुम्हारो आहि मलेच्छा ॥ तस कछु भेद बताओ स्वामी । करो कृपा सो अन्तर्यामी ॥ वास्तव तेहो कहाँ बुझाई । जारौ देह जो क्षार उड़ाई ॥ तातैं लोक मैं नहीं छुड़ाओ । यातैं दोह दीन फरमाओ ॥ गयो नृपति तहैं साज बराती । कौतुक रचो देह तब त्यागी ॥ सुनत साज दल चले पठाना । राना मुर्दा ले बिल खाना ॥ लेकर गाड़ै करै निमाजा । करन बिहानक दूरी काजा ॥ साखी-रानी भेजे प्यादहीं, तन जब तजो कबीर ॥ आयो बिजुली खान तब, सुनि वृत्तान्त गंभीर ॥
चौपाई
राजा पास पठाओ पाती । सुनतहि क्रोध जरी तब छाती ॥ छाड़्यो ब्याह चले दल साजी । हनें निशान सम्हर की बाजी ॥ बाजा गाजी तुरही आवहि । यह बिजुलीखां युक्ति बनावहि ॥ ऐसी भांति सो कीन्ह प्याना । रन के आगे बजै निशाना ॥
रतनाकी कथा
( ८० )
ज्ञानसागर
बांधी अस्त्र अस चले बहु बीरा । कुहुक बान औ बहु धन तीरा ॥ बरछी सेल औ छुरी कटारी । खड्ग रु तुरी चपल परचारी ॥ दोड़ दिशि देख अस्त्र चमकारा । मानो साज चलो जल धारा ॥ राजा कीन्ह मरन का ठाना । वयरख रोप जो रहो पठाना ॥ जब देखा मैं होत लराई । युद्ध जानि अस कन्यो उपाई ॥ रानी जान मोर कछु मर्मा । तिन पुनि कही तजो नृप भर्मा ॥
साखी-पहिले खोदो माटी, मुदां देखु निहार ॥
सुरदा नहिं वहि भीतरे, कहा करत ही रार ॥
चोपाई
सत् कबीर नहीं नर देही । जारै जरत ना गाई गड़ही ॥ पठयो दूत पुनि जहां पठाना । सुनिके खान अचंभी माना ॥ दोड़ दल आई सलाहा जबही । बने गुरु नहिं भेटे तबही ॥ दोनों देख तबै पछतावा । ऐसे गुरु चीन्ह नहिं पावा ॥ अपने मैं अचंभा ठाना । रंक माहिं धन गया छिपाना ॥ दोड़ दीन कीन्ह बड़ शोगा । चकित भये सबै पुनि लोगा ॥
रतनाकी कथा
तब अपने मन कीन्ह विचारा । रतना कँदोइन कै पगु धारा ॥ रतना समाधान बहु कीन्हा । राजहि पठय सँदेशा दीन्हा ॥ तुम नृप किमि करते पछताना । निश्चय आही शब्द प्रवाना ॥ रहौ सदा शब्दहि मन लाई । दर्शन मोक्ष होय नहिं भाई ॥ साखी-विजुलीखां सौं दुआ कहि, किमि कारण पछताव ॥ रहौ नाम लौ लाइके, जाते कर्म कटाव ॥
चोपाई
लोक वेद मैं ऐसे विचारा । किमि कारण मन दुखी तुम्हारा ॥ सुने दंडवत बहु विध कीन्हा । तत्त्व मता नामहि गहि लीन्हा ॥ रतना सौं कहि मता अपाना । तेहि सुनिके हरष बहु आना ॥
ज्ञानसागर
( ८१ )
हे स्वामी मोहिं कीजै चेरी । जातै कटै कर्म की बेरी ॥ धन्य शब्द धनिजो कह्यु चहिये । सो सब स्वामी मोसों कहिये ॥ सवा सेर मिष्ठान ले आवहु । और सवासौ पान मैगावहु ॥ इतना चहिये और न काजा । तातै भाग चले यमराजा ॥ सोई अंश पान निज लीन्हा । ताको जीव दान मैं दीन्हा ॥ अंकुरी जिव भेटे निज गेहा । नूवा नाम जो प्रथम सनेहा ॥ साखी-ताको पठयो निज भवन, तीन लोक तें न्यार ॥ नूरी के मन इच्छा, धर्मदास अवतार ॥
चौपाई
सुन धर्म दास यहै कुल धर्मा । मेटो तीरथ बरत कुल भर्मा ॥ कोटि जन्म कीन्हौ तप धर्मा । विनसत गुरु नहिं मिटिहै भर्मा ॥
धर्मदासवचन
हंस राज जो दर्शन दीन्हा । जन्म स्वारथ अधमको कीन्हा ॥ हे प्रभु मोरे बन्दी छोरा । हौं आधीन दास मैं तोरा ॥ आनहु पान और मिठाई । जितनौ रतना के मन भाई ॥ आनहु रतना कहौ तुम स्वामी । कृपा करो तुम अन्तर््यामी ॥
कबीरवचन
प्रथम हि जो पावै निज बीरा । पुरुष रच्यो सुख सागर तीरा ॥ जाके रहे पुरुष औ नारी । बीरा नाम जीव रखवारी ॥ सवा लक्ष जीव नित जो मारा । तातैं सवा सेर व्यवहारा ॥ साखी-सवा सेर मिष्ठान जो, और सवा सौ पान ॥ इतना ले जो शिष्य हो, यम तेहि देखि डरान ॥
चौपाई
सुहर देखि जैसे घट वारा । जिनहैं घाट ऊपर बैठारा ॥ जो कोइ झूठा रूप बनावै । बिना पान जान नहिं पावै ॥
( ८२ )
ज्ञानसागर
आने फेर परवाना सोई । जैसा अंक सुहर पर होई ॥ इतनी सुन हरषे धर्म दासा । शिरनी पान लाइ धरे पासा ॥ सेत सिंहासन सेतु ई साजा । सेत पान सिर क्षत्र बिराजा ॥ पाने दलतै सबहीं कीन्हहा । तामें अंक अग्र को दीन्हहा ॥ प्रथम हि तितुका वेग तुरायी । मारग भेद तबै समुझायी ॥ बाएं दाहिने है सहि दानी । इकदिशि धर्म द्वितीय दुर्गदानी ॥ पाछे चित्र गुपित्र को थाना । तेहि तजि हंसा देइ पयाना ॥ टूटै घाट अठासा कोरी । हंसा चढ़े नाम की डोरी ॥
साखी-यमसों तितुका तोरकै, तब दीजौ निजपान ॥
पाई प्रसादै हर्ष तब, शब्द देख मन मान ॥
चौपाई
जाई उबारौ हंस अंकुरा । मन की दिशा देख मन भुला ॥ हे प्रभु कौन शब्द है सारा । तौन शब्द तैं जीव उबारा ॥ एक शब्द पुनि दीन्हहा हेरी । यही शब्द तैं जीव उबेरी ॥ जस दरपर लै दीजे हाथा । दर्शन देखै मुख औ माथा ॥ धर्म दास सुनत मन माना । बिकसे कमल उदैं जनु भाना ॥ यही वस्तु से जीव उबारा । और ज्ञान है बहुत अपारा ॥ मूल नाम अक्षर धुनि साचा । जेहि तैं जीव काल सों बाचा ॥ आदि नाम पुरुष कर आही । भाग जीव पाव पुनि ताही ॥ धन्य भाग वस्तु जिन पाया । मोकहँ सत गुरु अलख लखाया ॥ अक्षर मूल और सब डाला । डारहि में फल फूल रसाला ॥ किंचित को फल पावै सोई । कहैं कबीर अमर सो होई ॥ अक्षर मूल अमी पैंच शाखा । साखी रमैनी ताकी पाता ॥ सुमिरन डार पुहुप है जोगा । तेहि सम आहिना दूसर भोगा ॥ साखी-अक्षर धुनि लौ लावई, अपराधै परिचय योग ॥ कहैं कबीर संशय गयी, भोगहि मध्ये भोग ॥
चौका आरतीकी विधि
ज्ञानसागर
( ८३ )
चौपाई
भव मैं अक्षर परचे पावे । सत्त गहै सतलोक सिधावे ॥ पुहुपहि से फल उपजे सारा । फल है मुक्ति भोगसे न्यारा ॥ हे प्रभु जो इतना नहि जाना । सो जिव कैसे लोग पयाना ॥ पंच अमीका सुमिरन दीजे । बंदी छोर ताहि किमि कीजे ॥ औ पुनि ताहि देव जप माला । आवहि लोकसो भौनहि डाला ॥ निश्चय कहौ पंथ कर भाऊ । दुविधा भाव लरो मत काऊ ॥ कहो पंथ जो पाँजी वाका । धरती शीश स्वर्ग का नाका ॥
साखी-यहि विधि राह चलावहु, सुनहु हो धर्मदास ॥ जीव छुड़ाओ काल सो, सत्त शब्द परकाश ॥
धर्मदास वचन-चौपाई
हे प्रभु मैं कहत डराऊँ । कहों सो एक वस्तु जो पाऊँ ॥ जो नहि पावहि एती साजा । तासों किमि डरि है यमराजा ॥
कबीर वचन
साठ समय बारह चौपाई । एही तत्व हंस घर जाई ॥ पांच अमी महाँ एकौ पावे । है परमान सो लोग सिधावे ॥ अथवा जो एकौ नहि पावे । चार करी तत्त्व मन लावे ॥ चार करी बूझे मन लाई । यमराजा तेहि देख डराई ॥ अदेख देख तत्व मन धरयी । बोलता ब्रह्म सो परिचय करई ॥ इनकी देख नाम लौ लावे । डोर गहै सत्य लोक सिधावे ॥
धर्मदास वचन
हे प्रभु जो इतना नहि जानै । सो जिव कहा करै विश्रामै ॥ नामहि पाइ तत्व मन धरई । दुविधा भाव कबहुँ नहि करई ॥ निर्गुण नाम रहे लव लाई । ताके निकट काल नहि जाई ॥
( ८४ )
ज्ञानसागर
साखी-खोजकर सत शब्द का, गहै तत्त्व मत धीर ॥ निश्चय लोक सिधाइ है, अस कथ कहैं कबीर ॥
धर्मदासवचन-चोपाई
हे प्रभु जा पर दाय़ा होई । पावै वस्तु सार पुनि सोई ॥ अथवा जो ऐती नहि पावै । हे प्रभु तो कैसी बनि आवै ॥
साहब कबीर वचन
पावै सार जान निज बीरा । निश दिन सुमिरे धन्य कबीरा ॥ जहाँ सुने सतगुरु को नामा । सुने भक्ति छाड़ै सब कामा ॥ सुने जो भक्ति तत्त्व मन लावै । देह छोड़ि सत लोक सिधौवै ॥
धर्मदास वचन
हे प्रभु जो इतना नहि राता । तासौ कैसी कहिये वाता ॥ माया जीव अधिक लपटाना । तातैं प्रभु पूछौ इठ ग्याना ॥
साहब कबीर वचन
धर्मदास मोहि यदि भावै । करही जाप धनी जो पावै ॥ आवै मल्ल तब करै लड़ाई । जाने दाव घात चतुराई ॥ तबही बने कृपी को साजा । कोठी बीज खेत उप राजा ॥
साखी-शूरा बैर भल खोजिये, बीज धरहि को सार ॥ रयाया बीज न बोइये, ऐसा मता हमार ॥
चोपाई
बिना नाम बहु तन डहकाया । फिर फिर भौजल भटकाखाया ॥ जुग जुग जन्मबहुरि भवलीन्हा । होई हित नहि नाम विहूना ॥ नाम पाय जो तत्त्व न धरई । ते पुनि जन्मै गुरु क्या करई ॥ तत्त्व प्रमाण यही धरमदासा । तातैं मिटै कालकी फाँसा ॥
धर्मदास वचन
बालक कहा तत्त्व को जानैं । मुक्त होय तेहि कौन प्रमानै ॥
योग कर्मका वर्णन
ज्ञानसागर
( ८५ )
साहित्य कवीर वचन
बालक नाम कौ दीजै बीरा । पहुँचे लोक जब तजे शरीरा ॥ त्रिया कह सनेह है सारा । उपजै भाव होय जम न्यारा ॥ जातैं नर अचेत अज्ञाना । तातैं तत्त्व नाम परमाना ॥ तत्त्व है मूल और सब साखा । ताकौ नाम जोग मय भाखा ॥ जो नर तत्त्व न राखे ज्ञाना । ताकौ ज्ञान बालक सब जाना ॥ पावै आदि अंत निज बीरा । पुरुष रच्यो सुख सागर तीरा ॥ छठै मास बीरा निज पावै । है प्रमान सो लोक सिधवै ॥
साखी-तत्त्व मुक्ति है निश्चय, औ बीरा निज सार ॥
माया लीन्ह नर प्राणी, भूल परा संसार ॥
धर्मदास वचन-चोपाई
निसिदिन रह माया लपटाना । सो प्रभु कैसे होय निर्वाना ॥
साहित्य कवीर वचन
निस दिन रहे माया विस्तारा । पलकौ भज तो उतरै पारा ॥ पलकौ नाम चित्त ना धरई । ते पुनि जन्मैं गुरु क्या करई ॥ कर्म निवारन जेहिते होई । परिचय सहज तत्त्व है सोई ॥
धर्मदास वचन
सो मोहि स्वामी प्रगट बताऊ । केहि विधिजोगकर्मसमझाऊ ॥
साहित्य कवीर वचन
प्रथम सत्य आसन आराधै । निवरी कर्म जो या विधि साधै ॥ काम मारिये अरूप अहारा । जहाँ काम तेहि जोग बिकारा ॥ कोइ कछु कहै हृदय नहीं धरई । निन्दा विन्दा मब परिहरई ॥ तजै देह जिमि कांचरि सांपा । आलस निद्रा सहज निदापा ॥ दृष्टि न जावै भल औ मंदा । मनहि न आनै संसो नंदा ॥ धोती वस्ती नेती करई । जिमि कामिन सो ग्रहै बहरई ॥
अष्ट कमल वर्णन
( ८६ )
ज्ञानसागर
तिनका खेह मंदिर में होई । करई दूर भामिनी सोई ॥ या विधि काया संयम राधै । बांधै मूल अरु नाको साधै ॥
छंद-मूल बांधै नाम साधै काया संयम जानिकै ।
मन पवन दोई तुरी साजै युक्ति जीव बनायकै ॥
देह ताडना चित्त को तुबक सर छाड़ै आस हो ।
तेही आस चढ़टोरै ममासा जीव होय निकास हो ॥
सोरठा-ऐसी बाजी होई, मनके संग दौराइये ।
मन शूरा पुनि सो, कष्ट परै पुनि ना टरै ॥
चोपाई
परै कष्ट तब तोरिगे वासा । राखै खड़ नाम को पासा ॥
नाम अछ ते दूत डराई । भागे अरि शूरा जिमि पाई ॥
अरि के भाजैं होय हुलासा । दुविधा भिटै कमल परगासा ॥
अष्ट कमल देखै पुनि सोई । मानौ रंक महा धन होई ॥
देखै ब्रह्म जहाँ अस्थाना । भय भाजैं तब हो निर्वाना ॥
अष्टकमल वर्णन
अष्ट कमल तोहि भेद बताऊँ । अजपा सोहं प्रगट बुझाऊँ ॥
मूल कमल दल चार ठिकाना । देव गणेश तहाँ कीन्ह पयाना ॥
ऋद्धि सिद्धि बासा तहाँ होई । छै सौ जप अजपा तहाँ सोई ॥
द्वितीय कमल पटदल परमाना । तहाँ कमलन कर आहि ठिकाना ॥
सावित्री ब्रह्मा है जहवाँ । षट सहस्र जाप है तहवाँ ॥
छन्द-त्रय कमल दल अष्ट है हरि लक्ष्मी तिहि संग मौँ ।
षट सहस्र जहँ होई अजपा निरखि देखो अंग मौँ ॥
कमल चौथा द्वादश दल शिव को तहाँ निवासु हो ।
सुरति नरति करि लोक पहुँचै षट सहस्र जहाँ जासु हो ॥
ज्ञानसागर
( ८७ )
सोरठा-पञ्चयें कमल प्रकाश, तिहिं पोडश दल अहै ॥ आतम जीव निवास, कइ सहस्र अजपा कह्यो ॥
चौपाई
छठवां कमल अहै दल तीनी । सरस्वती तहैं वासा कीनी ॥ दोसौ एक अजपा जहैं होई । बूझे भेद सो बिरला कोई ॥ भौर गुफा दो जल परवाना । सातों कमलकोआहि ठिकाना ॥ एक सहस्र अजपा परकाशा । तहां बोलता ब्रह्म को वासा ॥ तहां जोग साधे बहु जोगी । इंगलापिंगला सुखमनि भोगी ॥ तहां देख असंख्य जो फूला । ब्रह्म थाप काया में भूला ॥ सात कमल जाने सब कोई । अष्टम कमल विनुमुक्ति न होई ॥ विनु सतगुरु को भेद बतावै । नाम प्रताप जोग हि आवै ॥ काया तें जो बाहिर होई । भाग जीव पावै पुनि सोई ॥ छन्द-बहु भांति मुनि ऋषिजोग ठान्यो भयोरहित नहिं लेस हो ॥ काया थापी सुरति सों सब काग भये नहिं हंस हो ॥ पक्षी होई तब होइ महाबल नाम विना तो काग हो ॥ पक्षी त्यागी जो नाम साधे हंस होय बड़ भाग हो ॥ सोरठा-जोग तो आहि अपार, पक्षी भया पर नयन नहीं ॥ जोग नाम उजियार, नाम तेहि जो पावही ॥
चौपाई
पक्षी भाग नयन जिन पावै । ताके जहां तहां उड़ जावै ॥ देखे लोक जो गुरु बतावै । पक्षी नयन को यहै स्वभावै ॥ अथवा नाम नेक जो पावै । साधे तत्त्व जो लोक सिधावै ॥ नाम नयन पक्षी जो होई । तेहि समान दूसर नहिं कोई ॥ बाहिर को मैं कहब ठिकाना । सुरतिकमलसतगुरु निरवाना ॥