भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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ज्ञानसागर

( ६९ )

अक्षैबट कृष्णरोहिणी अस्नाना । इन्द्र दमन समुद्र अस्थाना ॥ यहि विधि तीर्थकरे मन जानी । पुनर्जन्म ना होवे प्रानी ॥

सार्वी-हँसे कृष्ण छल मता कहि, जिमि माहुरको मीठ ॥

अस पुरुषोत्तम क्षेत्र फल, ज्ञानवन्त कहैं दीठ ॥

चौपाई

समाधान हरिको जब कीन्हहा । आसन उदधि तीर में लीन्हहा ॥

चौरा कीन्ह तहाँ पुन जाई । इन्द्र दमन तब आज्ञा पाई ॥

जबहीं मंडप काम लगावा । सागर उमँग खसावन आवा ॥

उठावहु मंडप करि निःशंका । उदधि त्रासकी मेटव शंका ॥

आयो क्रोध लहर जब पानी । मेटचो पुरुषोत्तम सहिदानी ॥

लहर उमंगी सागर तीरा । आय जहां तहैं सत्त कबीरा ॥

देखत दरस महा भय मानी । बोल्यो वचन जोर युग पानी ॥

हे स्वामी तुव मर्म न जाना । जगन्नाथ वर किया पयाना ॥

क्षमौ अपराध मोर प्रभुराया । लेउ बैर अस कीजै दाया ॥

तासों पुनि अस वचन उचारा । बोर द्वारिका बैर तुम्हारा ॥

सार्वी-राम रूप सागर बँध्यो, तातैं उदधि उमंग ॥

बोरौ नगर द्वारका, भयो रुचिर परसंग ॥

चौपाई

तब तैं उजर द्वारका भयऊ । पंडनको तब स्वप्ना दयऊ ॥

आये मोपर साहिब कबीरा । आवा गमनकी मेटन पीरा ॥

ऐसा स्वप्न पंडन दीन्हहा । तीर्थ स्नान तेहि सब कीन्हहा ॥

उठचो जो मंडप बाज बधावा । कनक उरे नहिं हाथ बनावा ॥

एक दिना कौतुक अस भयऊ । सागर तीर पंडा चलि गयऊ ॥

करि असनानचलो मंडप पासा । मनमें ऐसा वचन प्रकासा ॥

प्रथमहिं चौरा म्लेछ को गयऊ । ठाकुरके नहिं दर्शन कियऊ ॥