कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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ज्ञानसागर
बांधी अस्त्र अस चले बहु बीरा । कुहुक बान औ बहु धन तीरा ॥ बरछी सेल औ छुरी कटारी । खड्ग रु तुरी चपल परचारी ॥ दोड़ दिशि देख अस्त्र चमकारा । मानो साज चलो जल धारा ॥ राजा कीन्ह मरन का ठाना । वयरख रोप जो रहो पठाना ॥ जब देखा मैं होत लराई । युद्ध जानि अस कन्यो उपाई ॥ रानी जान मोर कछु मर्मा । तिन पुनि कही तजो नृप भर्मा ॥
साखी-पहिले खोदो माटी, मुदां देखु निहार ॥
सुरदा नहिं वहि भीतरे, कहा करत ही रार ॥
चोपाई
सत् कबीर नहीं नर देही । जारै जरत ना गाई गड़ही ॥ पठयो दूत पुनि जहां पठाना । सुनिके खान अचंभी माना ॥ दोड़ दल आई सलाहा जबही । बने गुरु नहिं भेटे तबही ॥ दोनों देख तबै पछतावा । ऐसे गुरु चीन्ह नहिं पावा ॥ अपने मैं अचंभा ठाना । रंक माहिं धन गया छिपाना ॥ दोड़ दीन कीन्ह बड़ शोगा । चकित भये सबै पुनि लोगा ॥
रतनाकी कथा
तब अपने मन कीन्ह विचारा । रतना कँदोइन कै पगु धारा ॥ रतना समाधान बहु कीन्हा । राजहि पठय सँदेशा दीन्हा ॥ तुम नृप किमि करते पछताना । निश्चय आही शब्द प्रवाना ॥ रहौ सदा शब्दहि मन लाई । दर्शन मोक्ष होय नहिं भाई ॥ साखी-विजुलीखां सौं दुआ कहि, किमि कारण पछताव ॥ रहौ नाम लौ लाइके, जाते कर्म कटाव ॥
चोपाई
लोक वेद मैं ऐसे विचारा । किमि कारण मन दुखी तुम्हारा ॥ सुने दंडवत बहु विध कीन्हा । तत्त्व मता नामहि गहि लीन्हा ॥ रतना सौं कहि मता अपाना । तेहि सुनिके हरष बहु आना ॥