कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंज्ञानसागर
( ८१ )
हे स्वामी मोहिं कीजै चेरी । जातै कटै कर्म की बेरी ॥ धन्य शब्द धनिजो कह्यु चहिये । सो सब स्वामी मोसों कहिये ॥ सवा सेर मिष्ठान ले आवहु । और सवासौ पान मैगावहु ॥ इतना चहिये और न काजा । तातै भाग चले यमराजा ॥ सोई अंश पान निज लीन्हा । ताको जीव दान मैं दीन्हा ॥ अंकुरी जिव भेटे निज गेहा । नूवा नाम जो प्रथम सनेहा ॥ साखी-ताको पठयो निज भवन, तीन लोक तें न्यार ॥ नूरी के मन इच्छा, धर्मदास अवतार ॥
चौपाई
सुन धर्म दास यहै कुल धर्मा । मेटो तीरथ बरत कुल भर्मा ॥ कोटि जन्म कीन्हौ तप धर्मा । विनसत गुरु नहिं मिटिहै भर्मा ॥
धर्मदासवचन
हंस राज जो दर्शन दीन्हा । जन्म स्वारथ अधमको कीन्हा ॥ हे प्रभु मोरे बन्दी छोरा । हौं आधीन दास मैं तोरा ॥ आनहु पान और मिठाई । जितनौ रतना के मन भाई ॥ आनहु रतना कहौ तुम स्वामी । कृपा करो तुम अन्तर््यामी ॥
कबीरवचन
प्रथम हि जो पावै निज बीरा । पुरुष रच्यो सुख सागर तीरा ॥ जाके रहे पुरुष औ नारी । बीरा नाम जीव रखवारी ॥ सवा लक्ष जीव नित जो मारा । तातैं सवा सेर व्यवहारा ॥ साखी-सवा सेर मिष्ठान जो, और सवा सौ पान ॥ इतना ले जो शिष्य हो, यम तेहि देखि डरान ॥
चौपाई
सुहर देखि जैसे घट वारा । जिनहैं घाट ऊपर बैठारा ॥ जो कोइ झूठा रूप बनावै । बिना पान जान नहिं पावै ॥