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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

भवसागरकी रचना (प्रारम्भ)

अनुरागसागर

( २६ )

कबीरवचन धर्मदास प्रति

विहैंसी कन्या सुन अस वाता । इक मति होय दोई रंगराता॥ रहस वचन बोली मृदु बानी । नारिनीचबुधिरतिविधिठानी॥ रहसवचन सुनि धरम हरषाना । भोग करनको मनमें आना॥

बुन्द

मन नहिं कन्या कहती असचरितकीन्ह निरंजना॥ नख घातकियेभगद्वारततछिण, घाटउत्पतिगंजना॥ नखं रेषशो नितचल्या, तिहुँको खब खासआरंभनी॥ आदिउत्पत्तिमुनहु धर्मनि, कोउ नहिं जानत जम मनी॥ त्रियावार कीन्ही रति तबै, भये ब्रह्मा विष्णु महेशहो॥ जेठे विधि विष्णु लघु तिहि, तीज शंभु शेष हो॥१८॥ सोरठा-उत्पति आदिप्रकाश, यहि विधि तेहि प्रसंगभो॥ कीन्हो भोगविलास, इकमनि कन्या काल है॥१८॥

भवसागरकी रचना

तेहि पीछे ऐसा भो लेखा । धर्मदास तुम करौ विवेका॥ निरंजनवचन अध्याप्रति

अग्निपवनजलमहि आकाशा । कूर्म उदरते भयो प्रकाशा॥ पाँचौ अंस ताहि सन लीन्हा । गुण तीनों सीसनसों कीन्हा॥ यहि विधि भयेतत्त्वगुण तीनों । धर्मराज तब रचना कीनों॥

कबीर वचन धर्मदास प्रति

गुणतसम कर देविहि दीन्हा । आपन अंश उत्पने कीन्हा॥ बुन्द तीन कन्या भग डारा । तासँग तीनों अंग सुधारा॥

? यह तो पुरानी प्रतियोंमें ऐसाही है किन्तु नवीन प्रतियोंमें उपर्युक्त दोनों पंक्ति नहीं हैं जो विचारपूर्वक प्रसंगोंके पढ़नेसे ठीक नहीं जान पड़ता ।

तीन सुतको उत्पन्न कर निरंजनका गुप्त हो जाना

( २६ )

अनुरागसागर

पांच तत्त्व गुण तीनों दीन्हा । यहिबिधिजनकीरचना कीना॥ प्रथम बुन्दते ब्रह्म जो भयऊ । रजगुणपंचतत्त्व तेहि दयऊ ॥ द्वजो बुन्द विष्णु जो भयऊ । सतगुण पंच तत्त्वतिन पयऊ॥ तीजे बुन्द रुद्र उत्पाने । तमगुण पंच तत्त्व तेहि साने॥ पंच तत्त्व गुण तीन खमीरा । तीनों जनको रच्यो शरीरा ॥ ताते फिरि फिरि परलय होई । आदि भेद जाने नहिं कोई॥ कहै धर्म कामिनि सुनबानी । जो मैं कहूँ लेहु सोमानी ॥ जीव बीज आहे तुव पास। सो ले रचना करहु प्रकाशा॥ कर्ण निरञ्जन पुनि सुनु रानी । अब अस करहु आदि भवानी ॥ त्रय सुतसौप तोहि कहँ दीन्हा । अबहमपुरुषसेवचित लीन्हा॥ राज करहु तुम ले तिहुँ बारा । भेद न कहियो काहु हमारा ॥ मोर दरस त्रय सुत नहिं पैहैं । जो मुहि खोजत जन्म सिरै हैं॥ ऐसो मता दिढेहो जानी । पुरुष भेद नहिं पावै प्रानी ॥ त्रयसुत जबहिं होहि बुधिवाना । सिधुमथन दे पठहु निदाना॥

कवीरवचन धर्मदासप्रति

कहेउ बहुत बुझाय देविहि, गुप्त भये तब आहि हो॥ शून्य गुफहि निवास कीन्हों, भेद लहको ताहिहो॥ वह गुप्त भा पुनि सङ्ग सबके, मन निरंजन जानिये ॥ मन पुरुष भेद उच्छेद देवे, आप परगट आनिये ॥ सो०-जीवभयेमतिहीन, परिसि अगमसो कालको॥ जनम जनम भये खीन, मुरुचा कर्म अकर्मको १८ जीव सतावै काल, नाना कर्म लगायके ॥ आप चलावै चाल, कष्ट देय पुनि जीवको ॥ २० ॥

सिंधु मंथन और चौदहरत्न उत्पत्तिकी कथा (प्रारम्भ)

अनुरागसागर

( २७ )

सिन्धुमथन और चौदह रत्न उपसिकी कथा

त्रय बालक जब भये सयाने । पठये जननी सिंधु मथाने ॥ बालक माते खेले खिलारी । सिंधुमथनहिं गयउ खरारी ॥ तेहि अंतर इक भयौ तमासा । सो चरित्र बूझो धर्मदासा ॥ धान्यो योग निरंजन राई । पवन आरंभ कीन्ह बहुताई ॥ त्यागो पवन रहित पुनि जबही । निकसेउ वेदस्वास सँग तवही ॥ स्वास सँग आयउ सो वेदा । बिरला जन कोई जानेभेदा ॥ अस्तुति कीन्ह वेद पुनि ताहां । आज्ञाका मोहि निर्गुनाहां ॥ कह्यौ जाव करू सिंधुनिवासा । जेहि भेटे जैहौ तिहिपासा ॥ उठी आवाज रूप नहिं देखा । जोति अगम दिखलावतभेखा ॥ जलेउ वेद पुनि तेज अपाने । तेज अन्न पुनि विष संधाने ॥ चले वेद तहैंवा कहैं जाई । जहैंवा सिंधु रचा धर्मराई ॥ पहुँचे वेद तब सिंधु मैझारा । धर्मराय तब युक्ति विचारा ॥ गुप्त ध्यान देविहि समुझावा । सिंधुमथनकहैंकसबिलमावा ॥ पठवहु बेगि सिंधुत्रय बारा । दृढ़कै शोचहु वचन हमारा ॥ बहुरिआपपुनि सिंधु समाना । देवी कीन्ह मथन अनुमाना ॥ तिहुँबालक कहैंकह समुझायी । आशिष दे पुनि तहां पठायी ॥ पैहौ वस्तु सिन्धुके पाहीं । जाहु वेगि तीनों सुत ताहीं ॥ चलिभौ ब्रह्मा मान सिखाई । दोउ लहुरा पुनि पाछे जाई ॥

छन्द

त्रय सुत बाल खेलेत चले, ज्योंसुभगबालमरालहो ॥ एकगहिछोड़तमहीपुनि, एककरगहिचलतलटपटचालहो ॥ क्षणहिधावतक्षणस्थिर खड़े, क्षणभुजहिगरलावही ॥ तेहि समयकी शोभा भली, नहि वेद ताकहैं गावही ॥

प्रथमवार सिंधु मंथन

( २८ )

अनुरागसागर

सोरठा-गये सिंधुके पास, भये ठाढ़ तीनों जाने ॥ युक्तिमथनपरकास, एक एकको निरखही ॥२१॥

प्रथमवार सिन्धु मथन

तीनों कीन्ह मथन तब जाई । तीन वस्तु तीनों जन पाई ॥ ब्रह्मा वेद तेज तेहि छोटा । लहुरा तासुमिलेविष खोटा ॥ भेटि वस्तु त्रय तीनों भाई । चलिभये हर्षकहत जहँमाई ॥ मातापहँ आये त्रय वारा । निजनिजवस्तुप्रगट अनुसारा ॥ माता आज्ञा कीन्ह प्रकाशा । राखुवस्तुतुमनिजनिज पास।

द्वितीय बार सिन्धुमथन

पुनितुम मथहु सिन्धु कहे जाई । जो जेहि मिले लेख सो भाई ॥ कीन्ह चरित अस आदि भवानी । कन्या तीन कीन्ह उत्पानी ॥ कन्या तीन उत्पान्यो जबहीं । अंसवारि मँ नायो सबहीं ॥ सब माताको आगे कीन्हा । माता बाँटि तिन्हन कहँ दीन्हा ॥ पठयो सिंधु महि पुनि ताही । त्रय सुत मर्मसो जानत नाहीं ॥ पुनि तिन मथन सिंधुको कीन्हा । भेटयो कन्या हाँपित है लीन्हा ॥ कन्या तीनहु लीन्हे साथ। औ जननी कहँ नायहु माथा ॥ माता कहे सुनहु सुत मोरा । यह तो काज भये सब तोरा ॥ एक एक बाँटि तीनहुको दीन्हा । काहु भोग कस आज्ञा कीन्हा ॥ सावित्री ब्रह्मा तुम लेख । है लक्ष्मी विष्णु कहँ देख ॥ पारवती शंकर कहँ दीन्ही । ऐसी माता आज्ञा कीन्ही ॥ तीनउ जन लीन्हीं सिरनाई । दीन्ह अध्याजस भाग लगाई ॥ पाई कामिनि भये अनन्दा । जस चकोर पाये निशिचंदा ॥ काम बसी भए तीनों भाई । देव दैत दोनों उपजाई ॥ धर्मदास परखो यह बात। नारी भयी हती सो माता ॥ माता बहुरि कहँ समझाई । अब फिर सिंधु मथो तुम भाई ॥ जो जेहि मिलै लेहुसो जाई । अब जनिकरो विलंब तुम भाई ॥

तृतीयवार सिंधु मंथन

अनुरागसागर

( २९ )

तृतीयवार सिंधुमथन

त्रयसुत चले तब माथ निवायो । जो कछु कहेउ करव हम जायो॥ मध्योसिंधुकछु विलंवन कीन्हा । मिला वेद सो ब्रह्म लीन्हा ॥ चौदह रतन की निकसी खानी । ले माता पहुँ पहुँचे आनी ॥ तीनहु बन्धु हरषि हौ लीन्हा । विष्णु सुधा पाय उहर विषदीन्हा ॥

अथाका तोनों पुत्रोंको सृष्टिरचनेकी आज्ञा देना और सब

मिलकर पांच खानकी उत्पत्ति करना

पुनि माता अस वचन उचारा । रचहु सृष्टि तुम तीनों वारा॥ अण्डज उत्पत्ति कीन्हा माता । पिंडज ब्रह्मा कर उत्पाता ॥ ऊष्मजरखानि विष्णु व्यवहारा । शिव अस्थावर कीन्ह पसारा॥ चौरासी लख योनिन कीन्हा । आधा जल आधा थल कीन्हा ॥ एक तत्त्व अस्थावर जाना । दोय तत्त्व ऊष्मज परवाना ॥ तीन तत्त्व अण्डज-निरमाई । चार तत्त्व पिंडज उपजायी ॥ पांच तत्त्व मानुष विस्तारा । तीनों गुण तेहि माहिँ सँवारा ॥

ब्रह्माका वेद पढ़कर निराकारका पता पाना

ब्रह्मा वेद पढ़न तब लागा । पढ़त वेद तब भा अनुरागा ॥ कहे वेद पुरुष इक आही । हैं निरंकार रूप नहिं ताही ॥ शून्य माहिँ वहि जांत दिखावे । चितवन देह दृष्टि नहिं आवे ॥ स्वर्ग सीस पग आहि पताला । तेहिमत ब्रह्मा भौ मतवाला ॥ चतुरानन कहैं विष्णु बुझावा । आदिपुरुष मोहिं वेद लखावा ॥ पुनि ब्रह्मा शिवसों अस कहई । वेद मथन पुरुष एक अहई ॥

ब्रह्मावचन विष्णुप्रति

अहै पुरुष इक वेद बतावा । वेद कहे हम भेद न पावा ॥ कबीरवचन अथाप्रति

तब ब्रह्मा माता पहुँ आवा । करि प्रणाम तब टेके पावा ॥

ब्रह्मावचन अथाप्रति

हे माता मोहि वेद लखावा । सिरजनहार और बतलावा ॥

( ३० )

अनुरागसागर

छन्द

ब्रह्मा कहे जननी सुनौ, कहहु कन्त तुम्हार है ॥ कीजै कृपा जनि मोहि दुरावो, कहाँ पिता हमार है ॥

अद्यावचन ब्रह्माप्रति

कहे जननी सुनहु ब्रह्मा, कोउ नहिं जनक तुम्हार हो ॥ हमहिते भई सब उत्पति, हमहि सब कीन सम्हार हो ॥ २१ ॥

ब्रह्मावचन अद्याप्रति

सोरठा-ब्रह्मा कहे पुकार, सुनु जननी तैं चित्त दे ॥ कहत वेद निस्वार, पुरुष एक सौगुप्त है ॥ २२ ॥

अद्यावचन ब्रह्माप्रति

कहे अद्या सुनु ब्रह्मकुमारा । मोसे नहिं कोउ क्षण न्यारा ॥ स्वर्ग मृत्यु पाताल बनाई । सात समुन्दर हम निरमाई ॥

ब्रह्मावचन अद्याप्रति

मानो वचन तुमहि सब कीन्हा । प्रथमगुप्त तुम कसरखलीन्हा ॥ जबै वेद मोहि कहै बुझाई । अलखनिरंजन पुरुष बताई ॥ अब तुम आप बनो करतारा । प्रथम कहेन किया विचारा ॥ जो तुम वेद आप कथि राखा । तोकसतुम अलखनिरंजन भाखा आपे आप आप निरमाई । काहे न कथन कीन तुम माई ॥ अब मोसन तुम छल जनिकरहु । सांचे सांच सब कहि उच्चरहु ॥ जब ब्रह्मा यहि विधि हठाना । तब अध्यामन कीन्हतिवाना ॥

कबीरवचन धर्मदासप्रति

केहि विधि याहि कहैं समझाई । विधि नहिं मानत मोर बड़ाई ॥ जो यदि कहाँ निरंजन वाता । केहि विधि समझे यह विख्याता ॥ प्रथम कह्यो निरंजन राई । मोर दर्श काहु नहि पाई ॥ जबै जो यहीं अलख लखावों । केहि विधि कहिता को दिखलावों ॥

अनुरागसागर

( ३१ )

अद्यावचन ब्रह्माप्रति

असविचार पुत्रब्रह्मै समझावा । अलखनिरञ्जनहिंदरसदिखावा ॥

ब्रह्मावचन अद्याप्रति

ब्रह्मा कहे मोहि ठौर बतावो । आगा पीछा जनितुमलावो ॥ मैं नहिं मानौं तुम्हारी बाता । ऐसी बात न मोहि सुहाता ॥ प्रथम तुम मुहि दीनभुलावा । अब तुम कहो न दरसदिखावा ॥ तासु दरश न पैहो पूता । ऐसी बात कहो अजगूता ॥

छन्द

दरशदिखायतत्कालदीजै, मोहिनभरोसतुम्हारहो ॥ संशयनिवारयहिकालदीजै, कीजेनविलंबलगारहो ॥

अद्यावचन ब्रह्माप्रति

कह जननी सुनो ब्रह्मा, कहौं तोसों सत्तही ॥ सातस्वर्ग है माथ ताको, चरण पतालसमही ॥२२॥ सोरठा-लेहु पुष्प तुम हाथ, जो इच्छा तेहि दरशकी जाय नवाओ माथ, ब्रह्मा चले शिरनाइके ॥२३॥

जननी गुन्योवचन चितमाहीं । मोरि कहौ यह मानति नाही ॥ यह कहैं वेद दीन्ह उपदेशा । पै दरश ते नहिं पावै भेशा ॥ कह अष्टंगि सुनो रे वारा । अलखनिरञ्जन पिता तुम्हारा ॥ तासु दरश नहिं पैहै पूता । यह मैं वचन कहौं निजगूता ॥ ब्रह्मा सुनि व्याकुल है धावा । परसन सीस ध्यानहियलावा ॥ ब्रह्मा चले जननि सिर नाई । सीस परसि आवै तेही ठाई ॥ तुरतहि ब्रह्मा दीन्ह रिगारी । उत्तर दिशा बेगि चलि जाई ॥ आज्ञा मांगि विष्णु चलेबाला । पिता दरशको चले पताला ॥ इत उत चितयमहेशन डोला । सेवा करत कष्ट नहीं बोला ॥

विष्णुका पिताके खोजसे लौटकर पिताके घरतक न पहुँचनेका वृत्तांत मातासे कहना और माताका प्रसन्न होना

( ३२ )

अनुरागसागर

तेहिशिवमनअर्चितअभावा । सेवा करनजननि चितलावा॥ यहिविधिबहुतदिवसचलियऊ। माता सोचपुत्रकह कियऊ॥

विष्णुका पिताके खोजसे लौटकर पिताके चरणतक

न पहुँचनेका वृत्तान्त कहना

प्रथमविष्णुजननी ढिग आये । अपनी कथा कहि समुझाये॥ भेटचो नहि मोहि पगु ताता । विषज्वालास्यामल भौगाता॥ व्याकुल भयउतबैफिर आवा । पिता पगुदरश मैं नहि पावा॥ सुनिहगषित भइआदिकुमारी । लीन्हविष्णुकहैनिकटदुलारी॥ चूमेउ बदन सीस दिये हाथा । सत्य सत्य बोलउ सुतबाता॥

धर्मदासवचन कबीरप्रति

कहे धरमनि यह संशय बीती । साहब कहहु ब्रह्मकी रीती ॥ पितासीस तना परसन कीन्हा । किहोयनिरासपीछेपग पीन्हा॥

छन्द

गयउ ब्रह्मा सीस परसन, कथा ता दिनकी कही॥ भयो दिष्ट मेराव कि,नहि तासु दरशन तिनलही॥ यह बरनि सब कहो सतगुरु, एकएक विलीयके ॥ निजहास जानि परगासकीजे, धरहुनिजजनिगायके२३॥ सो०-प्रभु हम हैं तुव दास, जन्मकृतारथमोरिकरि॥ करहु वचन परगास, तेहि पीछे जो चरित भा ॥२४॥

पिताके खोजमें गये हुए ब्रह्माकी कथा । कबीरवचन धर्मदासप्रति

धरमदास मुहि अतिप्रिय अहहू । कहो संदेश परखि हटगहहू ॥ चलत ब्रह्म तब वार न लावा । पिता दरश कहैअतिमनभावा॥ तेहि स्थान पहुँचि गे जाई । नहि तहैरविशशि शून्यरहाई॥ बहुविधि अस्तुति करे बनायी । ज्योति प्रभावध्यानतहैलाई॥

ब्रह्माके लिये अद्याकी चिन्ता

अनुरागसागर

( ३३ )

ऐसे बहु दिन गये बितायी । नहि पायो ब्रह्मा दरशपितायी॥ शून्य ध्यानयुग चार गमावा । पिता दरश अजहुँ नहि पावा॥

ब्रह्मा के लिये अथाकी चिन्ता

ब्रह्मा तात दरश नहि पाई । शून्य ध्यान महाँ जुग बहु जाई॥ माता चिन्ता करत मनमाहाँ । जेठ पुत्र ब्रह्मा रह काहाँ ॥ किहि विधिरचना रचहुँ बनाई । ब्रह्मा आवै कौन उपाई ॥

गायत्री उत्पत्ति

उबटि शरीर मैल (न) गहिकाढी । पुत्री रूप कीन्ह रचिठाढी ॥ शक्ति अंशनिज ताहि मिलावा । नाम गायत्री ताहि धरावा ॥ गायत्री मातहि सिर नावा । चरणचूमिनिज सीस चढ़ावा ॥

गायत्री वचन अध्यामति

गायत्री विनवै कर जोरी । सुनु जननी यक विनती मोरी ॥ कौन काज मोहँ निरमाई । कहो वचन लेऊँ सीस चढ़ाई ॥

अद्यावचन गायत्री प्रति

कहे अद्या पुत्री सुनु वाता । ब्रह्मा आहि जेठहि तुव भ्राता ॥ पिता दरश कहँ गयो अकाशा । आनौ ताहि वचन प्रकाशा ॥ दरश तातकर वह नहि पावे । खोजत खोजत जन्म गमावे ॥ जौने विधिते इहँवा आई । करो जाय तुम तीन उपाई ॥

गायत्रीका ब्रह्मा के खोजमें जाना । कबीर वचन धर्मदास प्रति

चलि गायत्री मारग आई । जननी वचन प्रीति चितलाई ॥ चलत भई मारग सुकुमारी । जननी वचन ध्यान उर धारी ॥

छन्द

जाय देखो चतुरमुख कहँ, नाहि पलक उधारई ॥ कछुक दिन सो रही तहवों, बहरि युक्ति विचारई ॥ कौन विधि यह जागि है, अब करौँ कौन उपायहो ॥ मन गुनित सो चबहुत विधि, ध्यान जननी लायहो र४॥

ब्रह्माको जगानेके लिये अद्याका गायत्रीको युक्ति बताना

( ३४ )

अनुरागसागर

ब्रह्माको जगानेके लिये अधाका गायत्रीको युक्ति बताना

सो०-अद्या आयसु पाइ, गायत्री तब ध्यान महँ ॥ निज कर परसेउ जाय,ब्रह्मा तबहीं जागिहै ॥२४॥ गायत्री पुनि कीन्ह तैसी । माता युक्ति बताई जैसी ॥ गायत्री तब चित्त लगाई । चरणकमल कहँ परसेउ जाई॥

ब्रह्माका जागकर गायत्रीपर क्रोध करना

ब्रह्मा जाग ध्यान मन डोला ॥ व्याकुल भयो वचन तब बोला ॥ कवन अहै पापिन अपराधी । कहा छुड़ायहु मोरि समाधी ॥ शाप देहुँ तोकहँ मैं जानी । पिताध्यानमोहिखण्डचोआनी

गायत्री वचन ब्रह्माप्रति

कहि गायत्री मोहिन पापा । बृक्षि लेहु तब देहहु शापा ॥ कहाँ तोहिसो सांची बाता । तोहि लेन पठयी तुव माता ॥ चलहु वेगि जननिलावहुबारे । तुम विन रचना को विस्तारे ॥

ब्रह्मावचन गायत्रीप्रति

ब्रह्मा कहे कौन विधि जाऊँ । पितादरश अजहुँ नहि पाऊँ ॥

गायत्रीवचन ब्रह्माप्रति

गायत्री कह दरशन पैहो । बेगि चलहु नहि तो पछते हो ॥

ब्रह्माका गायत्रीको साक्षी देनेको कहना और गायत्रीका

ब्रह्मासे रति करनेकी बात कहना

ब्रह्मा कहै देहु तुम साखी । परस्यो सीस देख मैं आंखी ॥ ऐसे कहो मातु समुझायी । तोतुम्हरे सङ्ग हम चलिजायी ॥

गायत्रीवचन ब्रह्माप्रति

कह गायत्री सुन श्रुति धारी । हम नहीं मिथ्या बचन उचारी ॥ जो मम स्वारथ पुरवहु भाई । तो हम मिथ्या कहब बनाई ॥

ब्रह्मावचन गायत्रीप्रति

कह ब्रह्मा नहि लखी कहानी । कहौँ बुँझाय प्रगटकी बानी ॥

सावित्री उत्पत्तिकी कथा

अनुरागसागर

( ३५ )

गायत्री वचन

कह गायत्री देहु रति मोही । तो कह झूठ जित्ताऊं तोही ॥

कबीरवचन धर्मदासप्रति

गायत्री कहै है यह स्वारथ । जानि कहौं मैं पुन परमारथ ॥ सुनि ब्रह्मा चित करे विचारा । अबका यत्न करहुँ इहिवारा ॥

छन्द

जो विमुख या कह करौं अब तो नहीं बन आवई ॥ साखि तो यह देय नहीं जननि मोहि लजावई ॥ यहाँ नाहि पिता पायो भयो न एको काज हो ॥ पाप सोचत नहि बने अब करौं रतिविधि साजहो २५ सो०-कियो भोगरतिरंग, विसरन्यो सो मनदर्शका दोउ कहैं बढयो उमंग, छलमति बुद्धिप्रकाशकिले २६ ॥

सावित्री उत्पत्तिकी कथा

कह ब्रह्मा चल जननी पास । तब गायत्री वचन प्रकाशा ॥ औरो करौ युक्ति इक ठानी । दूसरी साखि लेहु उत्पानी ॥ ब्रह्मा कहे भली है बाता । करहु सोई जेहि मानै माता ॥ तब गायत्री यतन विचारा । देहि मैल गहि कीन्ह नियारा ॥ कन्यारचि निज अंशमिलावा । नाम सावित्री तासु धरावा ॥ गायत्री तिहि कह समुझावा । कहियो दरशब्रह्म पितु पावा ॥ कह सावित्रीहम नहि जानी । झूठ साखि दे आपनि दानी ॥ यह सुनिदोउकहैंचिन्ता व्यापा । यह तौ भयो कठिन संतापा ॥ गायत्री बहु विधि समुझाई । सावित्री के मन नहि आयी ॥ पुनि गायत्री कहा बुझाई । तब सावित्री वचन सुनाई ॥ ब्रह्मा कर मोसों रति साजा । तो मैं झूठ कहौं यहि काजा ॥ गायत्री ब्रह्महि समुझावा । दै रति या कहैं काज बनावा ॥ ब्रह्मा रति सावित्रीहि दीन्हा । पापमोट आपन शिर लीन्हा ॥

ब्रह्माका गायत्री और सावित्रीके साथ माताके पास पहुँचना और सबका शाप पाना

( ३६ )

अनुरागसागर

सावित्री कस दूसर नाऊं । कहि पुहुपावति वचन सुनाऊं॥ तीनों मिलिके चलि भे तहवां । कन्या आदिकुमारी जहवां ॥

ब्रह्माका गायत्री और सावित्री के साथ माताके पास पहुँचना

और सबका शाप पाना

करि प्रणाम सन्मुख रहे जाईं । माता सब पूछी कुशलार्ह ॥

अद्यावचन ब्रह्माप्रति

कह ब्रह्मा पितु दर्शन पाये । दूसरि नारि कहाँसे लाये ॥

ब्रह्मावचन

कह ब्रह्मा दोऊ हैं साखी । परस्यो सीस देव इन आंखी॥

अद्यावचन गायत्रीप्रति

तब माता बूझे अनुसारी । कहु गायत्री वचन विचारी॥

तुम देखा इन दर्शन पावा । कहा सत्य दर्शन परभावा ॥

गायत्रीवचन

तब गायत्री वचन सुनावा । ब्रह्मा दर्श सीस पितु पावा ॥

मैं देखा इन परसेउ शीशा । ब्रह्महि मिले देव जगदीशा ॥

छन्द

लेह पुहुप परसेउ शीशपितु इन दृढमें देखत रही॥

जल दार पुहुप चढ़ाय दीन्ह हे जननि यह है सही ॥

पुहुपते पुहुपावती भयी प्रगट ताही ठामते ॥

इनहु दर्शन लह्यो पितुको पूछहु इहि वामते ॥२६॥

हे जननी यह है सही तुम पूछि लो पुहुपावती ॥

सबही सांच मैं तोसों कहूँ नहीं झूठहै एको रती ॥

अद्यावचन पुहुपावतीप्रति

माता कह पुहुपावतीसी कहो सत्य हि मो सना ॥

जो चढ़े सीसाहि पिताके तुम वचन बोलहु ततखना॥

१ यह छन्द पुरानी प्रतियोंमें नहीं है

अद्याका ब्रह्माको शाप देना

अनुरागसागर

( ३७ )

सो०-कहु पुहुपावति मोहि, दरश कथानिरवारके। यह मैं पूछों तोहि, किम ब्रह्मादरशन किये॥२७॥

सावित्री वचन

पुहुपावंती वचन तब बोली । मातासत्य वचन नहीं डोली॥ दर्शन सीस लह्यो चतुरानन । चढ़े सीसयह धर निश्चय मन॥

कबीरवचन धर्मदास प्रति

साख सुनत अद्या अकुलानी । भा अचरज यह मर्म न जानी॥

अद्याकी चिंता

अलखनिरंजन अस प्रण भार्खी । मोकहैं कोउ न देखै आंखी ॥ ये तीनहुँ कस कहहिँ लबारी । अलखनिरंजन कहहु सम्हारी॥ ध्यान कीन्ह अछुंगी तिहि क्षण । ध्यानमहिँ अस कहा निरंजन ॥

निरंजन वचन

ब्रह्मा मोर दरश नहि पाया । झूठिसाखिइन आन दिवाया॥ तीनों मिथ्या कहा बनाई । जनि मानहु यह है लबराई॥

अद्याका ब्रह्माको शाप देना

यह सुनि माता कीन्हे दापा । ब्रह्मा कहैं तब दीन्हो शापा ॥ पूजा तोरि करै कोई नाहीं । जो मिथ्या बोलेउ मनमाहीं ॥ इक मिथ्या अरु अकरम कीन्हा । नरक मोट अपने शिर लीन्हा॥ आगे है जो शाख तुम्हारी । मिथ्या पाप करहिँ बहुभारी॥ प्रगट करहिँ बहु नेम अपारा । अन्तर मैल पाप विस्तारा ॥ विष्णु भक्तोंसे करहिँ हँकारा । तांते परिहैं नरक मँझारा ॥ कथा पुराण औरहिँ समुझे हैं । चाल बिहून आपन दुख पैहैं ॥

१ पुराने ग्रन्थोंमें यह चौपाई इस प्रकार है—

सावित्री अस वचन उचारी । मानो निश्चय वचन हमारी

नं. २ कबीरसागर ३

अद्याका गायत्री को शाप देना

( ३८ )

अनुरागसागर

उनसे और सुनैँ जो ज्ञाना । करिसो भक्ति कहाँ परमाना॥ और देवको अंश लखैहैं । औरन निन्द काल मुख जेहै॥ देवन पूजा बहु विधि लैहैं । दछिना कारण गला कटै हैं॥ जा कहा शिष्य करै पुनि जाई । परमारथ तिहि नहिं लखायी॥ परमारथके निकट न जेहैं । स्वारथ अर्थ सबै समुझैहैं॥ आप स्वारथी ज्ञान सुनैहैं । आपनि पूजा जगत दृढ़ै हैं॥ आप ऊंच औरहि कहै छोटा । ब्रह्मा तोर सखा होइ खोटा ॥

कबीर वचन धर्मदासप्रति

जब माता अस कीन्ह प्रहारा । ब्रह्मा मूर्छित महीकर धारा ॥

अद्याकागायत्रीको शाप देना

गायत्री जान्यो तेहि वारा । हुए है तोर पंच भरतारा ॥ गायत्री तोर होई वृषभ भर्तारि । सांत पांच और बहुत पसारि॥ धर औतार अखज तुम खायी । कहा जानियह दीन्ही सारखी॥ निजस्वारथ तुम मिथ्या भारी । कहा जानियह दीन्ही सारखी॥ मानि शाप गायत्री लीन्ही । सावित्रिहि तबचितवन कीन्ही॥

अद्याका सावित्री को शाप देना

पुढुपावति निजमान धरायेहु । मिथ्या कहनिजजन्मनशायेहु॥ सुनहुपुष्पावतितुम्हरोविश्वासा । नहिं पूजिहैं तुम्हसे कछु आशा॥ होय कुगंध ठौर तव बासा । भुगतहु नरक कामगहि आशा॥ जो तोहि सींच लगावे जानी । ताकर होय वंशकी हानी ॥ अब तुम जाय धरौ औतारा । कयोडा केतकी नाम तुम्हारा॥

कबीर वचन धर्मदासप्रति छन्द

भये शापवश तीनों विकलमति, हीनछीन कुकर्मते॥ यह काल कलाप्रचंडकामिनि, डस्यो सब कहैं चर्मते ॥

शाप देने पर अद्याका पश्चात्ताप और निरंजनके डरसे डरना और शाप पाना, निडर होना

अवुरागसागर

( ३९ )

ब्रह्मादि शिवसनकादिनारदको उन बचि भागहो ॥ सुनुधरमनिविरलाबच शब्द सतसो लागि हो ॥२८॥ सो-० सत्य शब्द परताप, कालकला व्यापै नहीं ॥ निकट न आवै पाप, मनवच कर्म जो पदगहे ॥२९॥

शाप देदेने पर अधाका पश्चाताप और निरंजनके डरसे डरना । छन्द

शाप तीनोंको दैलियो मन माहीं तब पछतावई ॥ कस करहि मोहि निरंजनापल छमा मोहि नआवई ॥

निरंजनका अधाको शाप देना

आकाशबानी तबै भयी यहू काह कीन भवानिया ॥ उत्पत्तिकारणतोहिपठाई कहा चरित यह ठानिया ॥ सो-० नीचहि ऊच सिताय, बदल मोहि सोपावई ॥ द्वापर युग जब आय तुमहिं पञ्च भर्तार हो ॥३०॥

अधाका निडर होना । कबीर वचन धर्मदासप्रति

शाप ओयल जब सुनेउ भवानी । मनसन गुने कहा नहि बानी ॥ ओयल प्रभाव शाप हम पाया । अब कहा करब निरंजनराया ॥ तोरे वस परी हम आई । जस चाहौ तस करौ मितार्ई ॥

विष्णुका गौरसे श्याम होने का कारण अधावचन विष्णुप्रति

पुनि कहि माता विष्णु दुलारा । सुनहु पुत्र इकवचन हमारा ॥ सत्य सत्य तुम कहौ बुझाई । पितुपद परसन जब गै भाई ॥ प्रथमहु तो तुम गौर शरीरा । कारण कौन श्याम भये धीरा ॥

विष्णुवचन अधा प्रति

आज्ञा पाय हम तत्काला । पितुपद परसन चले पताला ॥ अक्षत पुहुप लीन्ह करमाहां । चले पताल पंथ मग जाहां ॥ पहुँचि शेष नाग पहुँ गयऊ । विषके तेज हम अलसयऊ ॥

अद्याका विष्णुकी ज्योतिका दर्शन करना

( ४० )

अनुरागसागर

भयो श्याम विषतेज समावा । भइ अवाज अस वचन सुनावा ॥ अहो विष्णु माता पहुँ जाई । वचन सत्य कहियो समुझाई ॥ सतयुग त्रेता जैसे जबही । द्वापर है चौथा पद तबही ॥ तब तुम होहु कृष्ण अवतारा । लैहौ ओयलसो कही विचारा ॥ नाथ हु नाग कलिन्दी जाई । अब तुम जाहु विलंब न लाई ॥ ऊंच होइके नीच सतावे । ताकर ओयल मोहिसो पावे ॥ जो जिव देई पीर पुनि काहू । हम पुनि ओयल दिखावे ताहू ॥ पहुँचे हम तब ही तुव पास । कीन्हैउ सत्य बचन परकाशा ॥ भेटउ नाहि मोहि पद ताता । विषज्वाला साँवल भो गाता ॥ व्याकुल भयो तवै फिर आयो । पितु पद दर्शन मैं नहि पायो ॥

अवाका विष्णुको ज्योतिका दर्शन कराना

इतना सुनि हर्षित भइ माई । लीन्ह विष्णु कहैं गोद उठाई ॥ पुनि अस कहेउ आदि भवानी । अब सुनहु पुत्रप्रियममबानी ॥ देख पुत्र तोहि पिता भिटावों । तोरे मन कर धोख मिटावों ॥ प्रथमहि ज्ञान दृष्टिसों देखो । मोर वचन निजहृदय परेखो ॥ मनस्वरूप करता कहैं जानो । मनते दूजा और न मानो ॥ स्वर्ग पताल दौर मन केरा । मन अस्थिर मन अहै अनेरा ॥ क्षणमहैं कला अनन्त दिखावे । मनकहैं देख कोइ नहि पावे ॥ निराकार मनहीको कहिये । मनकी आशा दिवस निशि रहिये ॥ देखहु पलटि शून्यमह जोती । जहवां झिलमिलझालर होती ॥ फेरहु श्वास गगन कह धायो । मार्ग अकाशहि ध्यान लगायो ॥ जैसे माता कहि समुझावा । तैसे विष्णु ध्यान मन लावा ॥

छन्द

पेठि गुंफा ध्यान कीन्हो श्वास संयम लायके ॥ पवन धूँका दियो जबते गगन गरज्यो आयके ॥

ज्योतिदर्शन रहस्य

अवुरागसागर

( ४१ )

बाजासुनततबमगनभापुनिकीन्हमनकसख्यालहो ॥ शून्यस्वेतपीतसब्जलालदियायरंगजगालहो ॥३०॥ सो०-ताहपीछे धर्मदास, मनपनि आपदिखायल ॥ कीन्ह ज्योति परकास, देखि विष्णु हरित भये३०॥ मातहि नायो शीश, बहु अधीन पुनि विष्णुभा ॥ मैं देखा जगदीश, हे जननी परसाद तुव ॥ ३१ ॥

धर्मदास वचन

धर्मदास गहि टेके पाया । हे साहिबइकसंशय आया ॥ कन्या मनको ध्यान बतावा । सो यह सकल जीव भरमावा॥

सदगुरु वचन

धर्मदास यह काल स्वभाऊ । पुरुष भेद विष्णु नहीं पाऊ ॥ कामिनिकी यह देखहु बाजी । अमृतगोय दियो विष साजी ॥ जात काल दूजा जनिजानहु । निरखि धर्म सत्यहिं पुरआनहु ॥ प्रगट सु तोहि कहो ससुझाई । धर्मदास परखहु चितलाई ॥ जब परगट तस गुप्त सुभाऊ । जोरह हृदय सो बाहर आऊ ॥ जब दीपक बारे नर लोई । देखहु ज्योति सुभाव विलोई ॥ देखत ज्योति पतंग हुलासा । प्रीति जान आवै तिहिपासा ॥ परसत होवे भसम पतंगा । अनजाने जरि परहि मतंगा ॥ ज्योतिस्वरूपकाल अस आही । कठिनकाल यह छांडत नाही ॥ कोटि विष्णु औतारहि खाया । ब्रह्मा रुद्रहि खाय नचाया ॥ कौन विपति जीवनकी कहऊँ । परखि वचन निज सहजहि रहऊँ ॥ लाख जीव वह नित्यहि खाई । असविकरालसोकालकसाई ॥

धर्मदास वचन

धर्मदास कह सुनहुँ गुसाई । मोरे चित संशय असआई ॥ अष्टंगीहि पुरुष उत्पानी । जिहिविधि उपजी सो मैं जानी ॥

मायाका विष्णुको सर्व प्रथम बनाना

( ४२ )

अनुरागसागर

पुनि वहि मास लीन्ह धमराई । पुरुष प्रताप सु बाहर आई ॥ सो अछंगीहि असछल कीन्ह । गोइसि पुरुष प्रगटयम कीन्ह ॥ पुरुष भेद नहि सुनन बतावा । कालनिरञ्जन ध्यान करावा ॥ यह कस चरित कीन्ह अछंगी । ताजा पुरुष भइकाल किसंगी ॥

सद्गुरु वचन

धर्म सुनहु जन नारि सुभाऊ । अब तुहि प्रगटवरणिसमझाऊ ॥ होय पुत्री जेहि घर माहीं । अनेक जतन परितोषै ताहीं ॥ वन्न भक्ष सुख सेज निवासा । घरबाहर सब तिहि विश्वासा ॥ यज्ञ कराय देय पितु माता । बिदाकीन्हहितप्रीतिसों ताता ॥ गयी सुता जब स्वामी गेहा । रात्या तासु संग गुण नेहा ॥ माता पिता सबै बिसरावा । धर्मदास अस नारि स्वभावा ॥ ताते अद्या भई बिगानी । काल अंग है रही भवानी ॥ ताते पुरुष प्रगटने लायी । कालरूप विष्णुहि दिखलायी ॥

धर्मदासवचन कबीर प्रति

हे साहब यह जान्यो भेदा । अब आगेका करहु उछेदा ॥

कबीर वचन धर्मदास प्रति

पुनि माता कहि विष्णु दुलारा । मरद्यो मान जेठ निजबारा ॥ अहो विष्णु तुम लेहु अशीशा । सब देवनमें तुमहीं ईशा ॥ जो इच्छा तुम चितमें धरिहौं । सो तब तोर काज मैं करिहौं ॥

मायाका विष्णुको सर्वप्रधान बनाना

प्रथम पुत्रब्रह्म दुरि गयऊ । अकरमझूठिताहि प्रिय भयऊ ॥ देवन श्रेष्ठ तुमहि कहैं मातहि । तुम्हारी पूजा सब कोई ठानहि ॥

कबीरवचन धर्मदासप्रति

कृपा वचन अस माते भाखा । सबते श्रेष्ठ विणुकह राखा ॥ माता गयी रुद्रके पास । देख रुद्र अति भये हुलासा ॥

अद्याका महेशको वरदान देना

अनुरागसागर

( ४३ )

अद्याका महेशकी बरदान देना

पुनि लहुरा कहैं पूछे माता । तुम शिव कहो हृदयकी वाता ॥ माँगहु जो तुम्हरे चित भावे । सो तोहि देख माता फुरमावे ॥ दोउ पुत्रन कहैं मात हदावा । माँग महेश जो मनभावा ॥

महेशवचन

जोरि पानि शिवकहबे लीन्हा । देहु जननि जो आज्ञा कीन्हा ॥ कबहिं न विनसे मेरी देही । हे माता मागों वर एही ॥ हे जननी यह कीजै दया । कबहु न विनशै मेरी काया ॥

अद्यावचन

कह अछंगी अस नहीं होई । दूसरा अमर भयो नहिंकोई ॥ करहु योग तप पवन सनेहा । रहै चार युग तुम्हरी देहा ॥ जौलौं पृथ्वी अकाश सनेही । कबहु न विनशै तुम्हरी देही ॥

धर्मदासवचन

धर्मदास विनती चित लाई । ज्ञानि मोहि कहो समुझाई ॥ यह तो सकल भेद हम पायी । अब ब्रह्माको कहो उथायी ॥ अद्या शाप ताहि कहैं दीन्हा । तेहि पीछे ब्रह्मा कस कीन्हा ॥

कबीर वचन

विष्णु महेश जबै वर पाये । भये आनन्द अतिहि हरषाये ॥ दोनो जने हरष मन कीन्हा । ब्रह्मा भयो मान मद हीना ॥ धर्मदास मैं सब कुछ जानों । भिन्न भिन्न कर प्रगट बखानों ॥

शाप पानेके कारण दुःखित हो ब्रह्मा विष्णुके पास जाकर

अपना दुःख कहना और विष्णुका उसे आश्वासन देना

ब्रह्मा मनमें भयो उदासा । तब चलि गयो विष्णुके पास ॥

ब्रह्मावचन विष्णुप्रति

जाय विष्णुसे बिन्ती ठाना । तुम हो बंधु देव परधाना ॥ तुम पर माता भई दयाला । शाप विवश तुम भये बिहाला ॥

( ४४ )

अनुरागसागर

निज करनी बल पायेहो भाई । किहि विधि दोष लगाऊँ माई ॥ अब अस जतन करोहो भ्राता । चले परिवारे वचन रहै माता ॥

विष्णुवचन

कहे विष्णु छोड़ो मन भंगा । मैं करिहौं सेवकाई संगा ॥ तुम जेठे हम लहुरे भाई । चित संशय सब देहु बहाई ॥ जो कोइ होवे भक्त हमारा । सो सेवै तुम्हारो परिवारा ॥

छन्द

जगमाहि एस दिढाई हौं फलपुन्य आशा जोयहो ॥ यज्ञ धर्म रु करे पूजा द्विज बिना नहिं होय हो ॥ जो करे सेवा द्विजनकी तेहि महापुण्य प्रभावहो ॥ सो जीवमोकहै अधिकप्यारेराखिहौं निज ठाँवहो ॥ ३१

कबीरवचन धर्मदासप्रति

सो ०-ब्रह्मा भये अनंद, जबहि विष्णु असमापेऊ ॥ मेटेउ चितकर दंड, सखा मोर सब सुखीभी ॥ ३२ ॥

कालप्रपंच

देखहु धर्मनि काल पसारा । इन ठग ठग्यो सकल संसारा ॥ आशा दै जीवन बिलपावै । जन्म जन्म पुनि ताहि सतावै ॥ बलि हरिचंद बेतु बइरोचन । कुंती सुत औरौ महिसोचन ॥ ये सब त्यागी दानि नरेशा । इन कहैं ले राखे केहि देशा ॥ जस गंजत इन सबकी कीन्ह। सो जग जानेकाल अधीना ॥ जानत है जग होय न शुद्धी । कालअमरबलसबकी हरबुद्धी ॥ मन तरंगमें जीव भुलाना । निजघर उलटिनचीन्ह अजाना ॥

धर्मदास वचन

धर्मदास कह सुनो गुसाई । तबकी कथा मोहि समुझाई ॥ तुम प्रसाद जमको छल चीन्हा । निश्चय तुम्हरे पदचित दीन्ह ॥