कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 153, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ेंअनुरागसागर
( २६ )
कबीरवचन धर्मदास प्रति
विहैंसी कन्या सुन अस वाता । इक मति होय दोई रंगराता॥ रहस वचन बोली मृदु बानी । नारिनीचबुधिरतिविधिठानी॥ रहसवचन सुनि धरम हरषाना । भोग करनको मनमें आना॥
बुन्द
मन नहिं कन्या कहती असचरितकीन्ह निरंजना॥ नख घातकियेभगद्वारततछिण, घाटउत्पतिगंजना॥ नखं रेषशो नितचल्या, तिहुँको खब खासआरंभनी॥ आदिउत्पत्तिमुनहु धर्मनि, कोउ नहिं जानत जम मनी॥ त्रियावार कीन्ही रति तबै, भये ब्रह्मा विष्णु महेशहो॥ जेठे विधि विष्णु लघु तिहि, तीज शंभु शेष हो॥१८॥ सोरठा-उत्पति आदिप्रकाश, यहि विधि तेहि प्रसंगभो॥ कीन्हो भोगविलास, इकमनि कन्या काल है॥१८॥
भवसागरकी रचना
तेहि पीछे ऐसा भो लेखा । धर्मदास तुम करौ विवेका॥ निरंजनवचन अध्याप्रति
अग्निपवनजलमहि आकाशा । कूर्म उदरते भयो प्रकाशा॥ पाँचौ अंस ताहि सन लीन्हा । गुण तीनों सीसनसों कीन्हा॥ यहि विधि भयेतत्त्वगुण तीनों । धर्मराज तब रचना कीनों॥
कबीर वचन धर्मदास प्रति
गुणतसम कर देविहि दीन्हा । आपन अंश उत्पने कीन्हा॥ बुन्द तीन कन्या भग डारा । तासँग तीनों अंग सुधारा॥
? यह तो पुरानी प्रतियोंमें ऐसाही है किन्तु नवीन प्रतियोंमें उपर्युक्त दोनों पंक्ति नहीं हैं जो विचारपूर्वक प्रसंगोंके पढ़नेसे ठीक नहीं जान पड़ता ।