भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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( ४० )

अनुरागसागर

भयो श्याम विषतेज समावा । भइ अवाज अस वचन सुनावा ॥ अहो विष्णु माता पहुँ जाई । वचन सत्य कहियो समुझाई ॥ सतयुग त्रेता जैसे जबही । द्वापर है चौथा पद तबही ॥ तब तुम होहु कृष्ण अवतारा । लैहौ ओयलसो कही विचारा ॥ नाथ हु नाग कलिन्दी जाई । अब तुम जाहु विलंब न लाई ॥ ऊंच होइके नीच सतावे । ताकर ओयल मोहिसो पावे ॥ जो जिव देई पीर पुनि काहू । हम पुनि ओयल दिखावे ताहू ॥ पहुँचे हम तब ही तुव पास । कीन्हैउ सत्य बचन परकाशा ॥ भेटउ नाहि मोहि पद ताता । विषज्वाला साँवल भो गाता ॥ व्याकुल भयो तवै फिर आयो । पितु पद दर्शन मैं नहि पायो ॥

अवाका विष्णुको ज्योतिका दर्शन कराना

इतना सुनि हर्षित भइ माई । लीन्ह विष्णु कहैं गोद उठाई ॥ पुनि अस कहेउ आदि भवानी । अब सुनहु पुत्रप्रियममबानी ॥ देख पुत्र तोहि पिता भिटावों । तोरे मन कर धोख मिटावों ॥ प्रथमहि ज्ञान दृष्टिसों देखो । मोर वचन निजहृदय परेखो ॥ मनस्वरूप करता कहैं जानो । मनते दूजा और न मानो ॥ स्वर्ग पताल दौर मन केरा । मन अस्थिर मन अहै अनेरा ॥ क्षणमहैं कला अनन्त दिखावे । मनकहैं देख कोइ नहि पावे ॥ निराकार मनहीको कहिये । मनकी आशा दिवस निशि रहिये ॥ देखहु पलटि शून्यमह जोती । जहवां झिलमिलझालर होती ॥ फेरहु श्वास गगन कह धायो । मार्ग अकाशहि ध्यान लगायो ॥ जैसे माता कहि समुझावा । तैसे विष्णु ध्यान मन लावा ॥

छन्द

पेठि गुंफा ध्यान कीन्हो श्वास संयम लायके ॥ पवन धूँका दियो जबते गगन गरज्यो आयके ॥