भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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( २८ )

अनुरागसागर

सोरठा-गये सिंधुके पास, भये ठाढ़ तीनों जाने ॥ युक्तिमथनपरकास, एक एकको निरखही ॥२१॥

प्रथमवार सिन्धु मथन

तीनों कीन्ह मथन तब जाई । तीन वस्तु तीनों जन पाई ॥ ब्रह्मा वेद तेज तेहि छोटा । लहुरा तासुमिलेविष खोटा ॥ भेटि वस्तु त्रय तीनों भाई । चलिभये हर्षकहत जहँमाई ॥ मातापहँ आये त्रय वारा । निजनिजवस्तुप्रगट अनुसारा ॥ माता आज्ञा कीन्ह प्रकाशा । राखुवस्तुतुमनिजनिज पास।

द्वितीय बार सिन्धुमथन

पुनितुम मथहु सिन्धु कहे जाई । जो जेहि मिले लेख सो भाई ॥ कीन्ह चरित अस आदि भवानी । कन्या तीन कीन्ह उत्पानी ॥ कन्या तीन उत्पान्यो जबहीं । अंसवारि मँ नायो सबहीं ॥ सब माताको आगे कीन्हा । माता बाँटि तिन्हन कहँ दीन्हा ॥ पठयो सिंधु महि पुनि ताही । त्रय सुत मर्मसो जानत नाहीं ॥ पुनि तिन मथन सिंधुको कीन्हा । भेटयो कन्या हाँपित है लीन्हा ॥ कन्या तीनहु लीन्हे साथ। औ जननी कहँ नायहु माथा ॥ माता कहे सुनहु सुत मोरा । यह तो काज भये सब तोरा ॥ एक एक बाँटि तीनहुको दीन्हा । काहु भोग कस आज्ञा कीन्हा ॥ सावित्री ब्रह्मा तुम लेख । है लक्ष्मी विष्णु कहँ देख ॥ पारवती शंकर कहँ दीन्ही । ऐसी माता आज्ञा कीन्ही ॥ तीनउ जन लीन्हीं सिरनाई । दीन्ह अध्याजस भाग लगाई ॥ पाई कामिनि भये अनन्दा । जस चकोर पाये निशिचंदा ॥ काम बसी भए तीनों भाई । देव दैत दोनों उपजाई ॥ धर्मदास परखो यह बात। नारी भयी हती सो माता ॥ माता बहुरि कहँ समझाई । अब फिर सिंधु मथो तुम भाई ॥ जो जेहि मिलै लेहुसो जाई । अब जनिकरो विलंब तुम भाई ॥