भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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अनुरागसागर

( ३५ )

गायत्री वचन

कह गायत्री देहु रति मोही । तो कह झूठ जित्ताऊं तोही ॥

कबीरवचन धर्मदासप्रति

गायत्री कहै है यह स्वारथ । जानि कहौं मैं पुन परमारथ ॥ सुनि ब्रह्मा चित करे विचारा । अबका यत्न करहुँ इहिवारा ॥

छन्द

जो विमुख या कह करौं अब तो नहीं बन आवई ॥ साखि तो यह देय नहीं जननि मोहि लजावई ॥ यहाँ नाहि पिता पायो भयो न एको काज हो ॥ पाप सोचत नहि बने अब करौं रतिविधि साजहो २५ सो०-कियो भोगरतिरंग, विसरन्यो सो मनदर्शका दोउ कहैं बढयो उमंग, छलमति बुद्धिप्रकाशकिले २६ ॥

सावित्री उत्पत्तिकी कथा

कह ब्रह्मा चल जननी पास । तब गायत्री वचन प्रकाशा ॥ औरो करौ युक्ति इक ठानी । दूसरी साखि लेहु उत्पानी ॥ ब्रह्मा कहे भली है बाता । करहु सोई जेहि मानै माता ॥ तब गायत्री यतन विचारा । देहि मैल गहि कीन्ह नियारा ॥ कन्यारचि निज अंशमिलावा । नाम सावित्री तासु धरावा ॥ गायत्री तिहि कह समुझावा । कहियो दरशब्रह्म पितु पावा ॥ कह सावित्रीहम नहि जानी । झूठ साखि दे आपनि दानी ॥ यह सुनिदोउकहैंचिन्ता व्यापा । यह तौ भयो कठिन संतापा ॥ गायत्री बहु विधि समुझाई । सावित्री के मन नहि आयी ॥ पुनि गायत्री कहा बुझाई । तब सावित्री वचन सुनाई ॥ ब्रह्मा कर मोसों रति साजा । तो मैं झूठ कहौं यहि काजा ॥ गायत्री ब्रह्महि समुझावा । दै रति या कहैं काज बनावा ॥ ब्रह्मा रति सावित्रीहि दीन्हा । पापमोट आपन शिर लीन्हा ॥

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