भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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अनुरागसागर

( ३७ )

सो०-कहु पुहुपावति मोहि, दरश कथानिरवारके। यह मैं पूछों तोहि, किम ब्रह्मादरशन किये॥२७॥

सावित्री वचन

पुहुपावंती वचन तब बोली । मातासत्य वचन नहीं डोली॥ दर्शन सीस लह्यो चतुरानन । चढ़े सीसयह धर निश्चय मन॥

कबीरवचन धर्मदास प्रति

साख सुनत अद्या अकुलानी । भा अचरज यह मर्म न जानी॥

अद्याकी चिंता

अलखनिरंजन अस प्रण भार्खी । मोकहैं कोउ न देखै आंखी ॥ ये तीनहुँ कस कहहिँ लबारी । अलखनिरंजन कहहु सम्हारी॥ ध्यान कीन्ह अछुंगी तिहि क्षण । ध्यानमहिँ अस कहा निरंजन ॥

निरंजन वचन

ब्रह्मा मोर दरश नहि पाया । झूठिसाखिइन आन दिवाया॥ तीनों मिथ्या कहा बनाई । जनि मानहु यह है लबराई॥

अद्याका ब्रह्माको शाप देना

यह सुनि माता कीन्हे दापा । ब्रह्मा कहैं तब दीन्हो शापा ॥ पूजा तोरि करै कोई नाहीं । जो मिथ्या बोलेउ मनमाहीं ॥ इक मिथ्या अरु अकरम कीन्हा । नरक मोट अपने शिर लीन्हा॥ आगे है जो शाख तुम्हारी । मिथ्या पाप करहिँ बहुभारी॥ प्रगट करहिँ बहु नेम अपारा । अन्तर मैल पाप विस्तारा ॥ विष्णु भक्तोंसे करहिँ हँकारा । तांते परिहैं नरक मँझारा ॥ कथा पुराण औरहिँ समुझे हैं । चाल बिहून आपन दुख पैहैं ॥

१ पुराने ग्रन्थोंमें यह चौपाई इस प्रकार है—

सावित्री अस वचन उचारी । मानो निश्चय वचन हमारी

नं. २ कबीरसागर ३