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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

राजाका पहलेके हंसोंका हाल पूछना और सद्गुरुका उत्तर देना

बोधसागर

( ३७ )

सतगुरु वचन

चार गुरु को साज मँगाओ । चार सवा सौ पान लै आओ॥ चार सवा सेर कन्द मँगाओ । आठ अंश नारियल लै आओ॥ चार माला अरु लोटा चारो । सतगुरु आगे लाकर धारो ॥ चार थाली चार गादी कीजे । चार चँदोवा ताने लीजे ॥ चार कलस जल भरि धरवाओ । तब सतगुरुके आगे आओ ॥ सब यह साज आगे धरि दीन्हा । तब सतगुरुसे विन्ती कीन्हा ॥

राजा वचन

मैं हूँ जीव करम बहु कीना । कैसे यमसों करिहो भीना ॥ गिनत गिनत नहिं आवे चीना । बारम्बार मैं औगुन कीना ॥ ऐसा करम किया मैं भारी । कैसे यमसे लेहो उबारी ॥ एक बात गुरु कहौ विचारी । मोसम पतित आगे कोइ तारी॥ तब सतगुरु बहुत विहँसाने । फिर राजासों निरणय ठाने ॥

सतगुरु वचन

सतगुरु सत्यसुकृत मम नाऊँ । जाइ मथुरामें धारेउँ पाऊँ ॥ खेमसरी ग्वालिनी उबारी । बहुत जीव लै लोक सिधारी ॥ द्वादश पहुँचे पुरुष हजुरी । और हंस द्रौपन मँझुरी ॥ त्रेता युगे मुनिन्दर नाऊँ । नगर अयोध्या धारे पाऊँ ॥ हंस बयालिस लीन्हा लारा । पहुँचे तहाँ पुरुष दरबारा ॥ और हंस द्रौप महाँ गयऊँ । जिन जैसी जिव देह बनयऊँ ॥ अब द्वापरका कहुँ विचारा । नरहर राजका किया उधारा ॥ सात सौ हंस पावन कीन्हा । कुटुम्ब सहित पयाना दीन्हा ॥ चन्द्रविजय घर इन्दुमति नारी । संकट राजा लीन उबारी ॥ केता पूछो जीव सनेही । गिनत गिनत ना आवे छेही ॥ युगन युगन भवसागर आऊँ । जो समझे तेहि लोक पठाऊँ ॥

( ३८ )

जगजीवनबोध

शब्द हमारा मानै कोई । तौ नहिं जाय यमपुरी सोई ॥ इतनी बात कही समझायी । दिल राजाके प्रतीति समायी ॥

राजा वचन

धन्य भाग मेरा कुल कर्मा । कोटित यज्ञ कियो तप धर्मा ॥ सत्यगुरु आयदरस मोहि दीन्हा । बूझत हंस उबार कै लीन्हा ॥ हो प्रभु मोर करो निवैरा । मै तो चरण कमलका चेरा ॥ कहु सन्देश नगर में भाई । जय जीवन राय लोकको जाई ॥ नेगी जोगी सबहि बुलायी । और नगरकी परजा आई ॥ चन्दनका सिंहासन कीन्हा । चौका पूरि कलश धरि दीना ॥ सतगुरु शब्द उचारे लीना । युक्ति साजि गादी पगु दीना ॥ सब रानिनको बेगि बुलायी । करि दण्डवत् गुरुचरणा आयी ॥ जीव प्रति नरियल ले आये । सो सतगुरु को आनि चढ़ाये ॥

सारखी-सब रानी बिन्ती करें, सुनु समरथ चित लाय ।

महा अकरमी जीव हम, सबहि लेहु सुकताय ॥

चौपाई

जेठी रानी चन्द्रमति जोई । सतगुरुकी गति जानी सोई ॥ दूजी रानी है मनकी युक्ती । निर्भय होय करै गुरु भक्ती ॥ तीजी रानी है मनपोई । लज्या कारण ना मानै कोई ॥ चौथी रानी भानुमति आही । जीवत सती सुजानो ताही ॥ पांचवीं रानी धन्ना बाई । कलावंत होय आगे आई ॥ छठवीं रानी प्राणप्यारी । पूजे सन्त वह लाज निवारी ॥ सतई रानी है सत मामा । निर्भय होय जपै गुरु नामा ॥ अठवीं आनन्दकला है रानी । सतगुरुसों प्रीति निज ठानी ॥ नौवीं रानी नामपियारी । भक्तिवंत जाने संसारी ॥ दशवीं रानी है दिल दायक । सब रानीकी सो है नायक ॥ ग्यारहवीं रानी है रंगरोपा । ताके कारन राव नहिं लोपा ॥

राजा रानी इत्यादि सब परिवारका सद्गुरुकी शरणमें आना और राजकुंवरका हठ करना पीछे शरणमें आना

बोधसागर

( ३९ )

बारहवीं रानी सूरजमती । हंस रूप है ताकी गती ॥ द्वादश रानी सब बनि आयी । एक अंग होय सब भक्ति करायी ॥ राजा छडीदार पठवाई । तो वो कुँवरको लाय बुलाई ॥

छडीदार बचन

छडीदार कहै कर जोरी । राजकुँवर सुनु विन्ती मोरी ॥ राजा रानि गुरु चरणै आये । ताते तुमको बेगि बुलाये ॥ गरभवाससों करै निरुवारा । तुरत चलो जनि लावो बारा ॥

कुँवर बचन

तुम छडीदार कहो बात विचारी । कैसा गुरु है सो अधिकारी ॥

छडीदार बचन

हम मति हीन कछु नहि जाना । निश्चय आही पुरुष पुराना ॥ यह सुपने नाहीं कहुँ देखा । सुर मुनि नारद शारद पेखा ॥

कुँवर बचन

कुँवर बीनती कीन सुहाती । सुनतैं बात जुडानी छाती ॥ हंस रूप चारों हैं भाई । उमंग हरष हिये नाहि समाई ॥ जहाँ सतगुरु आसन कीन्हा । कुँवर चार आइ दर्शन लीन्हा ॥ बडा कुँवर वह सूरजभाना । गुरु स्वरूप हृदय में आना ॥ दूजा कुँवर इन्द्रमन दासा । शब्दै पीवै शब्दकी आसा ॥ तीजै कहिये चतुर्भुज कुमारा । शब्द सुनत वह सीस उतारा ॥ चौथा कुँवर विक्रम दासा । जिन तन मनकी छोडी आसा ॥ चारों कुँवर धरे गुरु पाई । तन मन धन सब प्रीति चढाई ॥ कदलौ केर पतवार धरायी । गज मुक्ताहल चौक पुरायी ॥ नरियल मोरि के मालूम कीन्हा । लिखि परवाना सबकूँ दीन्हा ॥ इतने हंस भये मन भावन । तिनको सतगुरु कीन्हा पावन ॥ तन मन धन सो बदला कीन्हा । शिरके साँट साहबको चीन्हा ॥ करी निछावर मेटे गर्भफेरा । अब तो भई भगतिकी वेरा ॥

कुकर्मी जीवके उद्धारका उपाय

( ४० )

जगजीवनबोध

सतगुरु वचन

तुमरी राय भली बनि आही । तुम गरभवासकीकौल निबाही॥ जोई कौल गरभका पालै । ताको सतगुरु होहि दयालै ॥ गरभ कौल कोई चूके भाई । असंख्य जन्म चौरासी जाई ॥

साखी-गरभ कौल चूके नहीं, वोही हंस सुजान । चौरासी भरमें नहीं, सो पहुँचे यहि परमान ॥

राजा--वचन चौपाई

राजा कहै दोऊ कर जोरी । सुनु समरथ यह विन्ती मोरी॥ महाकुर्मी जो होय प्रानी । करमनसे कैसे होय छुटानी ॥

सतगुरु वचन

तब समरथ गुरु शब्द उचारा । करमन काटि कहैं निरवारा ॥ असंख्यजन्म कर्म किय आयी । पान पान में करम कटायी ॥ जो जिव कर्म करै निरवारा । पाख पाख में कर्म सुधारा ॥ विना पान नहि कर्म कटाई । कोटिन ज्ञान करै जो भाई ॥ रेखा गुंज विचारै जानी । विना गुंज करै जिव हानी ॥ युग छत्र सो हंस उबारा । छत्र मुनी से उतरे पारा ॥ युग बन्धन ते शिष्य करीजै । असंख्यजन्मका कर्म जो छीजै॥ जैसा जीव तैसा होय पाना । सबही करम होय छय माना ॥ लगन जैमुनि आवै हाथा । धर्मराय तेहि नावै माथा ॥ गुरुशिष्य युक्ति एकजो आवै । पारसपान छत्र मुनि पावै ॥ पान एकोतर लैहैं जोई । असंख्य जन्मका कर्म नशाई ॥

राजा वचन

राजा सतगुरु विनती लायी । लगन जैमुनि देहु बतायी ॥ लगन जैमुनी कैसे पावै । कैसे सतगुरु सों लौ लावै ॥ कौन जुगति चरनामृत लेही । कैसे करै जो बने विदेही ॥

बोधसागर

( ४१ )

कौन वस्तु कहाँ लै आवै । काह भेट गुरु आगे धरावै ॥ लोकलोक गुरु कहो समझायी । कहौ हंस कहैं जाय समायी ॥ कैसे पावै लोक निवासा । कौन कौन घर करिहै वासा ॥

सतगुरु बचन

तब सतगुरु अस बचन उचारा । शिष्य होय सौपूँ भंडारा ॥ शिष्य होय सँवारे देही । लोक द्वीपकी गम्य तब लेही ॥ शिष्य होय गुरुवश करलीजै । तन मन धनही नथर कीजै ॥ जो कछु आपन भक्ति करावै । पान पान सँग लोक पहुँचावै ॥ ताकी देह बनत है भाई । तामें हंस तब जाय समाई ॥ जोइ वस्तु ध्यानमाँहि चढावै । सोई हंसा सत्यलोक पहुँचावै ॥ ताका नाम रेवती भाई । विना शिष्य कोइ पावै नाई ॥ तन मन धनको नेह न आवै । तब जिव लगन जैसुनी पावै ॥ तब राजा मन हरष अपारी । करहु शिष्य जाऊँ बलिहारी ॥

कुँवर बचन

कुँवर कहै विलम्ब किमि साहूँ । दया करो हो शीस उताहूँ ॥

रानी बचन

रानी मनमें हर्ष अनन्दा । मानों ऊगे कोटिक चन्दा ॥ तन मनसे करिहौं गुरु सेवा । हमको शिष्य करहु गुरु देवा ॥ अन्तर बात सब देहु बनायी । जैसे सीप मोती कूँ भायी ॥

सतगुरु बचन

करनी कठिन सत्य करिजानो । कहनि करनि बहुभेद बखानो ॥ कठिन करनी टले जो भाई । ताकर जीव बहुत दुख पाई ॥ शिष्य होय जब कौल बँधावे । तन मन धन सब आनि चढावे ॥ किये कौल निबाहे पूरा । करे गुरुसेवा शिष्य सोइ शूरा ॥ पूरा होय के शूर कहावे । सतगुरु बचन सदा लौलावे ॥

१ भाव ।

( ४२ )

जगजीवनबोध

करी कौल निर्बाहे नाहीं । ऐसो शिष्य सो यम मुख जाहीं ॥ तन मन चढावे वही सुख पावे । आखिर धन यौवन बहि जावे ॥ कौल करे सो जाल भुलाई । अँटके भव में नाहिं सहाई ॥ किया कौल टालि जो देई । बहु दुख संकट माथे लेई ॥ होय दुखी दुख देह समावै । ताकी देह रोग है आवै ॥ गुरु को दोष देहु जन कोई । आज्ञा मेटे सजा तेहि होई ॥ सो जिव कदी न उतरे पारा । करन द्वेष जो गुरु से धारा ॥ अन धन ताकहैं चहिये भाई । जापर सतगुरु होहि सहाई ॥ कर्म सतगुरु दया कटावे । साहब ध्यान सो फल यह पावे ॥ गुरु छोडि जो कर्म करावे । उन मनमें जो लीन रहावे ॥ सो नहिं पावै वस्तु अपारा । मनमें देखहु करहु विचारा ॥ सहज भक्ति करो तुम भाई । होय शिष्य नहिं डर कछु ताई ॥ सहज भक्ति राजा तुम करहु । शिष्य होइ भक्ति पद तरहु ॥ सहज भक्ति सबही सुखदाई । कठिन कमाई दुस्तर भाई ॥ कठिन कमाई खाँडेकी धारा । सहज भक्तिसे उतरो पारा ॥ सदा सुखारि भक्ति रस पीजै । मूली ऊपर घर नहिं कीजै ॥

राजा वचन

सब कर्म कठिन सहज कर जानू । तन मन धन कर लोभ न आनू ॥ हमको सीख अब देउ गुसाई । कौल कहैं सो चूंकू नाई ॥ जो कहैं चूकि कौल हम जावै । अपनी करनी हम भरि पावै ॥ कौल चुके सो मूँढ गवारा । विनु स्वारथ जग होवे ख्वारा ॥ रंकके हाथ रतन जो आवे । कौडी बदले काह गवाँवे ॥ अब सतगुरु दाया मोहि कीजै । चूके कौलका फलहि कहीजै ॥ फिर कैसे सो सुख पावे । कैसे वह फिर कौलमें आवे ॥ कैसे निर्धन धनै बहोरे । कैसे रोगी रोग सो छोरे ॥ अब करु शिष्य शब्द मुहिदीजै । नहिं तो देह त्याग हम कीजै ॥

आरती कराकर राजा तथा अन्य जीवोंका पान लेना

बोधसागर

( ४३ )

साखी-चरण वन्दुँ कर जोरिके, सतगुरु सुनो पुकार । लगत जैसुनि जब मिले, तबही करब अहार ॥ सतगुरु वचन-चौपाई

ऐसे कष्ट करो मत भाई । करो विचार मैं कहूँ सुनाई ॥ करो आरती साज मँगाओ । लेई पान परम सुख पाओ ॥ प्रथम सिंहासन लाइ बिछाओ । सर्वजीव एकसुरति होय आओ॥ सवा सै पान जीव प्रति लाओ । सवा सेर महाकन्द मँगाओ ॥ कपडा बस्तर धातु धराओ । ताँबा पीतल बर्तन लाओ ॥ सोना रूपा मोती हीरा । लाल जवाहिर बने सो चीरा॥ जैसो साज जोई लैं आवै । तैसो हँसा देह बनावै ॥ इतनी साज नहीं बनि आवै । ताके हेतु यह गौ ठहरावै ॥ गौ नाम पृथ्वी का होई । पृथ्वी नाम यह देह संजार्ई ॥ सोधन चले अग्रकी धारा । अगर वास तहैं होय अपारा ॥ पान संग सो देउँ पहुँचायी । लोक जात सो बार न आयी ॥ जब सतगुरु आज्ञा फरमायी । तब राजा सब साज मँगायी॥ सब ही राज जब आनि धरावा । तब सतगुरुको तरुत बिठावा ॥ जुगति साजि चरणामृत लीन्हा । तन मन धन अर्पण करदीना ॥ पुनि सतगुरु पान सो लीना । जैसो जीव तैसो तेहि दीना ॥ पाइ पान सबही चित दीना । होय अधीन सत्य सुख लीना॥ तब सतगुरु यक वचन उचारा । सबहीको कह्यो करन विचारा ॥

सतगुरु वचन

सुनु राजा यक कहूँ विचारा । मानो राजा कहा हमारा ॥ जो वस्तु तुम हम सो पाओ । रखो चेत नहि अनत गँवाओ ॥ जुगाओ शब्दै करो कमाई । हट करि रखो नहि देहु गवाई॥ सेवा करत सुरति चलि जायी । तबहि कालघर बजे बधायी ॥ जे जिव शब्द सुरति पर चाले । सबही विधि सो होय निहाले ॥

तन छूटने पर हंसका स्थान कर्मानुसार भिन्न भिन्न लोककी प्राप्ति

( ४४ )

जगजीवनबोध

सारखी-शिष्य होय तनै छिपाइ, ताका कहूँ विचार । कहै कबीर निर्भय नहीं, निश्चय यमके द्वार ॥

राजा वचन-चौपाई

राजा कहै सुनो गुरु मोरा । मैं लागत हूँ चरने तोरा ॥ सहस्र अठासी लोक बताओ । भिन्न भिन्न कै मोहि बुझाओ ॥ कौन हंस कहँ करै बसेरा । सब ही हंस कर कहँ २ डेरा ॥ उत्तर समरथ कहो बुझायी । यह सन्देह उठा मन आयी ॥ खेमसरी को कहा संदेशा । द्वादश हंस उन सँग उपदेशा ॥ चारों युगका कहा संदेशा । बहुते हंस बतायो भेशा ॥ बहुते जीवहि बोध बताये । तन छूटे सब कहाँ समाये ॥ बहुत हंस पहुँचे निज ठाई । तिनकर पता कह्यो समझाई ॥ और हंस कहाँको गयऊ । ताका बहुत संदेहा ठयऊ ॥

सतगुरु वचन

हे राजा तोहि कहि समझाऊँ । भिन्न २ कै वरनि बताऊँ ॥ जे जे जीव परवाना पावैं । सो सो जीव सत्यलोक सिधवैं ॥ परवाना की यहि अधिकाई । हंस विगोय ना कबहुँ जाई ॥ जो हंसा नहि देह बनावै । सो सब मानसरोवर जावै ॥ मान सरोवर दीप अमाना । होइ है चार भानु परमाना ॥ परवाना की यह अधिकाई । योनि गरभ बहुरि नहि आई ॥ ताते ताहि वृत्तान्त बतायी । सकल कामना तोर मिटायी ॥ सत्य सत्य सबको समझायी । जब गुरुको चरणामृत पायी ॥ जो कछु करै सुकृत कमाई । सो सब पान पर देहि चढाई ॥ हेत द्वीपमें पहुँचे जाई । तब ही हंसा देह बसाई ॥ ऐसी विधि जो पान चढावै । निज स्वरूप जीव सो पावै ॥ तापर हंस होय असवारा । पचासी पवन परे सरदारा ॥

राजाका सद्गुरुसे लोक लेजानेको विनती करना

बोधसागर

( ४५ )

जो ऐसी नाहीं बनि आवै । ताके पान संग वृषभ चढावै ॥ वृषभ चढावे पावे सोई । पढुप दीप रूप बहु होई ॥ वृषभ नाम नील है भाई । उनकी शोभा बहुतहिं पाई ॥ नाम नील वरन है स्वेता । ताको रूप कहा कहु केता ॥ जो वृषभ नहीं बनि आवै । तो लै गौ सो देह बनावै ॥ गौ देह सो पान जो पावे । मंजुल करि वह हंस रहावे ॥ दश हजार सुर झलके देही । पहुँचे हंसा होय विदेही ॥ हीरा मोती लाल जवहिरा । पान चढे पुनि देह उजिहिरा ॥ बस्तर दे पुनि पान चढावे । ज्ञान दीपमें लै पहुँचावे ॥ पांच सौ सूर्य समान सरूपा । परसत तहाँ सो होय अनूपा ॥ कंचन रूपा धातु चढावै । तैसो शोभा देहमें पावै ॥ कहुँ पुकार करो निवैरा । देह विना कहँ करै बसेरा ॥

राजा वचन

धरे राम सतगुरुको पाऊ । हो सतगुरु तुम हंस मुकताऊ ॥ सत्यगुरु मैं तुव बलि जाऊ । सर्व भेद तुम मोहिं बताऊ ॥ कछु न मोसे राखु दुराई । देत हौं तुमको पुरुष दुहाई ॥ जो तुम कहौं करौं मैं सोई । तुमसो दिल पतियाना मोई ॥ कृपा करो मैं प्रीति लगाऊँ । कसनी देहु सो सकल सहाऊँ ॥

सतगुरु वचन

तब सतगुरु कहे समझायी । काहे को तुम देत दुहायी ॥ सबही कहौं तुम पूछो तैसी । लोक राह है सो पुनि जैसी ॥ गही बाँहि उबारै तोहि राई । यहि हंसन की अहे कमाई ॥ जो तुम किरिया दीन्हा मोई । कछु न तुम सौं राखूं गोई ॥ यह कहिसतगुरु युगति बनाया । ले राजाको अंक मिलाया ॥ अंक मिला कटी सब माया । पारस रूप जो भई काया ॥

सद्गुरुका प्रसाद पाना

( ४६ )

जगजीवनबोध

अंक मिलाया भये नृप पारस । उघडी दृष्टि अधिक भै आरस॥ लोक द्रौप दृष्टि भै आई । भिन्न भिन्न सब द्रौप दिखाई ॥ भये राजा मन महा अनन्दा । मानो ऊँगे पूर्ण चन्दा ॥

राजा वचन

धन सतगुरु तुम्हरी बलिहारी । बूडत जीव तुम लीन्ह उबारी ॥ अब सतगुरु प्रसाद कछु कीजै । महा प्रसाद जीवनको दीजै ॥

सतगुरु वचन

सतगुरु कहै सुनो तुम राई । महा प्रसादकी जुगति बताई ॥ कंचन केरी थार मँगाओ । अमृतकी झारी भर लाओ ॥ आसन डारिके पुरुष बैठोओ । स्वेत बहुत सब हंस ले आओ ॥ इतना करि तब चरण खटारो । होय अधीन तन मनको मारो ॥ सुनि राजा सब युक्ती लीन्हा । सतगुरुको बहु बन्दन कीन्हा ॥ चरणखटारि पोंछि जब लियऊ । आसन बिठाय पुरुष कहँ दियऊ ॥ तब सतगुरु अस करबे लीना । सीथ प्रसाद सबनकूँ दीना ॥ पाय प्रसाद भये बड भागा । शून्य महल मन मोहरा जागा ॥ कहै समरथ कहु कैसा स्वादा । कहत बने नहि बनत अघादा ॥

सारखी-महाप्रसाद के करतही, निःतत्त्व होय जाय ।

रंचक घटमें संचरे, सतगुरु लोक दिखाय ॥

राजा वचन--चौपाई

सतगुरु कहिये बात विशेषा । लोक द्रौप सबही हम देखा ॥ धन्य सतगुरु तुम्हारे बलि जाऊँ । लोक द्रौप सब दृष्टिहि पाऊँ ॥

सतगुरु वचन

चौका युक्ती नहीं बनि आवै । महा प्रसाद कै देह बनावै ॥ तुमसे राजा कहु समझायी । पाख मास भै पान तुम पायी ॥ पुरुष पान सो पावे जबहीं । अगम ज्ञान सो सूझे तबहीं ॥

पान माहात्म्य

बोधसागर

( ४७ )

यही ज्ञान मैं भेद समझायी । तुम हंसन से कहो बुझायी ॥ हमरो प्रतिहार पान है भाई । पलपल खबर हंसकी लाई ॥ सोई वस्तु लै लोक पहुँचावे । सोई पान संग हंसन आवे ॥ जाका तुमसे कहूँ विचारा । पान लहे सो हंस हमारा ॥ जैसुनि लगन पान जो पावे । निर्भय लोक हमारे आवे ॥ पान परख विन झूठ कडिहारा । धोखे लेइ जिवन कर भारा ॥ धर्मराय माँगि है पाना । जब ही हंसा करे निर्वाना ॥ साखी-सब ही पहुँचे लोकमें, चढै पानपर अंक । कटे कर्म सब जन्मके, हंस होय निःशंक ॥

हंस ( राजा ) वचन-बोपाई

हंस कहे सुनो गुरुदेवा । जीवकि अवधि बताओ भेवा ॥ जादिन अंत अवस्था आवे । ताकर भेद हंस किमि पावे ॥ सोम शुक्र दिन औ बुधवारा । ताका कहिये चन्द्र सरदारा ॥ आपनि आपनि चौकी आवै । तौ यह जीव बहुत सुख पावै ॥ चले चूक चौकी कर फेरा । तौ कायानगरमें होय बखेरा ॥ गुरुबारका भेद बताऊँ । दो भावै गुरु दरस दिखाऊँ ॥ एकै आवै एक न आवै । ता दिन जीव बहुत दुःख पावै ॥ बार तिथि चौकी चूक करही । तो निश्चय ना बाचै देही ॥ सरब भेद मैं तोहि बताया । विरले हंस भेद यह पाया ॥ तुम सों हंस कहूँ समझायी । गुप्त भेद ना बाहिर जायी ॥ अब हम पृथ्वी परिक्रमा जावै । भूले हसन करें चितावै ॥ तुम राजा बैठि राज कराओ । सार शब्द जपन चित लाओ ॥

राजा वचन

जब सतगुरु तहाँ ऐसो कहिया । तब राजा मन चिता भइया ॥ राजा चरण धरयो तब आई । तुम विनु कैसे रहूँ गुसाई ॥ हमको राखो चरण लगायी । नहि देहु सत्यलोक पठायी ॥

सद्गुरुका पाटनसे चलनेका विचार प्रगट करना और वहाँके हंसोंकी विनती

( ४८ )

जगजीवनबोध

करक संक्रान्ति चन्द्रकी भाई । जल तत्त्व ते चन्द्र कहाई ॥ जब चन्दा घर चन्दा सोई । रोग व्याधि शोक ना होई ॥ चन्द्र पेलिके सूर समावे । पास छः में लोकहिं जावे ॥ अब पाँच तत्त्वका कई बखाना । जानेगा कोइ हंस सुजाना ॥ परबत पंच काया के बारै । गुरु गम हंसा करै विचारै ॥ पीत वरन है मन्दिर वारा । तामें पुरुष दरश गुरु सारा ॥ स्वेत वरन है पुरुष परमाना । ताका दरश करै कोइ स्याना ॥ तीजे लालवरन पुरुष परमाना । देखत हैं सो हंस सुजाना ॥ चौथा हरा रंग है सूरत । ताको ध्यान धरि देखिये सूरत ॥ पाँचवें स्याम वरन अधिकारा । सो देखै कोइ हंसा प्यारा ॥ जो कोइ इनसै सुरति लगावै । स्वास स्वासकी खबर बतावै ॥ रवि मंगल शनिश्चर वारा । तापर सूर होय असवारा ॥

कालज्ञान

सतगुरु वचन

सतगुरु कहै सुनो रे भाई । अगम के भेद कई समझाई ॥ भिन्न भिन्न करके भेद बताऊँ । आगम कहिये दृष्टि दिखाऊँ ॥ वर्ष छः मास मासका भाऊँ । पाख आठदिन बरनि सुनाऊँ ॥ इंगला पिंगला सुषुमनि नारी । चले लगन सो लेहु विचारी ॥ पाँच तत्त्व हैं उनके पास । वह सब आगम कहैं तमासा ॥ स्याना हंस होय जो भाई । तिनको अगम देहुं बताई ॥ छः मासका भेद बताऊँ । अगम लहो सो कहि समझाऊँ ॥ दोग्य संक्रान्तिका भेद बतायी । एक मकर दूजा करक कहायी ॥ मकर संक्रान्ति सूरज सो देखा । तत्त्व पृथ्वी स्वर सूर विशेषा ॥ जो सूर घर सूरज आवे । छः मास काया सुख पावे ॥ सूरज पेलि चन्द्र जो आवे । छः मासमें जीव चलावे ॥

सद्गुरुका राजाको अपना प्रतिनिधि बनाकर गमन करना

बोधसागर

( ४९ )

पल पल राय नवावै माथा । मोको कैसे छुडाओ साथा ॥ गुरु विन कैसे रहौं अकेला । दिग दिग होये जीव न चेला ॥

सतगुरु वचन

सतगुरु कहै सुनो मोर भाई । हम संगे रहो लै जाउँ लिवाई॥ सदा रहौ हंसन के पास। हमको रहै हंसनकी आसा ॥ देह सो दर्शन तुम्हे दिये राई । विदेही होय संग रहूँ सहाई ॥ विदेही दरश जब हंस पावे । देखि दरश होय अधिक उछावे॥ सतगुरु चलन खबर सब पावा । धीरे धीरे सब हंसा आवा ॥ आये हंसा विन्ती करहीं । हे साहब हम धीर कस धरहीं ॥ जो तुम जाओ सतगुरु साहब । हमहु संग सब तुम्हरे आयव ॥ तुम विनु गुरु कैसे रहि जावै । जल विनु मच्छी ज्यों तडपावै॥ हम पाये आनंद दरश तुम्हारे । मोको न छोडो स्वामि हमारे ॥

सतगुरु वचन

काहे को हठ करत हौ भाई । सबही हंस सुनो चित लाई ॥ देह धरी अब करो सुख वासा । सदा रखो निज नामकी आसा॥ घर में रहि कुल धर्म निवाहो । जो सब साँचि भक्ति तुम चाहो॥

सबहंस वचन

माता पिता त्रिया नहिं चहिये । सुत नारीसे नहिं नेह लगैये ॥ सतगुरु तुमही हौ यक साँचा । झूठ और सकल जग काचा ॥ विना दर्श सो दुख हम पावै । नित चरणामृत कहँसे लावै ॥ तुम विनु देह छुटि सो जावै । कहँ गुरुवचन बहुरि सो पावै ॥ विना दरश सब जगकी माया । सबहि छुटे नहिं चहिये काया॥

सतगुरु वचन

सतगुरु कहै सुनो रे भाई । सबही रहो नाम लौ लायी ॥ सदा रहूँ मैं उनके पास। धरे ध्यान जो साँचकी आसा॥

राजाका सत्यलोक गमनकी तय्यारी करना और अधिकारी हंसोंका साथ जाना

( ५० )

जगजीवनबोध

सुनो हंस गहो पद सांची । ध्यान विदेह में रहि हो रांची॥ इतना कहि सतगुरु बतलावा । सबको विदेह ध्यान समझावा॥ ध्यान पाइ आनन्द सबै भयञ्ज । सतगुरुदरश प्रत्यक्षहि पयञ्ज ॥ फिर सतगुरु राजहि समझावा । सब हंसन को करहु चितावा ॥ पुनि हंसनसे अस प्रभु भाख्यो । हमरे ठौर राय तुहि राख्यो ॥ हम सम रायको सबही जानो । हमसन राय को अन्त न मानो॥ तब सदगुरु तहाँ ते पगुधारा । सब हंसन दुख भयो अपारा ॥ चलत गुरु सब सीस नवाया । करि मिलाप गुरु कण्ठ लगाया॥ तुम सों राजा कहू चितायी । रहो सदा शब्द लवलायी ॥ चले गुरु समरथ जेही वारा । रोवै हंस बहैं जल धारा ॥ जैसे रंकहि रतन हिराना । जैसे भुजंग मणी विसराना ॥ मानि सतगुरु आज्ञा लीना । विदेह ध्यान गुरु दर्शन दीना ॥ ध्यान पाइ गुरु करें सब भक्ती । काल नाल सब छूटी युक्ती ॥ केते दिवस ऐसे चलि गयञ्ज । तबही राजा आगम पयञ्ज ॥ सब हंसनको वेगि बुलायी । राजा कहै शब्द बतलायी ॥

राजा वचन

जेहि कारण हम भक्ति कराई । सो दिन अब पहुँचा है आई ॥ ताल पखावज वेगि लै आओ । शब्द चलावा मंगल गाओ ॥ बाजा बाजे बहुत वधायी । सबै त्रिया मिलि मंगल गायी ॥ सब ही लोक खबर यह पायी । राय जगजीवन लोक सिधायी ॥ पाटन नगर में बहुत उछावा । घर घर तिरिया करे बधावा ॥ बैठे राजा आसन धारी । जुरे हंस जहाँ बहुत अपारी ॥ ले परवाना बन्दगी कीना । सबही हंस परिकरमा दीना ॥ रानी पांच कुँवर दौय जाना । ❁ दासी चार हजुरी साना ॥

• इसके विरुद्ध दूसरों पुस्तकोंमें इस प्रकार लिखा है

जब राजा एक शब्द उचारा । कौन कौन चले हमारे लारा ॥-

सत्यलोकके मार्गमें धर्मरायसे हंसोंका वार्तालाप

बोधसागर

( ५१ )

चार प्रधान सात उमराऊ । प्रोहित द्योय द्वियै मन भाऊ ॥ इतना जन परवाना लीना । राजा संग सो प्याना कीना ॥ पावत बीरा जिव निस्तारेऊ । अमर लोक कहैं प्याना धारेऊ ॥ दशम द्वार सो न्यारा द्वारा । जेही राह हँस पगु धारा ॥ धन्य भाग हँसन तब जाना । राजाके संग कीन पयाना ॥ आये प्रथम धरम के डेरा । जहैं चौतरा रायधरम केरा ॥ धर्मराय जब लेखा मांगा । तब हँसा लेखा देने लागा ॥ जिन जिन कौल चुकाने भाई । सो सो रहे धर्मकी ठाई ॥

जीव बचन धर्मराय प्रति

जीव कहे सुनो धर्मराया । हम सतगुरुका परवाना पाया ॥ ज्ञान ध्यान हम बहुते जाने । और जाने अमर सो ज्ञाने ॥ हमको तुम काहे रोकत भाई । संगी हमारे आगे चले जाई ॥

धर्मरायबचन

भूला जीव मुख करे चतुरायी । ऐसी बतन मुक्ति न पायी ॥ साखी गावे सब संसारा । का सबही जिव उतरे पारा ॥ जो जीव होऐ कौलके साचा । तिन सबपर हम पाले बाचा ॥ सतगुरु सेवा कीन बनायी । हमरे शिरसु पावैं धरि जायी ॥ भक्ति हीन छुए अंग हमारा । छूवउ अंग होय जरि छारा ॥

—तब इतने हँस आगे पगुधारा । संग जान को कीन बोचारा ॥ रानी पांच कुर्वर द्योय जानी । दासी अष्ट नव हजुरी सानी ॥ पांच प्रधान प्यारह उमराओ । छडी दार सातसो मन साओ ॥ बारह कापस्थ सत्रह साहूका । बढई चार अरु सात लुहारा ॥ सत्रह मुनार अठारह बनजारा । चौकीदार चले संग चारा ॥ नव कुरमी सत्रह कोरी । तेरह कुन्हार सबै सर मोरी ॥ धोबी उजला धोवन हारा । पांच चले राजाकी लारा ॥ छः धमार बन्दगी कीना । राजा के संग प्याना दीना ॥ पाये बीरा जीव चलावा । निकसा जीव ठाठरी पढावा ॥

कामिनीसे बातचीत

( ५२ )

जगजीवनबोध

चार सहस्र सै सात रु बावन । इतना जिय चलु लोकहिं ठावन॥ दोसै कौल चुकाने भाई । सो रहे धर्म राय की ठाई ॥ चार हजार सात सै बावन । दोय सै धरमराज ठहरावन ॥ चार हजार बावन सै पाँचा । मानसरोवर पहुँचो सो साँचा ॥ जहाँ कामिनी मंगल गावै । सजि आरति ले आगे आवै ॥

कामिनी वचन

करी निछावर बूझै बाता । कैसे आये यहि मग धाता ॥ माया मोह बन्द्यो संसारा । कैसे छाडे कुल परिवारा ॥

हंस वचन

कहे हंस सतगुरु गम दीन्हा । जब हम दर्शन तुम्हारा लीन्हा॥ देह बनी सो आगे आये । रहिता सब जिव वहाँ रहाये ॥ चार हजार एकसौ बावन । एते हंस तेहीं ठावन ॥ चार सौ आगे किया पयाना । हेतु द्रौप पहुँचे अस्थाना ॥ मान सरोवर हंस रहायी । सबमिलिकरहि बहुत बधायी॥ सब पूछे कामिनि सो बात । यह सब हंस कहाँ को जाता ॥

कामिनी वचन

कह कामिनि सुनु हंसा भाई । तुम गुरु कर कह कीन कमाई ॥ परवाना की यह बडावा । सो तुम मानसरोवर आवा ॥ उन हंसन गुरु भक्ति करायी । जुगति जुगति उन देह बनायी ॥ आगे हेत द्रौप मैं जैहैं । हंस सुजन जन कंठ लगै हैं ॥

हंस वचन

सब हंसा मिलि विनती कीन्हा । हम चाहैं तुव दर्शन लीन्हा ॥ साखी-बैठि हंस विन्ती करे, सुनु समरथ अरदास । देही सवारे लोकमें, उपजे प्रेम विलास ॥

हंस गुंजन जनसे बातचीत

बोधसागर

( ५३ )

चौपाई-सुजनजन वचन

हंस सुजन जन कहैं सुनायी । सबही हंसा सुनो चितलायी ॥ जैसी देह सवॉरी हंसा । तैसी लेहु हमारे पंसा ॥

हंस वचन

चरणाभृतहि तुर्त सो लीना । कैसी महिमा गुरु की कीना ॥

हंस सुजनजन वचन

कितने पान शिष होये पायी । कौन वस्तु तुम पान चढ़ायी ॥ जैसी वस्तु संसार चढ़ावै । वैसी देह इहाँ सो पावै ॥ इहाँ मोती वहाँ हीरा लैहो । तेहि सम रूप देह सो पैहो ॥ जैसी सवॉरे देह तुम दासा । वैसे लोक करो तुम वासा ॥ जिन वहि अवसर देह बनायी । मंजुल करी मैं बैठक पाई ॥ द्वादश सहस सुर हंसनको रूपा । बैठे हंस दीप सम भूपा ॥ गो चढ़ाय पान जिन लीन्हा । पुछुप दीप तिन हंसा चीन्हा ॥ आठ हजार सुरज परकासू । सब आनन्द होय सुख बासू ॥ वृषभ चढ़ाय पान जो पावे । मंजु लोकमहैं हंस सो जावे ॥ दश सहस सूर छवि छाजे । बैठे हंसा राज विराजे ॥ हीरा मोती लै पान जो पावे । उदय द्रौप मैं हंसा जावे ॥ तेहि हंस मैं सुरज की जोती । झलके रोम मैं जैसे मोती ॥ वस्तर देहकै देह बनावे । सो हंसा सुख सागर पावे ॥ वह तो ज्ञान द्रौप मैं जावैं । चार सुरज ज्योति तिन पावैं ॥ पैसा धातु बर्तन लायी । सुख सागरमें ध्यान लगायी ॥ पैहैं सो षोडश भानु सरूपा । बसे सो हंसा द्रौप समीपा ॥ तीन से बत्तिस जिन देहबनाये । आपन आपने द्रौप सिधाये ॥ पैसठ हंस पहुंचे निज ठाई । जिन तो इल्म फकीरी पाई ॥ कहै सुजन जन सुनो रे भाई । धनि धनि तुमरी अधिककमाई ॥ तुम्हरी सरवर कोउ न कीन्हा । तुम तो गुरुको वश करलीन्हा ॥

सब हंसोंको लेकर ज्ञानीजीका सत्यपुरुषके सन्मुख जाना और सत्यपुरुषकी प्रसन्नता

( ५४ )

जगजीवनबोध

तन मन धनकी कौन चलायी । तुम तो आपा दिय विसरायी॥ इन सब हंसन देह बनायी । तुम तो देही गुन विसरायी ॥ जो तुम कहो करौं मैं सोई । तुमरी सरवर नाहीं कोई ॥ सुरति तुम्हारी अधिक सहाई । सतगुरु तुमरे प्राण समायी ॥ यह वस्तु तुम कैसे चीन्हा । कैसे गुरुको वश करि लीन्हा ॥ कैसे तन आशा विसरायी । कैसे इल्म फकीरी पायी ॥ सब हंसनकी देह बनाऊँ । ताको तैसो दीप मिलाऊँ ॥ सतगुरु वशि करि राखे पासा । सुनो हंस मुँहि तुमरी आशा ॥ सदा सतगुरु हंस सनेही । तुम आर्पित सतगुरुकी देही ॥ सदा करै सतगुरु की पूजा । तुमसा हंस न देखा दूजा ॥

हंस वचन

हंस कहे सुन पुरुष पुराना । हम कहैं जानै जीव अजाना ॥ हम तो हते भवजल के माहीं । महा अन्ध कछु सूझत नाहीं ॥ तब समरथ गुरु आनिचिताया । बूढत देखि उबारन आया ॥ जो गुरु कहा सोई हम कीन्हा । एक गुरु विलु और न चीन्हा ॥ तिनसों पूछ कीन कर जोरी । समरथ मानो विन्ती मोरी ॥ हम नहीं चाहें लोक औ द्रीपा । सदा रहैं गुरु चरण समीपा ॥ तब गुरु कहो सुनो रे भाई । सर्व ज्ञान का मूल बताई ॥ हमरे संग रहा जो चाहो । नौतम सुरति कि देह बनाओ ॥ और सकल झूठ कर जानो । एक गुरु हम सांचे मानो ॥ तन मन धन सो बदला कीना । तब गुरु इल्म फकीरी दीना ॥ तब गुरु आपा दिया मिटायी । देहीको गुण दियो विसरायी ॥ पान इकोत्तर से हम पाये । पानपान हम देह बनाये ॥ लोक द्रीप हम कछु न चाहा । हमको सतगुरु दर्शक लाहा ॥ हंसा सुरति गुरुकी कीन्हा । स्वरूप सहित गुरुदर्शन दीन्हा ॥ सब ही हंस धरेउ गुरु पाऊ । करि बन्दगि सब सीस नवाऊ ॥

बोधसागर

( ५५ )

सतगुरु वचन

सतगुरु कहै हंस सुनु बाता । कहाँ वे जीव तुम्हारे साथा ॥

हंस सुजनजन वचन

हंस सुजन मिलि अंक लगाये । कहो हंस कस कीन कमाये ॥

सतगुरु वचन

इनकी मैं का कहूं बड़ाई । ये तो सब निज हंसा आई ॥ निश्चय बात हमारी मानी । काया माया खाकै जानी ॥ सतगुरु हंसको लोक चढ़ायी । सहस्र अठासी द्रौप दिखायी ॥ जेहि जेहि हंस सवारी काया । द्रौप द्रौप सब दृष्टि बताया ॥ देखो हंस कह सब अस्थाना । देखो द्रौप सबही मन माना ॥ सबहीं हंस करे पछतावा । यह गतिहम वहां नाही पावा ॥ लै हंसनको पहुँचे तहँवा । महापुरुष विराजे जहँवा ॥

साखी-द्रौप वर्नन कह कहौं, सबै मनोरथ काज ।

सब द्रौपनते न्यार है, सत्यपुरुष को राज ॥

चौपाई

जब हंसनको ले पहुँचाये । तब सतपुरुष उठि कंठ लगाये ॥ जब ही पुरुष अंक भरि लीना । पारस देह सब हंसन कीना ॥

पुरुष वचन

कहै पुरुष ज्ञानी भल आये । इतने हंस कवन विधि लाये ॥

ज्ञानी वचन

ये तब जानो पुरुष पुराना । मैं केहि मुख सों करौं बखाना ॥ चार हजार सातसों बावन पाये । एते हंस दरश तुव आये ॥ सबही आये लोक मैझारा । दुइ सै रोके धरम वटपारा ॥ कौल किया पुनि गये भुलायी । पांजी द्वार धरम पर जायी ॥ मान सरोवर केते रहाये । उनको देही नाहि बनाये ॥

ग्रन्थसार

( ५६ )

जगजीवनबोध

और द्वीपन सब कीन बसारा । जैसी हंसन देह सँवारा ॥ इन तन मन सो बदला कीना । शिष्य होय इन वस्तुहि लीना ॥ जो सब सुना है ग्रन्थन नामा । सोई सब कीना इन कासा ॥ एकोत्तरसै पान इन पावा । नौ तम सुरती देह बनावा ॥ नेह कीन घर रहै जग मारी । काया के गुण दिया बिसारी ॥ कसनी किसि सोतन बदले चीन्हा । गुरुको इन सब वशकरि लीन्हा ॥ जीवत मृतक होय रहे जगमाहीं । जासै दरस तुम्हारा पाहीं ॥ सुनिके पुरुष हरष बहु कीना । फिर फिर हंस अंक भर लीना ॥ कहा देउ तोहि हंस बडाई । तुमतोको अमर लोक चलि आई ॥ अरध सिंहासन आसन पाये । सब हंसन शिर छत्र धराये ॥ हर्षित वदन औ बहुत हुलासा । सदा रहो तुम हमरे पास ॥ बैठयो महा पुरुष दरवारा । कोटिन सूर हंस उजियारा ॥ अमृत फलका करो अहारा । धन्य हंस बडभाग तुम्हारा ॥

पुरुष वचन-ज्ञानीप्रति

ज्ञानी फेर जाओ संसारा । पृथ्वी जाय करो विस्तारा ॥ सबसों कहियो यहि उपदेशा । सब ही चलो पुरुषके देशा ॥ साखी-कहै कबीर सुख अति धनो, पूर्ण प्रेम विलास । यह सब जीव चितावनि, जगजीवन परकाश ॥

इति श्रीबोसागरांतर्गत जगजीवनबोध-

नामक पंचमस्तत्रंगः समाप्तः

श्रीग्रन्थ जगजीवनबोध समाप्त

परिशिष्ट भाग

ग्रन्थसार

संसारमें जन्म लेनाही दुःखके महासागरमें पड़ना है । जन्मही शोकका सागर और भयका पहाड़ है जन्मही अनेक कर्मोंका घर,