कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंबोधसागर
( ३९ )
बारहवीं रानी सूरजमती । हंस रूप है ताकी गती ॥ द्वादश रानी सब बनि आयी । एक अंग होय सब भक्ति करायी ॥ राजा छडीदार पठवाई । तो वो कुँवरको लाय बुलाई ॥
छडीदार बचन
छडीदार कहै कर जोरी । राजकुँवर सुनु विन्ती मोरी ॥ राजा रानि गुरु चरणै आये । ताते तुमको बेगि बुलाये ॥ गरभवाससों करै निरुवारा । तुरत चलो जनि लावो बारा ॥
कुँवर बचन
तुम छडीदार कहो बात विचारी । कैसा गुरु है सो अधिकारी ॥
छडीदार बचन
हम मति हीन कछु नहि जाना । निश्चय आही पुरुष पुराना ॥ यह सुपने नाहीं कहुँ देखा । सुर मुनि नारद शारद पेखा ॥
कुँवर बचन
कुँवर बीनती कीन सुहाती । सुनतैं बात जुडानी छाती ॥ हंस रूप चारों हैं भाई । उमंग हरष हिये नाहि समाई ॥ जहाँ सतगुरु आसन कीन्हा । कुँवर चार आइ दर्शन लीन्हा ॥ बडा कुँवर वह सूरजभाना । गुरु स्वरूप हृदय में आना ॥ दूजा कुँवर इन्द्रमन दासा । शब्दै पीवै शब्दकी आसा ॥ तीजै कहिये चतुर्भुज कुमारा । शब्द सुनत वह सीस उतारा ॥ चौथा कुँवर विक्रम दासा । जिन तन मनकी छोडी आसा ॥ चारों कुँवर धरे गुरु पाई । तन मन धन सब प्रीति चढाई ॥ कदलौ केर पतवार धरायी । गज मुक्ताहल चौक पुरायी ॥ नरियल मोरि के मालूम कीन्हा । लिखि परवाना सबकूँ दीन्हा ॥ इतने हंस भये मन भावन । तिनको सतगुरु कीन्हा पावन ॥ तन मन धन सो बदला कीन्हा । शिरके साँट साहबको चीन्हा ॥ करी निछावर मेटे गर्भफेरा । अब तो भई भगतिकी वेरा ॥