भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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बोधसागर

( ४३ )

साखी-चरण वन्दुँ कर जोरिके, सतगुरु सुनो पुकार । लगत जैसुनि जब मिले, तबही करब अहार ॥ सतगुरु वचन-चौपाई

ऐसे कष्ट करो मत भाई । करो विचार मैं कहूँ सुनाई ॥ करो आरती साज मँगाओ । लेई पान परम सुख पाओ ॥ प्रथम सिंहासन लाइ बिछाओ । सर्वजीव एकसुरति होय आओ॥ सवा सै पान जीव प्रति लाओ । सवा सेर महाकन्द मँगाओ ॥ कपडा बस्तर धातु धराओ । ताँबा पीतल बर्तन लाओ ॥ सोना रूपा मोती हीरा । लाल जवाहिर बने सो चीरा॥ जैसो साज जोई लैं आवै । तैसो हँसा देह बनावै ॥ इतनी साज नहीं बनि आवै । ताके हेतु यह गौ ठहरावै ॥ गौ नाम पृथ्वी का होई । पृथ्वी नाम यह देह संजार्ई ॥ सोधन चले अग्रकी धारा । अगर वास तहैं होय अपारा ॥ पान संग सो देउँ पहुँचायी । लोक जात सो बार न आयी ॥ जब सतगुरु आज्ञा फरमायी । तब राजा सब साज मँगायी॥ सब ही राज जब आनि धरावा । तब सतगुरुको तरुत बिठावा ॥ जुगति साजि चरणामृत लीन्हा । तन मन धन अर्पण करदीना ॥ पुनि सतगुरु पान सो लीना । जैसो जीव तैसो तेहि दीना ॥ पाइ पान सबही चित दीना । होय अधीन सत्य सुख लीना॥ तब सतगुरु यक वचन उचारा । सबहीको कह्यो करन विचारा ॥

सतगुरु वचन

सुनु राजा यक कहूँ विचारा । मानो राजा कहा हमारा ॥ जो वस्तु तुम हम सो पाओ । रखो चेत नहि अनत गँवाओ ॥ जुगाओ शब्दै करो कमाई । हट करि रखो नहि देहु गवाई॥ सेवा करत सुरति चलि जायी । तबहि कालघर बजे बधायी ॥ जे जिव शब्द सुरति पर चाले । सबही विधि सो होय निहाले ॥