भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

पृष्ठ 634, कुल 2136 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 634

( ५४ )

जगजीवनबोध

तन मन धनकी कौन चलायी । तुम तो आपा दिय विसरायी॥ इन सब हंसन देह बनायी । तुम तो देही गुन विसरायी ॥ जो तुम कहो करौं मैं सोई । तुमरी सरवर नाहीं कोई ॥ सुरति तुम्हारी अधिक सहाई । सतगुरु तुमरे प्राण समायी ॥ यह वस्तु तुम कैसे चीन्हा । कैसे गुरुको वश करि लीन्हा ॥ कैसे तन आशा विसरायी । कैसे इल्म फकीरी पायी ॥ सब हंसनकी देह बनाऊँ । ताको तैसो दीप मिलाऊँ ॥ सतगुरु वशि करि राखे पासा । सुनो हंस मुँहि तुमरी आशा ॥ सदा सतगुरु हंस सनेही । तुम आर्पित सतगुरुकी देही ॥ सदा करै सतगुरु की पूजा । तुमसा हंस न देखा दूजा ॥

हंस वचन

हंस कहे सुन पुरुष पुराना । हम कहैं जानै जीव अजाना ॥ हम तो हते भवजल के माहीं । महा अन्ध कछु सूझत नाहीं ॥ तब समरथ गुरु आनिचिताया । बूढत देखि उबारन आया ॥ जो गुरु कहा सोई हम कीन्हा । एक गुरु विलु और न चीन्हा ॥ तिनसों पूछ कीन कर जोरी । समरथ मानो विन्ती मोरी ॥ हम नहीं चाहें लोक औ द्रीपा । सदा रहैं गुरु चरण समीपा ॥ तब गुरु कहो सुनो रे भाई । सर्व ज्ञान का मूल बताई ॥ हमरे संग रहा जो चाहो । नौतम सुरति कि देह बनाओ ॥ और सकल झूठ कर जानो । एक गुरु हम सांचे मानो ॥ तन मन धन सो बदला कीना । तब गुरु इल्म फकीरी दीना ॥ तब गुरु आपा दिया मिटायी । देहीको गुण दियो विसरायी ॥ पान इकोत्तर से हम पाये । पानपान हम देह बनाये ॥ लोक द्रीप हम कछु न चाहा । हमको सतगुरु दर्शक लाहा ॥ हंसा सुरति गुरुकी कीन्हा । स्वरूप सहित गुरुदर्शन दीन्हा ॥ सब ही हंस धरेउ गुरु पाऊ । करि बन्दगि सब सीस नवाऊ ॥