कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 635, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ेंबोधसागर
( ५५ )
सतगुरु वचन
सतगुरु कहै हंस सुनु बाता । कहाँ वे जीव तुम्हारे साथा ॥
हंस सुजनजन वचन
हंस सुजन मिलि अंक लगाये । कहो हंस कस कीन कमाये ॥
सतगुरु वचन
इनकी मैं का कहूं बड़ाई । ये तो सब निज हंसा आई ॥ निश्चय बात हमारी मानी । काया माया खाकै जानी ॥ सतगुरु हंसको लोक चढ़ायी । सहस्र अठासी द्रौप दिखायी ॥ जेहि जेहि हंस सवारी काया । द्रौप द्रौप सब दृष्टि बताया ॥ देखो हंस कह सब अस्थाना । देखो द्रौप सबही मन माना ॥ सबहीं हंस करे पछतावा । यह गतिहम वहां नाही पावा ॥ लै हंसनको पहुँचे तहँवा । महापुरुष विराजे जहँवा ॥
साखी-द्रौप वर्नन कह कहौं, सबै मनोरथ काज ।
सब द्रौपनते न्यार है, सत्यपुरुष को राज ॥
चौपाई
जब हंसनको ले पहुँचाये । तब सतपुरुष उठि कंठ लगाये ॥ जब ही पुरुष अंक भरि लीना । पारस देह सब हंसन कीना ॥
पुरुष वचन
कहै पुरुष ज्ञानी भल आये । इतने हंस कवन विधि लाये ॥
ज्ञानी वचन
ये तब जानो पुरुष पुराना । मैं केहि मुख सों करौं बखाना ॥ चार हजार सातसों बावन पाये । एते हंस दरश तुव आये ॥ सबही आये लोक मैझारा । दुइ सै रोके धरम वटपारा ॥ कौल किया पुनि गये भुलायी । पांजी द्वार धरम पर जायी ॥ मान सरोवर केते रहाये । उनको देही नाहि बनाये ॥