कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंबोधसागर
( ४९ )
पल पल राय नवावै माथा । मोको कैसे छुडाओ साथा ॥ गुरु विन कैसे रहौं अकेला । दिग दिग होये जीव न चेला ॥
सतगुरु वचन
सतगुरु कहै सुनो मोर भाई । हम संगे रहो लै जाउँ लिवाई॥ सदा रहौ हंसन के पास। हमको रहै हंसनकी आसा ॥ देह सो दर्शन तुम्हे दिये राई । विदेही होय संग रहूँ सहाई ॥ विदेही दरश जब हंस पावे । देखि दरश होय अधिक उछावे॥ सतगुरु चलन खबर सब पावा । धीरे धीरे सब हंसा आवा ॥ आये हंसा विन्ती करहीं । हे साहब हम धीर कस धरहीं ॥ जो तुम जाओ सतगुरु साहब । हमहु संग सब तुम्हरे आयव ॥ तुम विनु गुरु कैसे रहि जावै । जल विनु मच्छी ज्यों तडपावै॥ हम पाये आनंद दरश तुम्हारे । मोको न छोडो स्वामि हमारे ॥
सतगुरु वचन
काहे को हठ करत हौ भाई । सबही हंस सुनो चित लाई ॥ देह धरी अब करो सुख वासा । सदा रखो निज नामकी आसा॥ घर में रहि कुल धर्म निवाहो । जो सब साँचि भक्ति तुम चाहो॥
सबहंस वचन
माता पिता त्रिया नहिं चहिये । सुत नारीसे नहिं नेह लगैये ॥ सतगुरु तुमही हौ यक साँचा । झूठ और सकल जग काचा ॥ विना दर्श सो दुख हम पावै । नित चरणामृत कहँसे लावै ॥ तुम विनु देह छुटि सो जावै । कहँ गुरुवचन बहुरि सो पावै ॥ विना दरश सब जगकी माया । सबहि छुटे नहिं चहिये काया॥
सतगुरु वचन
सतगुरु कहै सुनो रे भाई । सबही रहो नाम लौ लायी ॥ सदा रहूँ मैं उनके पास। धरे ध्यान जो साँचकी आसा॥