भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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( ७२ )

ज्ञानसागर

ताकी नारि गई अस्नाना । रूप देखि ताकर मन माना ॥ ले गये बालक सो निज गेहा । बहुत भांति तिन कीन्ह सनेहा ॥ चंदन साडु देखि रिसियाना । चल गयो नारि तोर अब ज्ञाना ॥ बेग डार बालक को आजू । सुने लोग तो होय अकाजू ॥ जाति कुटुम्ब सुने जो कोई । यह तो भली बात नहिं होई ॥ चेरी हाथ तिन दीन्ह पठाई । उद्यान मास तिन दीन्ह अडाई ॥

नूरीको मिलनेकी कथा

काशीमें प्राकट्य

कछु दिन काया धर दुख पावा । यहि अंतर इक जुलहा आवा ॥ नूरि नाम जो वा संग नारी । देखत बालक भई सुखारी ॥ बालक देख नारि मन भूला । रविके उदय कमल जस फूला ॥

सारखी-अति सनेह जिन कीन्हा, नूरी देख रिसान ॥

बालक लीन्हो नारि अब, कहा भयो अज्ञान ॥

बालक वचन-चौपाई

बालक दीन्ह मही मई डारी । अस सुनि बालक दीन्ह हुँकारी ॥ बूझो काल फांस नर नारी । पूर्व जन्म तेहि लीन्ह उबारी ॥ पाछिलि प्रीति भयी अब मोही । तातैं दरश भयो अब तोही ॥

नूरी वचन

तुम जानो अब मैं नहिं जाना । सो अब मोहि सुनाओ काना ॥

नूरीके पूर्वजन्मकी कथा

कबीर वचन

पूर्व जन्म तैं ब्राह्मण दूखी । तोरे गृह कबहु नहिं सूखी ॥ श्वपच भक्त मम प्राणन प्यारा । ताको मान पिता अवतारा ॥ श्वपच भक्ति करै पुनि जबही । मात पिता पर लगै तबही ॥