भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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(८८)

अमरसिंह बोध

अक्षय नाम आनंदरूपी अखिल सम अस्थिर मही ॥

अधम उधारण अखिलपति अखंडसरूपी हौ सही ॥

सोरठा-हंस उवारण नाम, हंसराज हंसनपति ॥

हंस श्रवण सुखधाम, सारशब्द दातार गुरु ॥

चौपाई

मैं कृमि गुरुभुंगी होय आये । अमी पिलाइके रूप फिराये ॥

मैं हूं लोह कुधात कहाया । गुरु पारस मोहि हेमबनाया ॥

एक मुख महिमा कही न जाई । जो मुख कहूँ पदमसत पाई ॥

जिमि पंछीका जोडा होई । नर नारी जुग बंध है सोई ॥

जिमि मोहि शब्द दीन गुरुराई । तिमि रानीको करिय मुक्ताई ॥

तुम बैदिछोर सबै विधिलायक । हम हैं जीव अकाम अलायक ॥

तेहि ते अरज करौ प्रभु साई । करि दया जिव मुक्ताऊ भाई ॥

तानी बचन

सुनो अमर हम कहे तुम सो । करनी बने करो कछु तुम सो ॥

हम कहे सोइ सुन तुम राई । भक्ति करो अब सुरति लगाई ॥

तन मन धन साहेबको दीना । शिरके साटे भक्ती लीन्हा ॥

रंभा नाम पुरेथंकी नारी । गुरु सेवामें रहे हुशियारी ॥

राजा बचन

तब राजा गुरुसे विनती कीना । अपनाकर मोहि निजकर लीना ॥

अब साहेब परवाना दीजे । जो कछु कहो सोई हम कीजे ॥

कौन वस्तु आनू गुरुदेवा । सो साहेब भाषो मोहि भेवा ॥

जेहि विधि तरन होय भवसागर । शब्द सरूप कहो तुम नागर ॥

साखी-मुक्त लोक जाते मिले जहां पुरुष अस्थान ॥

जरा मरण व्यापे नहीं सदा पुरुषको ध्यान ॥

१ पुरेय शब्द राजा अमरसिंहका सम्बोधन है।

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