भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

पृष्ठ 1510, कुल 2136 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1510

( १३४ )

बोधसागर

यह बालक तलावमें पाईं । नीमा देखि ताहि लै आई ॥ कमलपुष्प शिशु सेज बनाई । हरषित नारि सो लियौ उठाई ॥ जोलहा यद्यपि कथा प्रकासी । तऊ लोग सब करते हाँसी ॥ बहुत घौस तिहि भौन रहाऊ । जोलहा जाने बालक भाऊ ॥ बालक रूप तासु ग्रह रहते । खानपान तहँ नहिं कछु गहते ॥ बिन भोजन तन छवि सरसाई । दिन दिन देहकी दीरघताई ॥ जोलहा पुनि पंडितन बोलाये । बालक नाम धरनको आये ॥ पंडित करन जो लगे बिचारा । तब शिशु निजमुख बचन उचारा ॥ नाम कबीर हमारा अहई । और नाम जनि पंडित कहई ॥ यह सुनिके सब चकृत भैऊ । शिशु निजनाम आपते कहेऊ ॥ कोइ कहै यह दानौ देवा । कोई कहै यह अलख अभेवा ॥ कोई ईश्वर अंश बतावा । कोइ कह आप देह धरि आवा ॥ पंडित निज निज भौन सिधारा । बिन भोजन बीते बहु बारा ॥ जोलहा तब मनमें दुख पाईं । भोजन करो कबीर गोसाईं ॥ जोलहजोलाही दुखित निहारी । तब हम तिनते बचन उचारी ॥ कोरी यक बछिया ले आवो । कोरा भांडा एक मँगावो ॥ ततछन सो जोलहा चलि जाई । गऊ कि बछिया कोरी ल्याई ॥ कोरा भांडा एक गहाई । भांडा बछिया शीघ्रही आई ॥ दोऊ कबीरके सम्मुख आना । बछिया दिशाहछि निज ताना ॥ बछिया हेठ सो भांडा धरेऊ । ताके थनहि दूधते भरेऊ ॥ दूध हमारे आगे धरही । यहिबिधि खानपान नित करही ॥ तबसे जोलहा डरै बहुत । हमरे घर है अचरज पूता ॥ केते दिन यहि विधि चलिगैऊ । संग बालकन खेलत भैऊ ॥ कथै बालकन प्रति विज्ञाना । सो जड़वत नहिं कछु पहिचाना ॥ तब साधुन सँग गोछि कराही । अगम ज्ञान कथ तिनके पाही ॥