कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंस्वतमवेदबोध
( १३३ )
नीरू नीमा जोलह जोलाही । काशी नग्र बसै दोड ताही ॥ ताही नग्र कवीर तलाई । कमल पुष्प तामें रह छाई ॥ बालक रूप तहाँ हम लीने । कमल पुष्प पर आसन कीने ॥ तहैं बारह बालक पौढाऊ । करे कुटूहल बाल सुभाऊ ॥ तिहि औसरमें नीरू जोलाहा । नारि गौन सँग ल्यावै ताहा ॥ तृषावंत जब मै सो नारी । तालपै जल अँचवन पग धारी ॥ नीमा दृष्टि बाल पर परेऊ । देखत दृश मोद मन भरेऊ ॥ जिमिरविदृश पद्म विकशाना । धाय धरचो धन रंक समाना ॥ तब सो बालक लियौ उठाई । ले बालक नीरूपहैं आई ॥ क्रोधवन्त जोलहा तब भैऊ । नीमासे तब ऐसे कहेऊ ॥ काको बालक तैं लै आई । नग्रमें मेरी होय हँसाई ॥ नग्रके लोग हँसैगे मोही । गौनहि तिय बालक सँग जोही ॥ जोलहा रोष कीन तिहि वारी । बेगि देहु तुम बालक हारी ॥ हर्ष गुना बनि नारी लाई । तब हम तासे बचन सुनाई ॥
बाल वचन
छन्द-सुनहु बचन हमार नीमा तोहि कहीं समुझायके । पिछली प्रीतिके कारने तोहि दृस दीनो आयके ॥ आपने गृह लै चलो मोहि चीन्हिके जौँ गुरु करो । देहुँ नाम दृढाय तुमको फंद यमके नहि परो ॥ सोरठा-सुनत बचन अस नारि, नीरू त्रास न राखेऊ । ले गई नग्र मझार, काशी नगर पहुँचेऊ ॥
चौपाई
लै बालक जब घरको गैऊ । नग्र लोग सब देखत भैऊ ॥ नग्र नारि नर हाँसी लाई । नारि गौन सँग बालक ल्याई ॥ जोलहा सुनि सुनि लाजित होई । बाल वृतांत कहै सब सोई ॥