कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1496, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ें( १२० )
बोधसागर
अपनी देह देखावै काला । तब साधू जाने जंजाला ॥ बिना शीस जब दरसै देहा । काल पुरुष तब जाने येहा ॥ मरन काल निज साधु निहारी । होहि सचेत लगावै तारी ॥
निरंजन वचन
सोरठा-तुमहुँ करो बखशीश, पुरुष जो दीनो राज मोहि । षोडशमें तुम ईश, ज्ञानी पुरुष एक सम ॥
ज्ञानी वचन--चौपाई
ज्ञानी कहै सुनो धर्मराई । जीवनकहँ मैं आन बचाई ॥ पुरुष आज्ञाते मैं चलि आवों । भवसागरते जीव मुक्तावों ॥ पुरुष अवाज टार यहि बारी । तौ मैं तोकहँ देब निकारी ॥
शब्द
अपने नामकी सोंकर गह मैं पाटि डरी हो । तना तनतकै बेटवा मारे निधिया गई बौराई ॥ देहरि चढ़िके मेहरि मारे निर्ई देखो गुरुवाई । परवा फोरि द्वैचोखा निकसे बीचमें मिलि गई हस्ती ॥ सोटा चार कमरमें मारेनि निकर गई अलमस्ती । आसन लूटेनि वासन लूटेनि लूटे तिनपाई पौवा ॥ ताल अस मोर सनहक लूटी हांडी चलावन डौवा । हँसियाको बेट कोदोकै भूसी ईमोर न्यामत लूटी ॥ कहैं कबीर सुनो भाई साधो दुविधा गै अब छूटी ।
निरंजन वचन--चौपाई
धर्मराय अस बिनती ठानी । मैं सेवक दुतिया नहिं मानी ॥ ज्ञानी बिनती एक हमारा । सो न करो मोर होय बिगारा ॥ पुरुष मोकहँ दीनो राजू । तुमहू देव होय तब काजू ॥ बिनती एक करो हो ताता । दृढ़ करि जान्यौ हमरी बाता ॥