कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1495, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ेंस्वसमवेदबोध
( ११९ )
कैलवचन
सुन ज्ञानी मोर वचन अलेखा । अपने मनमें करो बिवेका ॥ सत्तर युग हम सेवा कीना । पुरुष बकसि भवसागर दीना ॥ समरथ वचन दीन मोहि हारी । तीन लोक पायौ संसारी ॥ तबकी बात रहित भै भाई । अब कस उलटी अदल चलाई ॥ सबै अंश भुक्तै रजधानी । हमपर कोप भयौ तुम ज्ञानी ॥ अब जस निरणय हमै सुनावो । तस सीषा पन जानि चलाओ ॥
कूर्मवचन
तबै कूर्म बोले अस वानी । बिनती एक सुनो हो ज्ञानी ॥ जो तुम बिनती मानो मोरा । तौ हम तुमसे करे निहोरा ॥ तुमहू कैल वचन जौ मानो । तौ हम ज्ञानी निर्णय ठानो ॥ ज्ञानी सुनौ पुरुष कै अंशा । धर्मरायको मेटो संसा ॥ चौका पान कजाव तुमारा । लोक वेदको काल पसारा ॥ जो कोइ करे जोर बरियाई । तौ हम ताके संग न भाई ॥ कूर्म जबै अस बिनती ठानी । ज्ञानी कैल दोहू सुख मानी ॥ फिरके कैल झांझरी आनो । ज्ञानी कैलको वचन सुनावो ॥
ज्ञानी और कालपुरुषको वार्ता--चौपाई
बिना शीसके यमकी देही । काल पुरुषको चीन्ह है येही ॥ सत्य कबीरसे बिनय उचारी । सुनिये ज्ञानी अरज हमारी ॥ अपनी देह नाथ मोहि दीजै । ऐसी मोपर दाय़ा कीजै ॥ ताको वचन मानि हम लीना । अपनी देहको कैलको दीना ॥ शीश समेत और बिन माथा । दोनों देह निरंजन साथा ॥ जब चाहे तब शीस देखाई । निज इच्छा पुनि ताहि लोपाई ॥ जो साधू बैराट निरेखे । सो यह कौतुक नैनन दीखे ॥ रूप विराट शून्यमें निरखे । निजु आगूको लेखा परखे ॥ जब षट्मास मरन रहि जावै । काल कबीर कि देह छपावै ॥